उत्तर प्रदेश के संभल में नवंबर 2024 में हुई हिंसा को लेकर गठित न्यायिक आयोग ने अपनी रिपोर्ट में बड़ा खुलासा किया है। आयोग ने कहा है कि यह हिंसा अचानक नहीं हुई थी, बल्कि पहले से सुनियोजित (प्री-प्लांड) थी। आयोग ने अपनी जांच में जिला प्रशासन और पुलिस को क्लीन चिट देते हुए समाजवादी पार्टी (सपा) के सांसद जिया-उर-रहमान बर्क, एसपी नेता सोहैल इकबाल और जामा मस्जिद प्रबंधन समिति के कुछ पदाधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। करीब 400 पन्नों की यह रिपोर्ट पिछले साल अगस्त में राज्य सरकार को सौंपी गई थी, जिसे बुधवार को उत्तर प्रदेश विधानसभा में पेश किया गया।
क्या कहती है न्यायिक आयोग की रिपोर्ट?
रिपोर्ट के अनुसार, 24 नवंबर 2024 को संभल की शाही जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान हुई हिंसा पहले से योजनाबद्ध थी। आयोग का कहना है कि उपलब्ध प्रत्यक्षदर्शियों के बयान, फॉरेंसिक रिपोर्ट और अन्य साक्ष्य इस ओर संकेत करते हैं कि हिंसा को संगठित तरीके से अंजाम दिया गया।
आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि यह हिंसा देश की एकता, अखंडता, संप्रभुता और सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा थी। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि यदि आरोप साबित होते हैं तो दोषियों पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की कड़ी धाराएं लागू हो सकती हैं और उन्हें आजीवन कारावास जैसी सजा भी हो सकती है।
किन लोगों पर उठे सवाल?
आयोग ने संभल से सपा सांसद जिया-उर-रहमान बर्क, छह बार के सपा विधायक रहे इकबाल महमूद के बेटे सोहेल इकबाल और शाही जामा मस्जिद प्रबंधन समिति के कुछ पदाधिकारियों की भूमिका की जांच का उल्लेख किया है।
इस मामले में पुलिस पहले ही जिया-उर-रहमान बर्क, सोहेल इकबाल और मस्जिद प्रबंधन समिति के अध्यक्ष जफर अली के खिलाफ मामला दर्ज कर चुकी है। इसके अलावा 2,750 अज्ञात लोगों के खिलाफ भी एफआईआर दर्ज की गई थी।
चार लोगों की मौत कैसे हुई?
रिपोर्ट में आयोग ने स्पष्ट किया है कि हिंसा के दौरान हुई चार लोगों की मौत पुलिस की गोलीबारी से नहीं, बल्कि भीड़ के बीच हुई क्रॉस फायरिंग में हुई थी। मृतकों की पहचान कोट कुर्वी के नईम, सराय तरीन के बिलाल, हयात नगर के नुमान और एक 19 वर्षीय युवक के रूप में की गई है।
पुलिस और प्रशासन को मिली क्लीन चिट
आयोग ने जिला प्रशासन और पुलिस की तैयारियों को पर्याप्त बताया है। रिपोर्ट में उस दावे को भी खारिज किया गया है, जिसमें कहा गया था कि वजूखाने (वजू करने की जगह) से जुड़े विवाद के कारण स्थिति बिगड़ी थी। आयोग ने इसे ‘गढ़ी हुई कहानी’ बताया है।
क्या है पूरा विवाद?
संभल विवाद की शुरुआत 19 नवंबर 2024 को हुई थी, जब कुछ हिंदू पक्षकारों ने जिला अदालत में याचिका दायर कर दावा किया कि 16वीं सदी में बनी शाही जामा मस्जिद एक प्राचीन श्री हरिहर मंदिर को तोड़कर बनाई गई थी।
अदालत के आदेश पर 19 नवंबर को मस्जिद का पहला सर्वे हुआ। इसके बाद 24 नवंबर को दूसरा सर्वे कराया गया, जिसके दौरान बड़ी संख्या में लोग विरोध प्रदर्शन के लिए एकत्र हुए और हिंसा भड़क गई। इस हिंसा में चार लोगों की मौत हुई, जबकि 29 पुलिसकर्मी घायल हुए थे।
किन लोगों ने दायर की थी याचिका?
इस मामले में कुल आठ लोगों ने याचिका दाखिल की थी। इनमें ज्ञानवापी-काशी विश्वनाथ विवाद से जुड़े अधिवक्ता हरि शंकर जैन, अधिवक्ता पार्थ यादव, संभल के कल्कि देवी मंदिर के महंत ऋषिराज गिरि, नोएडा निवासी वेदपाल सिंह और संभल के निवासी राकेश कुमार, जीतपाल यादव, मदनपाल तथा दीनानाथ शामिल थे।
याचिका में दावा किया गया था कि संभल के बीचों-बीच स्थित सदियों पुराने श्री हरिहर मंदिर, जो भगवान कल्कि को समर्पित है, पर अवैध रूप से कब्जा कर शाही जामा मस्जिद का निर्माण किया गया था।
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