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उत्तर प्रदेश: सवा लाख से अंतर वाली सीटों पर गठबंधन का दांव

उत्तर प्रदेश की 20 लोकसभा की सीटें ऐसी हैं जिन्हें सोलहवीं लोकसभा के चुनाव में जीता तो भाजपा ने था, लेकिन यदि सपा-बसपा के कुल पाए मतों को जोड़ दें तो गठबंधन भाजपा से काफी आगे खड़ा नजर आता है।

मायावती और अखिलेश यादव

उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों पर समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का गठबंधन कागजों में भारी दिखाई देता है। उत्तर प्रदेश की 20 लोकसभा की सीटें ऐसी हैं जिन्हें सोलहवीं लोकसभा के चुनाव में जीता तो भाजपा ने था, लेकिन यदि सपा-बसपा के कुल पाए मतों को जोड़ दें तो गठबंधन भाजपा से काफी आगे खड़ा नजर आता है। इन सीटों के मतों को जोड़कर अखिलेश यादव और मायावती उपचुनाव सरीखे परिणाम की उम्मीद कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश की कुशीनगर, कैसरगंज, कैराना, खीरी, संभल, रामपुर, सीतापुर, कौशाम्बी, संत कबीर नगर, मिश्रिख, गाजीपुर, संभल, मुरादाबाद, नगीना, सहारनपुर, बहराइच, बांदा, बस्ती, डुमरियागंज, हरदोई, लालगंज और श्रावस्ती की लोकसभा सीटों पर सोलहवीं लोकसभा के चुनाव में भाजपा ने अपना परचम लहराया था। उस चुनाव में उत्तर प्रदेश की 80 में से 71 सीटें पार्टी ने जीती थीं। दो लोकसभा सीटें उसकी सहयोग अपना दल ने जीती थीं। जिन 20 सीटों पर सपा-बसपा के वोटरों को जोड़कर गठबंधन फिलहाल कागज पर बढ़त बनाए हुए है, वहां भाजपा के विजयी सांसदों ने अपने विरोधियों को अधिकतम सवा लाख मतों के अंतर से हराया था।

इनमें सहारनपुर में भाजा की जीत का अंतर 65 हजार, नगीना में करीब 92 हजार, मुरादाबाद में करीब 88 हजार, रामपुर में 24 हजार, संभल में पांच हजार, खीरी में सवा लाख के करीब है। जबकि इन्हीं सीटों में सहारनपुर में सपा ने 52 हजार और बसपा ने दो लाख 35 हजार, नगीना में सपा ने पौने तीन लाख और बसपा ने दो लाख 45 हजार, मुरादाबाद में सपा ने करीब चार लाख और बसपा ने एक लाख 60 हजार, रामपुर में सपा ने करीब चार लाख और बसपा ने 81 हजार मत पाए थे। यदि ऐसे ही सीटों पर दूसरे और तीसरे पायदान पर सोलहवीं लोकसभा के चुनाव में खड़े हुए सपा और बसपा के मतों को मिला लें तो वे भाजपा से काफी आगे नजर आते हैं। लेकिन जमीनी हकीकत आंकड़ों से जुदा है।

इन सभी 20 सीटों पर बीते तीन साल से भाजपा ने अपने संगठन को खासा सक्रिय कर रखा है। इस बाबत भाजपा के वरिष्ठ नेता विजय बहादुर पाठक कहते हैं, सपा-बसपा के मतों को जोड़कर किसी नतीजे पर पहुंचना सपने के अलावा और कुछ नहीं है। उनका कहना है पिछले चुनाव में दोनों दल धुर विरोधी थे। ऐसे में इनके मतदाता क्या करेंगे यह सवाल है। जिन 20 लोकसभा क्षेत्रों सपा-बसपा के मतदाताओं को जोड़कर जीत की उम्मीद है, उन पर इन दोनों दलों कोई विशेष रणनीति नहीं बनाई है। देखना दिलचस्प होगा कि क्या इन सभी लोकसभा क्षेत्रों में बसपा सुप्रीमो मायावती चुनावी सभाओं को संबोधित करती हैं, अथवा नहीं? यही बात सपा प्रमुख अखिलेश यादव पर भी लागू होती है। राजनीति के जानकारों का कहना है कि बसपा और सपा भले ही आपसी गठबंधन कर लें लेकिन जमीनी स्तर पर दोनों ही दलों के पारंपरिक मतदाताओं को एक दूसरे के साथ आकर खड़ा होना इतना आसान भी नहीं है।

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