AAP और BJP की राजनीतिक लड़ाई में पिस रहे निगमकर्मी - Jansatta
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AAP और BJP की राजनीतिक लड़ाई में पिस रहे निगमकर्मी

इस राजनीति के चक्कर में केजरीवाल सरकार के साल भर के कार्यकाल में चौथी बार सफाई कर्मचारी हड़ताल पर हैं।

Author नई दिल्ली | February 2, 2016 3:41 AM
दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) प्रतीकात्मक चित्र

नगर निगमों के कर्मचारियों की हड़ताल का कारण आर्थिक से ज्यादा राजनीतिक है। भाजपा की कोशिश है कि इस आंदोलन के बहाने आम आदमी पार्टी (आप) की सरकार से निगमकर्मियों खासकर सफाई कर्मचारियों का मोहभंग हो जाए, जिससे अगले साल होने वाले निगम चुनाव में भाजपा लगातार तीसरी बार जीत जाए। वहीं आप के नेता और उनकी सरकार यह साबित करने में लगी है कि निगमों की यह हालत उनमें फैले भ्रष्टाचार के कारण है।

इसलिए मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल समेत सभी नेता निगमों को भंग करके नया चुनाव कराने की मांग कर रहे हैं। सफाई कर्मचारियों में सबसे ज्यादा पैठ रखने वाली कांग्रेस की मजबूरी है कि उसे ये दोनों ही दल लड़ाई से बाहर करने में लगे हुए हैं। इस राजनीति के चक्कर में केजरीवाल सरकार के साल भर के कार्यकाल में चौथी बार सफाई कर्मचारी हड़ताल पर हैं। हड़ताल तो देर-सवेर खत्म हो जाएगी, लेकिन विवाद तो अगले साल के चुनाव तक चलने वाले हैं।

कहने को तो दिल्ली के निगम स्वशासी हैं, लेकिन उनका पूरा आर्थिक तंत्र उसी तरह दिल्ली सरकार के नियंत्रण में है जिस तरह दिल्ली सरकार केंद्र के अधीन है। पिछले कुछ सालों को छोड़ दें तो हर साल किसी न किसी रूप में दिल्ली की केंद्रीय सहायता बढ़ाई जाती रही है। जिस तरह केंद्रीय करों में दिल्ली का एक निश्चित हिस्सा तय है और केंद्र उसे छोटी बचतों के लाभ लेने की छूट देती रही है उसी तरह दिल्ली की साफ-सफाई और स्वास्थ्य व प्राथमिक शिक्षा के लिए दिल्ली सरकार एक रकम निगमों को देती है। दिल्ली सरकार लगातार केंद्रीय करों में हिस्से बढ़ाने की मांग करती रहती है उसी तरह निगम भी अपने पैसों की मांग करते रहे हैं।

लेकिन 1993 में हुए संविधान संशोधन में स्थानीय निकायों को मजबूत करने के लिए हर राज्य सरकार को पांच साल में एक वित्त आयोग बनाने का प्रावधान किया गया था। इसके तहत, राज्य की आमदनी का एक निश्चित अनुपात निगमों के लिए आवंटित करना था। निगमों का आरोप है कि अभी तक दिल्ली में तीसरे वित्त आयोग की सिफारिशों के मुताबिक पैसे नहीं दिए गए। लगातार हंगामा होने के बाद पिछले विधानसभा सत्र में चौथे वित्त आयोग की सिफारिशों को पेश किया गया। सरकार की ओर से कहा गया कि जब केंद्र सरकार अतिरिक्त पैसा देगी तब इसे लागू किया जाएगा।

दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया लगातार दावे कर रहे हैं कि सरकार के पास निगमों की कोई देनदारी नहीं है। इतना ही नहीं, उन्होंने तो वेतन घोटाला होने और निगमों के खातों की जांच की मांग तक कर डाली। केंद्र और दिल्ली सरकार की ओर से लगातार एक-दूसरे को गलत ठहराने के दावे किए जा रहे हैं और इस चक्कर में पिछले कई महीनों से निगम के करीब डेढ़ लाख कर्मचारी वेतन से वंचित हैं। निगमों की मुख्य आमदनी तो गृहकर और टोल टैक्स से होती है, लेकिन उससे निगम के कामकाज नहीं चल सकते।

भाजपा नेता दावा कर रहे हैं कि जितने पैसे सरकार ने दिए हैं उससे तीन गुना पैसा वेतन में ही खर्च हो गया है। असल में 2012 में निगम के विभाजन से भी समस्या बढ़ी। दक्षिणी दिल्ली के अलावा दोनों निगमों की आमदनी खर्च से कम है। पूर्वी दिल्ली के लिए तो तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने कहा था कि उसके आत्मनिर्भर होने तक सरकार आर्थिक मदद करेगी, लेकिन यह दो साल से नहीं हो रहा है। इसका एक कारण तो यह है कि दिल्ली सरकार की आमदनी भी अपेक्षा के अनुरूप नहीं बढ़ रही है।

सालों से जिस तरह का विवाद दिल्ली सरकार और केंद्र के बीच होता रहा है, वह निगम और दिल्ली सरकार में भी होता था, लेकिन अब तक इसे बंद कमरे में सुलझा लिया जाता था। आप की सरकार बनने के बाद इस पर सीधी राजनीति होने लगी है और यह अगले साल मार्च में होने वाले निगम चुनाव तक जारी रहने वाली है। उससे पहले दो महीने बाद निगम की 13 सीटों पर उपचुनाव होने वाले हैं। अगर इसका स्थाई समाधान नहीं हो पाया तो यह समस्या बदस्तूर जारी रहेगी और इसका खमियाजा दिल्ली के लोग व निगम के कर्मचारियों को भुगतना पड़ेगा।

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