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रूबी कुमारी की रिपोर्टः आधी आबादी को कब मिलेगी पूरी आजादी

देश आज आजादी की 69वीं सालगिरह मना रहा है, लेकिन आधी आबादी का तमाम बेड़ियों से आजादी का संघर्ष आज भी जारी है।

Author नई दिल्ली | August 15, 2016 5:47 AM
राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा। (तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है)

देश आज आजादी की 69वीं सालगिरह मना रहा है, लेकिन आधी आबादी का तमाम बेड़ियों से आजादी का संघर्ष आज भी जारी है। राजा राममोहन राय के प्रयासों से 1829 में सती प्रथा को गैरकानूनी करार दिया जाना महिलाओं के मुक्ति पथ में एक अहम मोड़ तो लाया, लेकिन मंजिल पर वह आज तक नहीं पहुंच पाया है। आज महिलाएं कई क्षेत्रों में पुरुषों से कदमताल कर रही हैं, पर जब जनसत्ता ने आजादी के मुद्दे पर उनके मन को टटोला तो पाया कि चाहे पारिवारिक हो, सामाजिक या आर्थिक हर स्तर पर कई बेड़ियां आज भी उनके पैरों को जकड़े हुए हैं जिनसे आजादी के लिए वे बेचैन हैं।

‘आजादी’ आजाद भारत में आज भी कई ऐसी महिलाएं हैं जो इस शब्द का अहसास पूर्णता और शिद्दत के साथ नहीं कर पाई हैं। आजादी के 69 साल बाद भी इनके मन में आजादी के कई ऐसे छोटे-बड़े सपने हैं जिनका हकीकत बनना बाकी है। वो कहती हैं, ‘हां हम आजाद हैं लेकिन हमारी आजादी अधूरी है चाहे हम घर में हों या बाहर।’ कहीं वो पुरुष मानसिकता की शिकार हैं, कहीं घरेलू हिंसा में जकड़ी हैं, कहीं अशिक्षा की बेड़ियों में फंसी हैं, कहीं भूख से आजादी का इंतजार है। कहीं कार्यस्थल पर भेदभाव से आहत हैं तो कहीं समाज में फैली दरिंदगी की गिरफ्त में हैं।

नोएडा की एक निजी कंपनी में कार्यरत किरण कहती हैं, ‘आजादी है, पारिवारिक बंदिशें भी कम हुई हैं, मगर पुरुष मानसिकता से आजादी चाहिए, आजादी चाहिए उस सोच से जो औरतों की आजादी के खिलाफ है, औरतों को जरूरत की चीज समझा जाता है, इस दोयम दर्ज से आजादी चाहिए।’ एक निजी मीडिया हाउस में कार्यरत रश्मि पुराणिक ने कहा, ‘एक महिला होने के नाते मैं आजाद हूं, मैं करियर, घर, शादी को लेकर खुद फैसला कर सकती हूं। आजादी है लेकिन महिलाओं के खिलाफ हो रही हिंसा, बलात्कार की बढ़ती घटनाएं बहुत परेशान करती हैं, हमारा समाज महिलाओं को हिंसा से आजादी नहीं देता है। फिर आजादी पूरी कहां हुई।’कॉलेज प्राध्यापिका डॉ कविता राज का कहना है, ‘निजी स्तर पर आजादी की बात की जाए तो स्वतंत्र हूं।

मगर सामाजिक स्तर पर फैसले लेने के समय कहीं न कहीं औरत होना या पारिवारिक मर्यादाएं आजादी पर अंकुश लगाती हैं। मेरे खयाल से जो आजादी मिली है, उतने में महिला सक्षम है बहुत कुछ कर गुजरने के लिए।’ वहीं घरों में काम करने वाली रचना का कहना है, ‘कहां है आजादी, मेरे कमाए पैसे भी मेरे अपने नहीं, कभी पति ले जाता है तो कभी सास।’ दिल्ली में एक निजी कंपनी में कार्यरत रंजीता झा महिलाओं की बंदिशों के बारे में कई सवाल उठाती हैं, लेकिन सबसे बड़ा सवाल वह महिलाओं को खुद से करने को कहती हैं।

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