सड़कों का जाल पर्यावरण के लिए खतरा’

उत्तराखंड के चार धामों तक वाहनों के आवागमन की सुविधा को अधिक विस्तार देने के लिए हर मौसम में उपयोग की जा सकने वाली सड़कों का जाल बिछाया जा रहा है।

सांकेतिक फोटो।

‘उत्तराखंड के चार धामों तक वाहनों के आवागमन की सुविधा को अधिक विस्तार देने के लिए हर मौसम में उपयोग की जा सकने वाली सड़कों का जाल बिछाया जा रहा है। इसके लिए पहाड़ काटे जा रहे हैं और बड़ी तादाद में वृक्षों का कटान हो रहा है। इस पर पर्यावरणविदों ने गहरी चिंता जताई है। उनका मानना है कि सड़कों को जंगलों, घाटियों, जलधाराओं और आर्द्रभूमि को बड़ा नुकसान पहुंचाने के लिए जाना जाता है।

सड़क के कारण प्रत्यक्ष निवास स्थान के नुकसान के अलावा जानवरों की प्रजातियों पर इनका असर होता है। इसके अलावा सड़कें जल-प्रवाह के प्राकृतिक तरीकों को बदल देती हैं, ध्वनि, जल व वायु प्रदूषण को बढ़ाती हैं, अशांति पैदा करती हैं जो आस-पास की वनस्पतियों की प्रजातियों की संरचना को बदल देती हैं। पर्यावरण के जानकार मानते हैं कि वायु प्रदूषण की सांद्रता और प्रतिकूल श्वसन स्वास्थ्य प्रभाव सड़क से कुछ दूरी की तुलना में सड़क के निकट अधिक होते हैं। वाहनों से निकलने वाले तत्व सड़क की धूल में मिलकर वायु प्रदूषण की प्रतिक्रिया को और अधिक गतिमान बना देते हैं।

कार्बन डाइआक्साइड एक प्रमुख ग्रीनहाउस गैस है और मोटर वाहन उत्सर्जन वातावरण में कार्बन डाइआक्साइड सांद्रता के विकास और वायुमंडल में गर्मी के बढ़ते प्रभाव के लिए एक महत्त्वपूर्ण कारण है। वहीं, सड़कें जंगली जानवरों की आवाजाही में बाधा बनती हैं। इस वजह से कई वन्य जीव प्रजातियां शिकार के खतरे के कारण सड़क पर खुले स्थान को पार नहीं करते हैं और सड़कें यातायात से पशु मृत्यु दर में वृद्धि का कारण बनती हैं। यह बाधा प्रभाव वन्य जीव प्रजातियों को उन क्षेत्रों में प्रवास और पुन: उपनिवेश बनाने से रोक सकता है, जहां वन्य जीव प्रजातियां स्थानीय रूप से विलुप्त हो गई हैं। वन्य जीव विशेषज्ञों का मानना है कि सड़कें पहाड़ों, खेतों और घाटियों में घूमने वाले वन्यजीवों के साथ-साथ मानव की आबादी वाले क्षेत्रों के लिए विशेष रूप से खतरनाक हो सकती हैं, जो वन्यजीवों की मृत्यु दर को बढ़ाती है। इससे जड़ी बूटियों के अलावा वन्यजीवों के तेजी से विलुप्त होने का खतरा अत्यधिक बढ़ जाता है।

अंतरराष्ट्रीय पक्षी विज्ञानी और गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग में शिक्षक दिनेश चंद्र भट्ट का मानना है कि हर मौसम में उपयोग आने वालीं सड़कों में क्योंकि चौड़ाई ज्यादा होती है, इसलिए पहाड़ों का कटान अधिक होता है। कटान के मलबे को पास के गधेरों और पर्वतीय नदियों में डाला जाता है जिससे प्रकृति के पारिस्थितिकी व्यवस्था में तेजी से बदलाव आता है और स्थानीय स्तर पर वनस्पति और जीव-जंतुओं के अंडे, चूजे, बच्चों को अत्याधिक हानि होती है। इसमें कई दुर्लभ प्रजातियों के जीव जंतुओं के विलुप्त होने का खतरा होता है।

उत्तराखंड के चार धामों बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री के लिए सड़कों के जाल बिछाने के नाम पर जिस तरह पहाड़ों का दोहन हो रहा है, उससे इस बार मानसून के दौरान पहाड़ में काफी तबाही हुई है। उत्तराखंड के सीमांत पर्वतीय जिले उत्तरकाशी के बड़ेथी में हर मौसम सड़क का एक बड़ा हिस्सा धंस गया था जिससे करीब आधा दर्जन मकान खतरे की जद में आ गए। इस क्षेत्र के स्थानीय निवासियों ने सड़क निर्माण कार्य की गुणवत्ता पर भी सवाल उठाए हैं। इसके अलावा कई अन्य जगहों पर भी पहाड़ के कटान के कारण कई गांव तबाही की चपेट में आए।

उत्तराखंड की हर मौसम में उपयोग में आने वाली सड़कों के खिलाफ कई पर्यावरणविदों ने उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर की थी। चिकाकर्ताओं की याचिका पर सुनवाई करते उच्चतम न्यायालय ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया था कि हर मौसम में उपयोग होने वाली सड़कों के निर्माण में सड़क परिवहन मंत्रालय के 2018 के शासनादेश को ही लागू किया जाए। केंद्र सरकार की ओर से उच्चतम न्यायालय के समक्ष यह बात रखी गई कि ‘हर मौसम सड़क’ परियोजना के तहत चीन से जुड़े सीमा क्षेत्र तक भी सड़क पहुंचनी है। ऐसे में सेना के वाहन भी इस सड़क से होकर गुजरेंगे, इसलिए इस परियोजना के तहत सड़कों की चौड़ाई पांच मीटर से बढ़ाकर सात मीटर रखी जाए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिसंबर 2016 में इस परियोजना की देहरादून के परेड मैदान में एक जनसभा के दौरान नींव रखी थी। 11,700 करोड़ की इस परियोजना के जरिए उत्तराखंड स्थित चारों धामों को 12 महीने सहूलियत वाली सड़कों से जोड़ा जाना है।

‘हर मौसम सड़क’ परियोजना को लेकर भारी राजनीति हो रही है। केदारनाथ विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस के विधायक मनोज रावत ने उच्चतम न्यायालय के फैसले का स्वागत किया है। उनका कहना है कि इस परियोजना के चक्कर में इस पर्वतीय क्षेत्र में अब तक कई जगह कोई खतरनाक बिंदू उभर कर सामने आए हैं। भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष देवेंद्र भसीन का कहना है कि इस परियोजना के पूर्ण होने पर जहां चारों धामों की यात्रा सुगम होगी राज्य का पर्यटन व्यवसाय बढ़ेगा। वहीं, चीन और नेपाल की सीमा से लगे हुए इस सीमांत राज्य की सुरक्षा और अधिक मजबूत होगी और इस परियोजना का धार्मिक महत्त्व के साथ साथ सामरिक महत्त्व भी अत्यधिक है।

‘हर मौसम सड़क’ परियोजना के लिए बड़ी तादाद में पहाड़ों से पेड़ों की कटाई भी करनी पड़ी है। इसे लेकर उच्चतम न्यायालय ने सड़क निर्माण के दौरान पर्यावरण को हुए नुकसान की भरपाई के लिए पौधरोपण कराने का निर्देश केंद्र सरकार को दिया था। इस परियोजना के तहत 900 किलोमीटर लंबी सड़क का निर्माण हो रहा है। अब तक 400 किलोमीटर से ज्यादा लंबी सड़क के चौड़ीकरण का काम पूरा किया जा चुका है। एक अध्ययन के अनुसार इस परियोजना में अब तक 25 हजार से ज्यादा पेड़ों की कटाई हो चुकी है।

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