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मिर्जा गालिब: इश्क़ ने ‘ग़ालिब’ निकम्मा कर दिया, वर्ना हम भी आदमी थे काम के

मिर्जा गालिब एक ऐसे शायर हैं जो किसी पहचान के मोहताज नहीं है। आज मिर्जा गालिब की 221वीं जयंती है।

Author Updated: February 15, 2019 3:22 PM
मिर्जा गालिब, फोटो सोर्स- जनसत्ता ऑनलाइन

‘पूछते हैं वो कि गालिब कौन है, कोई बतलाओं कि हम बतलाएं क्या’। दरअसल मिर्जा गालिब एक ऐसे शायर हैं जो किसी पहचान के मोहताज नहीं है। आज (गुरुवार) मिर्जा गालिब की 221वीं जयंती है।  गालिब का पूरा नाम मिर्जा असदुल्लाह खां गालिब था। मिर्जा गालिब का जन्म 27 दिसंबर 1797 में आगरा में हुआ था। उस दौर में मुगल सत्ता कमजोर पड़ रही थी। गालिब का जीवन काफी मुश्किल हालात में गुजरा। गालिब को लेकर बॉलीवुड में 1954 में फिल्म ‘मिर्जा गालिब’ बन चुकी है। इस फिल्म को सोहराब मोदी ने डायरेक्ट किया था। वहीं टीवी पर भी 1988 में गुलजार का शो मिर्जा गालिब काफी हिट हुआ था। 15 फरवरी 1869 को गालिब का निधन हो गया था।

दिल्ली की हर गली में थे गालिब के चर्चे: जब बहादुर शाह जफर भारत के शासक थे तब जौक उनके दरबार के शाही कवि थे। ऐसे कहा जाता है कि जौक और गालिब एक दूसरे को पसंद नहीं करते थे। ऐसे में एक दिन गालिब बाजार में बैठे थे तभी वहां से जौक का काफिला निकला। तब गालिब ने तंज कसते हुए कहा कि बना है शाह का मुसाहिब, फिरे है इतराता। ये बात जौक को पसंद नहीं आई और उसने बादशाह से गालिब की शिकायत की। जिसके बाद बादशाह ने गालिब को दरबार में पेश होने का हुक्म दिया। गालिब के महल में पहुंचने पर बादशाह ने उनसे पूछ का क्या जो आरोप जौक ने उन पर लगाए हैं वो सही हैं? तब गालिब ने बड़ी चालाकी से कहा कि ये उनकी नई गजल का मक्ता है। इस पर बादशाह ने उन्हें पूरी गजल पेश करने को कहा। तब गालिब ने सुनाया-
हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़े-ग़ुफ़्तगू क्या है

न शोले में ये करिश्मा, न बर्क़ में ये अदा
कोई बताओ कि वो शोख़े-तुंद-ख़ू क्या है

ये इश्क नहीं आसां, बस इतना समझ लीजिए, इक आग का दरिया है और डूबकर जाना है: ये इश्क नहीं आसां, बस इतना समझ लीजिए, इक आग का दरिया है और डूबकर जाना है.. आपने कभी न कभी इस शेर को जरूर सुना होगा और मौके पड़ने पर जरूर इसे कहा भी होगा। दरअसल गालिब के शेर आज भी इतने फेमस हैं कि हर किसी की जुबां पर कभी न कभी टकरा ही जाते हैं। ऐसे में आप भी पढ़िए मिर्जा गालिब के कुछ ऐसे शेर जो कभी ढलते नहीं। बता दें कि मिर्जा गालिब के ये शेर रेख्ता से लिए गए हैं।

इश्क़ ने ‘ग़ालिब’ निकम्मा कर दिया
वर्ना हम भी आदमी थे काम के

उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है

इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश ‘ग़ालिब’
कि लगाए न लगे और बुझाए न बने

इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ ख़ुदा
लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले

आ ही जाता वो राह पर ‘ग़ालिब’
कोई दिन और भी जिए होते

आगे आती थी हाल-ए-दिल पे हँसी
अब किसी बात पर नहीं आती

इक ख़ूँ-चकाँ कफ़न में करोड़ों बनाओ हैं
पड़ती है आँख तेरे शहीदों पे हूर की

इब्न-ए-मरयम हुआ करे कोई
मेरे दुख की दवा करे कोई

आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे
ऐसा कहाँ से लाऊँ कि तुझ सा कहें जिसे

आईना देख अपना सा मुँह ले के रह गए
साहब को दिल न देने पे कितना ग़ुरूर था

आए है बेकसी-ए-इश्क़ पे रोना ‘ग़ालिब’
किस के घर जाएगा सैलाब-ए-बला मेरे बअ’द

 

आँख की तस्वीर सर-नामे पे खींची है कि ता
तुझ पे खुल जावे कि इस को हसरत-ए-दीदार है

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