संगठन शक्ति की सीमा का एहसास

उप चुनावों में मिली हार के बाद जिस तरह से केंद्र सरकार ने तेजी से बढ़ते पेट्रोल और डीजल के दामों में अचानक कमी की और तीनों कृषि कानूनों को वापस लिया उसी तरह प्रदेश की जयराम सरकार ने भी कर्मचारियों के देय वेतनमानों को देने का एलान कर दिया।

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जयराम ठाकुर। फाइल फोटो।

ओम प्रकाश ठाकुर

उप चुनावों में मिली हार के बाद जिस तरह से केंद्र सरकार ने तेजी से बढ़ते पेट्रोल और डीजल के दामों में अचानक कमी की और तीनों कृषि कानूनों को वापस लिया उसी तरह प्रदेश की जयराम सरकार ने भी कर्मचारियों के देय वेतनमानों को देने का एलान कर दिया। यही नहीं, 2017 चुनावों के दौरान जारी घोषणा पत्र के वादों के अनुसार अब नियमित होने के लिए अनुबंध की अवधि को भी तीन साल से कम कर दो साल कर दिया।

यह सब पहले भी हो सकता था लेकिन जयराम सरकार व प्रदेश भाजपा को भी केंद्र सरकार का भ्रम हो गया था कि वह संगठन की ताकत पर कोई भी चुनाव जीत सकते हैं। लेकिन हिमाचल की जनता ने यह भ्रम तोड़ दिया कि जनता को लंबे समय तक बरगलाया जा सकता है। यह तो ढाई लाख से ज्यादा कर्मचारियों की मांगों को लेकर बनी संयुक्त सलाहकार समिति की बैठक के बाद पता चला कि प्रदेश के कर्मचारी तबके की कितनी मांगें थीं जिन पर जयराम सरकार ने गौर ही नहीं किया। इस समिति की बैठक में जयराम सरकार ने नए वेतनमान और अनुबंध की अवधि तीन से दो साल करने का एलान कर समझा था कि उसने जंग जीत ली है। लेकिन इस बैठक के दूसरे ही दिन पुलिस के हजारों कर्मचारी मुख्यमंत्री के सरकारी आवास ‘ओकओवार’ के बाहर वर्दी में इकट्ठे हो गए।

2015 के बाद नौकरी में लगे पुलिसकर्मियों ने मैस में खाना खाना बंद कर विरोध जताया, जिससे अधिकारियों के हाथ-पांव फूल गए। आखिर मुख्य सचिव की अध्यक्षता में समिति गठित करनी पड़ी। यह मसला टला ही था कि भाजपा समर्थक भारतीय मजदूर संघ के बैनर तले विभिन्न संगठनों के कार्यकर्ता राजधानी पहुंचे और सचिवालय पर धरना दिया। चौंकाने वाले आरोप लगाते हुए भारतीय मजदूर संघ ने कहा कि जयराम सरकार ने पिछले चार सालों में संघ की एक भी मांग पूरी नहीं की। मजदूर संघ आशा, आंगनबाड़ी और मिड डे मील कार्यकतार्ओं की मांगों को ले लामबंद हुआ था, जिनकी मांगें अमूमन वामपंथी संगठन उठाते रहे हैं। चुनाव में लगभग साल भर है इसी के मद्देनजर संघ ने उनकी मांगों को लेकर यह प्रदर्शन किया होगा।

विरोधी सुरों ने बताया कि जयराम सरकार सभी तबकों के हितों को कैसे नजरअंदाज करती रही। सरकार ने अभी आउटसोर्स कर्मचारियों की मांगों को लेकर मंत्रियों की उप समिति की रपट के इंतजार का हवाला दे उनके विरोध को दबा रखा है। चुनाव के लगभग एक साल पहले अपनी मांगें उठा रहे कर्मचारियों को यह सरकार अपने पक्ष में कर पाएगी यह मुमकिन नहीं लगता। कर्मचारियों के नेताओं का कहना है कि सरकार अब कुछ करती भी है, तो इसका ज्यादा लाभ नहीं होगा।

सरकार ने कर्मचारियों को अपने पक्ष में करने की मुहिम चाहे छेड़ दी हो, मगर पार्टी के नाराज अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को मनाने के लिए कुछ होता नहीं दिख रहा है। उन्हें मनाना सरकार और संगठन के लिए चुनौती है। बहरहाल, प्रदेश में अभी बसों के किराए, रेत, बजरी, सरिया और सीमेंट के दामों में बेतहाशा बढ़ोतरी का गुस्सा जनता के जेहन में है। सीमेंट प्रदेश में ही बनता है और इसके हिमाचल में दाम पंजाब से ज्यादा हैं।

तीन सालों से सरकार दाम में कमी करने का आश्वासन भर दे रही है। अब तो उस पर रेत-बजरी माफिया और सीमेंट कारखानों को संरक्षण देने के आरोप लगने लगे हैं। सरकार को इस परेशानी से भी निपटना है। हालांकि मुख्यमंत्री ने भरोसा दिलाया है कि वह अगले साल के बजट में बाकी मांगों का समाधान कर देंगे लेकिन यह सबको पता है कि सरकार के खजाने में कितना पैसा बचा है और कर्ज कहां तक चला गया है। ऐसे में ‘मिशन रिपीट’ का सपना देख रही सरकार के लिए अगला चुनावी साल चुनौतियों से सराबोर होगा।

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