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दिल्ली मेरी दिल्ली: लोक पर्व पर राजनीति

दिल्ली में पूर्वांचल (बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश के मूल निवासी) के लोगों की बढ़ती संख्या ने लोक आस्था के महापर्व छठ को राजधानी का पर्व बना दिया है। राजनीतिक दलों के नेताओं को लगता है कि छठ के नाम पर पूर्वांचल के लोगों को अपने पक्ष में किया जा सकता है। दिल्ली पर राज करने वाली आम आदमी पार्टी (आप) बगैर तैयारी छठ घाटों की संख्या बढ़ा रही है। वहीं, भाजपा अपनी केंद्र और नगर निगम की सत्ता के चलते तैयारियों का श्रेय लेने में लगी रही तो 15 साल दिल्ली पर राज करने वाली कांग्रेस दोनों पर छठ की तैयारी ठीक से नहीं करने का आरोप लगाती रही। राजनीतिक दलों का उद्देश्य धार्मिक कम राजनीतिक ज्यादा है। चार दिन के इस महापर्व के शुरू होने के दो दिन पहले तक छठ घाट नहीं बन पाए थे और न ही यमुना में पानी दिख रहा था।

Author नई दिल्ली | November 12, 2018 5:09 AM
प्रतीकात्मक फोटो

लोक पर्व पर राजनीति
दिल्ली में पूर्वांचल (बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश के मूल निवासी) के लोगों की बढ़ती संख्या ने लोक आस्था के महापर्व छठ को राजधानी का पर्व बना दिया है। राजनीतिक दलों के नेताओं को लगता है कि छठ के नाम पर पूर्वांचल के लोगों को अपने पक्ष में किया जा सकता है। दिल्ली पर राज करने वाली आम आदमी पार्टी (आप) बगैर तैयारी छठ घाटों की संख्या बढ़ा रही है। वहीं, भाजपा अपनी केंद्र और नगर निगम की सत्ता के चलते तैयारियों का श्रेय लेने में लगी रही तो 15 साल दिल्ली पर राज करने वाली कांग्रेस दोनों पर छठ की तैयारी ठीक से नहीं करने का आरोप लगाती रही। राजनीतिक दलों का उद्देश्य धार्मिक कम राजनीतिक ज्यादा है। चार दिन के इस महापर्व के शुरू होने के दो दिन पहले तक छठ घाट नहीं बन पाए थे और न ही यमुना में पानी दिख रहा था।

खुराना की पीड़ा
पहले जनसंघ और बाद में भाजपा को दिल्ली में मजबूती से खड़ा करने में बड़ी भूमिका निभाने वाले दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री मदन लाल खुराना का पिछले दिनों निधन हो गया। आजादी के बाद जिन नेताओं ने दिल्ली की राजनीति को सबसे ज्यादा प्रभावित किया, उसमें खुराना का नाम सबसे पहले लिया जाता है बावजूद इसके वे अपने पुत्र को विधानसभा का टिकट तक नहीं दिलवा पाए। जिस बड़े बेटे को वे अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहते थे, उनकी मौत खुराना से पहले हो गई और जिस छोटे बेटे को उन्होंने अपनी बहन को गोद दे दिया था, उसी ने उनका अंतिम संस्कार किया। एक समय ऐसा भी आया जब पार्टी के कई नेताओं ने उनसे कीर्ति नगर सीट से अपने पुत्र को टिकट देने का सुझाव दिया लेकिन तब परिवार वाद का आरोप लग जाने के संकोच से उन्होंने सुभाष सचदेवा को टिकट दिलवा दिया। जिस दिल्ली को वे अपना मंदिर मानते थे और जिसको न छोड़ने की जिद में उन्होंने राजस्थान के राज्यपाल की कुर्सी छोड़ी, उसी दिल्ली में वे सालों अपने घर में अचेत पड़े रहे। उनकी सुध लेने गिनती के ही लोग जाते थे। वैसे यह भी गजब ही हुआ कि उनके साथ ही दिल्ली भाजपा की राजनीति से मजबूत पंजाबी नेता का विदाई ही हो गई।

‘आप’ की राजनीति
राजनीति में नया प्रयोग करने के नाम पर सक्रिय हुए अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी के नेता वही हथकंडे अपनाने लगे हैं जो दूसरे राजनीतिक दल अपनाते रहे हैं। कहने के लिए आम आदमी के पैसे से पार्टी चलाने का दावा और राज्य सभा की सीट पैसे वालों को देने के बाद लोक सभा सीटों के उम्मीदवारों में अपने पार्टी के नेताओं के साथ-साथ पैसे वालों की तलाश की गई। यह अलग बात है कि उनमें से एक उम्मीदवार ने बहाना करके चुनाव लड़ने से मना कर दिया। ‘आप’ के नेता चुनाव जीतने के हर हथकंडे जानते हैं। तभी तो दक्षिणी दिल्ली के भाजपा नेताओं की आपसी लड़ाई को ‘आप’ के नेता पूर्वांचल बनाम स्थानीय बनाने में लगे हैं, जिससे पूर्वांचल के प्रवासी मतदाता भाजपा से कटकर उनके पास स्थाई रूप से जुड़ जाएं। दक्षिणी दिल्ली के भाजपा सांसद के लिए भी अजीब संयोग है कि हर बार वे ही इस तरह के झगड़े में फंस जाते हैं।

सूचना देने की औपचारिकता
दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) देश के सबसे बेहतर विश्वविद्यालयों में शामिल है लेकिन यहां का सूचना-तंत्र इस कदर खराब है कि कार्यक्रमों के कवरेज के लिए सूचना एक घंटे से भी कम पहले दी जा रही है। 29 से 31 अक्तूबर के बीच नैक की टीम ने डीयू का दौरा किया था। दौरे के तहत 29 अक्तूबर को शाम 6:50 बजे एक सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया और कवरेज के लिए इसकी सूचना शाम 5:53 बजे पर दी गई। यानी डीयू के रजिस्ट्रार कार्यालय की ओर से सूचना देने की औपचारिकता का निर्वाहन किया गया। इतना ही नहीं विश्वविद्यालय में जनसंपर्क या मीडिया संयोजन के लिए भी कोई नहीं है। अगर किसी को सूचना चाहिए तो कुलपति या रजिस्ट्रार से ही बात करनी होगी और उनका फोन पर आना आसान नहीं है।

चाय पर तर्क-वितर्क
केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने दिल्ली पुलिस को नसीहत दी है कि वे थाने में आने वाले फरियादियों से दोस्ताना व्यवहार करें और उन्हें चाय-पानी के लिए पूछें। यह संभव हो पाएगा या नहीं यह बाद की बात है लेकिन उससे पहले ही तर्क-वितर्क शुरू हो गए हैं। कुछ लोगों का कहना है कि थाने से अलग पीसीआर की गाड़ी वालों के पास भी शिकायतें आती हैं। वे सीधे थाना जाने की बात कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं। बेदिल को एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि इस प्रकार की चीजें तभी अमल में आ सकती है, जब केंद्र से सीधे एक सख्त निर्देश जारी हो। इस निर्देश में यह भी लिखा हो कि अगर फरियादियों की ठीक से आवभगत नहीं हुई तो तैनात पुलिसकर्मियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई होगी। पुलिस अधिकारी का कहना था कि पुलिस की ड्यूटी थोड़ी अलग होती है। वे दिन-रात काम करते हैं और ड्यूटी समाप्त होने के बाद भी कई बार उन्हें तैनात रहना पड़ता है। इस हिसाब से कई बार वे तनाव में फरियादियों को ज्यादा तवज्जो नहीं दे पाते जिससे स्थिति पुलिसकर्मियों के विपरीत चली जाती है। इसलिए जब केंद्र से निर्देश जारी हो जाएगा तो फिर थाने से लेकर पीसीआर तक सभी इसके दायरे में आ जाएंगे।

आदेश का असर
पुरानी गाड़ियों को लेकर अदालती आदेश का असर दिल्ली नगर निगम में सीधे तौर पर देखने को मिल रहा है। नगर निगम की कुछ गाड़ियां 15 और 10 साल पुरानी हो गई हैं। इन गाड़ियों को खड़ी करने के अलावा और कोई उपाय नहीं है। बताया जा रहा है कि इसमें ऐसी गाड़ियां भी है जो कूड़ा उठाने में लगी थीं। चर्चा यह भी है कि दो जीप ऐसी थीं, जिन्हें नगर निगम के तत्कालीन नेता और दिल्ली प्रदेश कांग्रेस समिति के पूर्व अध्यक्ष राम बाबू शर्मा के निर्देश पर खरीदा गया था। अब राम बाबू नहीं रहे तो उनकी निशानी दोनों जीप भी खड़ी कर दी गई हैं। कहा जा रहा है कि अब निगम की माली हालत इतनी खराब है कि इन दोनों जीप के बदले दो जीप खरीदना टेड़ी खीर लग रहा है।

…छाछ भी फूंक कर पीना
‘दूध का जला, छाछ भी फूंक कर पीता है’ यह बात एनबीसीसी के एक निर्माणधीन प्रोजेक्ट पर सत्य होती दिखी। पेड़ों की कटाई को लेकर बीते दिनों एनबीसीसी की सड़क से अदालत तक किरकिरी हुई थी। उसे तीन-तीन प्रोजेक्ट को बंद करना पड़ा था। शायद यही वजह है कि एनबीसीसी ने अपने पूर्वी किदवई नगर प्रोजेक्ट के ‘लॉन’ की थीम ही मानो ‘पेड़ बचाओ’ रख दी है। यहां एनबीसीसी ने कई मानव प्रतिमा खड़ी की हैं, जो पेड़ों को काटने से रोकने का संदेश दे रही हैं। इसमें एक व्यक्ति नए लगाए पौधों से चिपका हुआ दिखाया गया है जो सामने से कुल्हाड़ी लेकर आ रहे दूसरे व्यक्ति को पेड़ काटने को मना कर रहा है। किसी ने ठीक ही कहा कि अदालत की नसीहत ने एनबीसीसी को ऐसी सीख दे डाली कि अब पहला ध्यान पेड़ न काटने पर ही है।

ठीकरा फूटा दुकानदारों पर
हरित पटाखों की बिक्री की अनुमति होने के बावजूद दिल्ली से नोएडा के जिला प्रशासन ने 33 दुकानों को अस्थायी बिक्री लाइसेंस जारी कर दिया। जबकि यह सबको पता था कि हरित पटाखे बाजार में उपलब्ध नहीं हैं, इस वजह से दिल्ली में पटाखा बिक्री के न तो अस्थायी लाइसेंस जारी किए गए और न ही पूरे साल खुलने वाले स्थायी लाइसेंस धारकों को दुकान खोलने दी गर्इं। सुप्रीम कोर्ट की रोक के बावजूद अवैध पटाखे बेचने पर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने डीएम को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। इसके जवाब से पहले जिला प्रशासन ने उन 33 पटाखा बिक्री की दुकान लगाने वालों के खिलाफ एफआइआर दर्ज करने का फरमान जारी कर दिया है। परेशान दुकानदारों की कहीं सुनवाई नहीं हो रही है जबकि जिला प्रशासन ने ही तय शुल्क लेकर उन्हें लाइसेंस जारी किया। अग्निशमन विभाग समेत पुलिस ने अपनी कार्रवाई के नाम पर तय समेत अन्य शुल्क वसूले हैं। पूरी प्रशासनिक विफलता का ठीकरा अस्थायी लाइसेंस लेने वाले दुकानदारों पर फोड़ा जा रहा है।
-बेदिल

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