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जनता ने सरकारी राशन की दुकान लूट ली

सेल्समेन मुन्नीलाल अहिरवार के अनुसार दुकान खोलते ही गांव के सरपंच नोनेलाल पटेल कुछ ग्रामीणों के साथ आए। उन्होंने गेंहू और चावल की बोरियां लूटनी शुरू कर दी।
Author छतरपुर | November 13, 2016 04:49 am
2000 के नए नोट। (तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।) (Photo Source: AP)

पिछले चार सालों से सूखे की मार झेल रहे बुंदेलखंड के नसीब में शायद अच्छे दिनो का लेख नहीं है। यह इलाका उस दौर से गुजर रहा है जहां पिछले एक माह में तीन किसान आत्महत्या कर चुके हैं। बारिश अच्छी हुई तो किसानों की बुबाई नोटों के झमेले में फंस कर रह गई है। हालात इस कदर गंभीर होते जा रहे हैं कि ग्रामीणों ने सरकारी राशन की दुकान लूट ली। उधर किसान अपना खेती का काम छोड़ मजदूरी करने पर विवश हैं।

छतरपुर जिले के बमीठा थाने के ग्राम बरद्धारा में शुक्रवार को सरकारी राशन की दुकान लूट ली गई। सेल्समेन मुन्नीलाल अहिरवार के अनुसार दुकान खोलते ही गांव के सरपंच नोनेलाल पटेल कुछ ग्रामीणों के साथ आए। उन्होंने गेंहू और चावल की बोरियां लूटनी शुरू कर दी। सेल्समैन के अनुसार गेहंू और चावल की करीब 100 बोरियों को ग्रामीण ले गए। उधर सरपंच का कहना है कि गांव में तीन माह से राशन नहीं बांटा गया था। ग्रामीणो के सामने समस्या थी कि वे अपना पेट कैसे भरे। यह उन नोटों के अचानक बंद करने का असर था जिसके दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं। जो किसान बुबाई में व्यस्त हो जाता था, वह आज मजदूरी करने पर विवश है। बुंदेलखंड का किसान किन गंभीर हालातों से जूझ रहा है। उसका अंदाज लगाया जा सकता है कि बीते एक माह में तीन किसान आत्महत्या कर चुके हैं।

शुक्रवार को ही टीकमगढ़ जिले के ग्राम गौर में 19 वर्षीय पर्वत रैकवार ने डाई पीकर मौत को गले लगा लिया। ग्रामीणों के अनुसार उसके पिता लंपू ने कर्ज लेकर अरहर की बुबाई की थी जिसमें फूल तक नहीं निकला। पिछले माह 11 अक्तूबर को छतरपुर जिले के ही अलीपुरा में शेख बशीर उम्र 24 वर्ष ने स्वयं के खेत पर एक पेड़ से लटक कर आत्महत्या कर ली थी। बताया गया कि खरीफ फसल में अपेक्षा से कम उत्पादन हुआ। तो पिता शेख खडडी पुत्र की मोटरसाइकिल दिलाने की जिद्द पूरी नहीं कर सका। इस घटना के तीन रोज पूर्व 8 अक्तूबर को सोयाबीन की फसल चैपट होने पर सागर जिले के जेसीनगर जनपद के ग्राम मिडवासा में 45 वर्षीय किसान बुंदेल पुत्र कुदंनसिंह ने स्वयं के खेत पर जहरीला पदार्थ खाकर मौत को गले लगा लिया था। जो इलाका भूखमरी के समय से उबर ना पाया हो।

वहां अचानक करंसी का बंद हो जाना किसी बड़ी आफत से कम नहीं है। अपनी पेट भरने की जरूरतों की पूर्ति के लिए भी लोगों के पास पैसा नहीं बचा है। किसानी की पूर्व तैयारियों के लिए जुताई, खाद, बीज, पानी देने वाले पंपो की मरम्मत जैसे कई काम के लिये नगदी की जरूरत होती है। खरीफ की फसल से जो बचाया, उससे उसकी पूर्ति होनी थी। आज उस बचत की करंसी बंद होने से किसान फिर कल की आस पर जा बैठा है। सहकारी समितियां और दुकानदारों ने पुराने पांच सौ व एक हजार के नोट लेने बंद कर दिए। बैंकों में लंबी कतार हैं। जो वहां तक पहुंच भी रहा है तो दो हजार रुपए से अधिक उसे मिल नहीं रहे हैं। इन गंभीर हालातों में किसान हितैषी होने का राग अलापने वाले भी किसान का दर्द समझ नहीं पा रहे है। गांठ में रुपया है पर वह किसी लायक नहीं, पेट खाली है तो आने वाले दिनों में हालात नहीं संभले तो सरकारी दुकानों से राशन लुटने की अन्य घटनाएं चिंताएं बढ़ा सकती हैं।

प्रधानमंत्री मोदी और शिंजो अबे के बीच हुई प्रतिनिधिमंडल स्तर की वार्ता

 

 

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