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भाजपा में तेज हुआ सत्ता संघर्ष

लगातार तीसरी बार दिल्ली नगर निगम चुनाव जीतने, आम आदमी पार्टी (आप) के बिखरने और कांग्रेस के हाशिए पर जाने से भाजपा में सत्ता संघर्ष तेज होने लगा है।

Author नई दिल्ली | June 2, 2017 1:04 AM

लगातार तीसरी बार दिल्ली नगर निगम चुनाव जीतने, आम आदमी पार्टी (आप) के बिखरने और कांग्रेस के हाशिए पर जाने से भाजपा में सत्ता संघर्ष तेज होने लगा है। नगर निगम चुनावों से पहले राजनीति के नौसिखिए और भोजपुरी के लोकप्रिय कलाकार मनोज तिवारी को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर पार्टी नेतृत्व ने जो दांव खेला, वह तो कारगर साबित हुआ। जो लोग यह मना कर चल रहे थे कि तिवारी दिल्ली में अपनी जमीन नहीं बना पाएंगे या राजनीति को पार्ट टाइम काम बनाएंगे, उन्हें गहरा झटका लगा है। पिछले दिनों नगर निगम की जीत के बाद केंद्रीय मंत्री विजय गोयल के सरकारी निवास पर पार्टी की मनाही के बावजूद इकट्ठे हुए निगम पार्षदों को तिवारी ने अनुशासन का झटका देकर एक तीर से कई निशाने साध लिए हैं। वैसे पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के हस्तक्षेप से विवाद ज्यादा नहीं खींचा और दिखावटी सुलह हो गई। तिवारी तो इतना ही कहते हैं कि वे संगठन को मजबूत करने के लिए काम कर रहे हैं पार्टी में अनुशासनहीनता नहीं होनी चाहिए।

वर्ष 1993 में हुए दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा को करीब 43 फीसद मत मिले थे, इसके बाद उसका मत लोकसभा चुनाव को छोड़कर किसी भी चुनाव में 37 फीसद नहीं पार किया। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से सीधे मुकाबला होने से भाजपा 1998 के बाद लगातार दिल्ली सरकार से बाहर इसलिए रही कि उसके मत औसत में बढ़ोतरी नहीं हो पाई। नगर निगम चुनावों में भी उसे इतने ही वोट मिले लेकिन बसपा और अन्य दलों ने गैर भाजपा मतों का कांग्रेस के साथ विभाजन किया, इसलिए भाजपा लगातार 2007 और 2012 के निगम चुनाव जीत गई।

भाजपा के नेता इसी से खुश थे कि पार्टी तीसरी बार निगम चुनाव जीत गई लेकिन दिल्ली की सरकार से करीब 20 साल से दूर रहने का मूल कारण तो गुटबाजी और भाजपा के वोट में बढ़ोतरी न होना ही माना जाता है। भाजपा की जीत के लिए हर बार किसी तीसरे मजबूत दल की जरूरत है जो गैर भाजपा मतों का विभाजन करा सके। एक खास वर्ग और कुछ जातियों की पार्टी माने जाने वाली भाजपा में यह परंपरा सी बन गई थी कि पंजाबी और बनियों को अलावा कोई पार्टी का चेहरा नहीं बन सकता है। यह जरूर है कि वही पार्टी की ताकत रहे हैं लेकिन यह समझना जरूरी है कि दिल्ली बदल चुकी है। बिना नए वर्ग को जोड़े पार्टी सरकार में नहीं आ सकती है। हर बार पार्टी में नया अध्यक्ष बनने पर यह प्रयास भी होता दिखा लेकिन हर बार पार्टी के ही कई नेता उस प्रयास को समानांतर पार्टी चला कर बे-असर करते रहे। इस काम में वे नेता भी शामिल रहे हैं जो खुद प्रदेश अध्यक्ष या उस स्तर के पदों पर रहे हैं।

पार्टी का एक वर्ग यह मान कर चल रहा है कि पार्टी की ताकत न बढ़ने का यही मुख्य कारण है। सतीश उपाध्याय भी परंपरा से हटकर प्रदेश अध्यक्ष बनाए गए थे लेकिन वे पूरी तरह से सफल नहीं हो पाए न ही वे सभी गुटों को साथ लाने में सफल हुए। समाजवादी पार्टी के टिकट पर पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ने वाले मनोज तिवारी भाजपा में शामिल होकर 2014 में दिल्ली उत्तर पूर्व के सांसद बने तो यह माना गया कि पार्टी की प्राथमिकता बदल रही है। उसे पूर्वांचल के लोगों को जोड़ने की चिंता है। पार्टी की बागडोर जिस तरह से पिछले साल तिवारी को मिली उससे लगा कि वे तो केवल चेहरा बनेंगे पार्टी कोई और चलाएगा। पार्टी गठन होने से लेकर निगम चुनावों के लिए टिकट बंटने तक भी तिवारी ने पार्टी के फैसलों में ज्यादा दखल नहीं दी।

लेकिन निगम चुनावों ने हालात बदल दिए। चुनाव नतीजों ने तिवारी को सही मायने में राजनेता बना दिया। फिर तो उनके समर्थक उन्हें दिल्ली का अगला मुख्यमंत्री बताने लगे। तिवारी भी संभल कर बोलने और फैसला लेने लगे। उनके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी प्रमुख अमित शाह से सीधे संबंध हैं। इसका सीधा संदेश आने के बाद भी अनेक नेता अपने पुराने ढंग को बदलने को तैयार नहीं हैं। 16 मई को निगम पार्षदों को विजय गोयल के घर बुलाने से प्रदेश अध्यक्ष नाराज हुए और उनकी ओर से मना किया गया लेकिन अनेक नेताओं ने इसे गंभीरता से नहीं लिया और आयोजन में शामिल हुए। विजय गोयल ने कहा कि वे अपने मंत्रालय की ओर से स्लम बस्तियों में चलाए जाने वाले कार्यक्रमों में निगम पार्षदों को जोड़ने के लिए उन्हें बुलाया था। बाद में उन्होंने स्लम बस्तियों में कार्यक्रम भी करवाए। बताते हैं कि विवाद बढ़ने पर पार्टी नेताओं के हस्तक्षेप से दोनों नेताओं में सुलह भी हुई और दोनों कार्यक्रम में साथ रहे।

मनोज तिवारी तो इस पर कुछ कहने के बजाए यही कह रहे हैं कि वे तो वही काम करना चाह रहे हैं जिससे पार्टी की संगठन मजबूत हो। पार्टी ने जो निगम चुनाव में वादे किए हैं उसे पूरा करवाना उनकी जवाबदेही है। खतरा तो यह भी है कि गुटों में बंटी भाजपा के नेताओं को एक साथ लाने की कोशिश में जुटे तिवारी का कई नेता एक गुट न बनवा दें जिससे उनका मुख्यमंत्री के दावेदार बनने का दावा न कमजोर हो जाए।

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