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राजस्थान- सर्राफा, कपड़ा समेत छोटे कारोबारियों का धंधा चौपट

राज्य में वस्त्र नगरी के तौर पर पहचान रखने वाले भीलवाड़ा के कपड़ा कारोबारी तो जीएसटी की पेचीदगियों के कारण संकट में ही फंसे हुए हैं।
Author जयपुर  | October 12, 2017 05:05 am
प्रतीकात्मक फोटो। (फाइल)

राजस्थान में जीएसटी के लागू होने के बाद से तमाम तरह के कारोबारी इसकी प्रक्रिया और कर दरों को लेकर पशोपेश में ही पड़े रहे। इसके कारण उनका धंधा चौपट हो गया। सबसे ज्यादा मार कपड़ा, सर्राफा, लोहा, मार्बल व्यवसाय पर पड़ी। कपड़ा और साड़ी व्यापारियों ने तो जीएसटी लागू होने से पहले ही संघर्ष समिति बना कर इसके विरोध में लंबा आंदोलन चला अपना कारोबार तक बंद रखा। जीएसटी काउंसिल की तरफ से हाल में दी गई राहत को लेकर कारोबारी अभी संशय की हालत में है। उनका कहना है कि तीन महीने में उनका बुरा हाल हो गया और दिवाली पर धड़ल्ले से चलने वाला उनका कारोबार अब मंदी की चपेट में आ गया है। राज्य में वस्त्र नगरी के तौर पर पहचान रखने वाले भीलवाड़ा के कपड़ा कारोबारी तो जीएसटी की पेचीदगियों के कारण संकट में ही फंसे हुए हैं।

भीलवाड़ा के कारोबारियों का कहना है कि हाल में दी गई राहत अगर नहीं मिलती तो यह वस्त्र उद्योग दम तोड़ देता। जीएसटी के कारण पिछले एक पखवाड़े में भीलवाड़ा के एक दर्जन से ज्यादा यार्न बंद हो गए हैं और इस कारोबार से जुड़े कई एजंटों ने यह धंधा ही छोड़ दिया है। भीलवाड़ा के कपड़ा उद्योग के इतिहास में यह पहला मौका है जब दीपावली और त्योहारी सीजन में ज्यादातर वीविंग लूम बंद हंै। भीलवाड़ा के कपड़ा उद्यमी जीसी जैन का कहना है कि हालात ऐसे हो गए हैं कि 25 फीसद श्रमिक भीलवाड़ा छोड़ कर बिहार और उत्तर प्रदेश चले गए हैं। जीएसटी लागू होने के बाद से ही टेक्सटाइल उद्योग की हालत लगातार बिगड़ रही है। जीएसटी से पहले भीलवाड़ा में आठ करोड़ मीटर कपड़े का उत्पादन हो रहा था जो अब घट कर चार करोड़ मीटर रह गया है। श्रमिकों को वेतन और कर्ज पर ब्याज देना ही कारोबारियों को भारी पड रहा है। जैन ने बताया कि कपड़े और यार्न की कीमतों में बढ़ोतरी होने से छोटे व्यापारियों की लागतबढ़ गई है।

जीएसटी ने बर्तन व्यवसाय को भी मंदी के दौर में धकेल दिया। जयपुर में त्रिपोलिया बाजार में बर्तनों के बड़े कारोबारी रामेश्वर प्रसाद ने तो साफ तौर पर कहा कि सरकार ने नीतियों में बदलाव नहीं किया तो बर्तन व्यवसाय ठप हो जाएगा। उनका कहना है कि दीपावली और धनतेरस जैसे त्योहार पर बर्तनों का बड़ा कारोबार होता है। इस बार सीजन होने के बावजूद उनके यहां छोटे व्यापारी नहीं आ रहे हैं। इसी तरह की स्थिति खाद्य व्यापार के कारोबार से जुड़े लोगों की भी दिखी। राजस्थान खाद्य पदार्थ व्यापार महासंघ के अध्यक्ष बाबूलाल गुप्ता का कहना है कि जीएसटी को छोटा कारोबारी तो समझ ही नहीं पा रहा है। मंडियों में माल अटका पड़ा है। छोटे कारोबारी को रिटर्न के झमेले समझ ही नहीं आ रहे हैं। सरकार ने इस मामले में जल्द ही कोई हल नहीं निकाला तो बेरोजगारी बेतहाशा बढ़ जाएगी। खाद्य पदार्थों के फुटकर छोटे किराना व्यापारी तो पूरी तरह से इधर से उधर चक्कर लगा कर रिटर्न भरने के फॉर्मूले समझने में लगे हैं। उनका ज्यादातर समय तो कर सलाहकारों के यहां ही गुजर रहा है ताकि जुर्माने से बचा जा सके।

प्रदेश में लोहे के व्यापार से जुड़े छोटे बड़े सभी कारोबारी भी जीएसटी की नीतियों के कारण परेशानी महसूस कर रहे हैं। जयपुर में विश्वकर्मा औद्योगिक क्षेत्र में बडी संख्या में सरिया कारोबारी हैं। इस क्षेत्र की एसोसिएशन के प्रमुख पदाधिकारी और सरिया कारोबारी सीताराम अग्रवाल का कहना है कि इस समय उनके धंधे की स्थिति बहुत ही खराब है। लोगों के पास पैसा नहीं होने से ग्राहकी है ही नहीं। पिछले वर्ष उनका कारोबार बहुत अच्छा था पर अब नोटबंदी और जीएसटी के कारण पिछले तीन महीने में तो धंधा आधे से भी कम रह गया है। उनका कहना है कि सरकार को रिटर्न भरने वाली कवायद में बडी राहत देनी चाहिए। व्यापारी रिटर्न ही भरता रहेगा तो फिर कारोबार कैसे कर पाएगा। जयपुर में आभूषणों का धंधा भी जीएसटी के कारण मंदा हो गया है।
इन कारोबारियों के यहां काम करने वाले श्रमिकों की बड़े पैमाने पर छंटनी की तैयारी भी शुरू हो गई है। प्रमुख आभूषण कारोबारी राजीव अरोड़ा का कहना है कि शादी पर दिए जाने वाले गहने और सोने पर निवेश करने वाले केवाइसी की प्रक्रिया से नहीं गुजरना चाहते हैं। इस प्रक्रिया से उनको लगने लगा कि उन्हें अतिरिक्त कर देना होगा। नतीजतन, पिछले कुछ दिनों में इसका कारोबार बहुत ज्यादा घट गया। सरकार की जीएसटी समेत कई जटिल टैक्स प्रक्रिया के कारण ही यह कारोबार घट कर 50 फीसद पर आ गया है।

 

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