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राजस्‍थान विधानसभा चुनाव: 21 चेहरे पहले जीते निर्दलीय फिर जिसे हराया उसी दल ने दिया टिकट

नदबई विधान सभा सीट से साल 2003 में कृष्णेंद्र कौर दीपा निर्दलीय तुनाव जीतीं। इसके बाद 2008 के चुनाव में भाजपा ने उन्हें ही उम्मीदवार बनाया। 2013 में जब वो तीसरी बार जीतीं तो सीएम वसुंधरा राजे ने उन्हें मंत्री बनाया।

तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है।

राजस्थान में 7 दिसंबर को वोटिंग होगी। उससे पहले सभी राजनीतिक पार्टियों में टिकट के दावेदार जी तोड़ कोशिश कर रहे हैं। मगर राज्य में कुछ सीटें ऐसी हैं जहां किसी भी पार्टी की लहर होने के बावजूद वहां से निर्दलीय उम्मीदवार ही जीते और हैरत की बात यह है कि उन निर्दलियों ने जिन-जिन दलों के प्रत्याशियों को मात दी, उन्हीं दलों ने उन्हें अगले चुनाव में उम्मीदवार बनाया। राजस्थान विधान सभा चुनाव 1993, 1998, 2003, 2008 और 2013 के आंकड़ों पर गौर करें तो पता चलता है कि 1993 में राज्य में कुल 21 निर्दलीय चुनाव जीते। 200 सदस्यीय विधान सभा वाले राज्य में तब निर्दलियों की मदद से बीजेपी के भैरो सिंह शेखावत ने सरकार बनाई। 1998 में राज्य में कांग्रेस को प्रचंड बहुमत मिला बावजूद इसके सात सीटों पर निर्दलीय ही जीते। इसी तरह 2013 के विधान सभा चुनावों में भी राज्य में भाजपा की लहर थी और भाजपा को प्रचंड बहुमत हासिल हुआ लेकिन सात सीटें ऐसी थीं जिन पर निर्दलीयों ने बाजी मारी। इनमें कई चेहरे ऐसे हैं जो मंत्री भी बनाए गए।

नदबई विधान सभा सीट से साल 2003 में कृष्णेंद्र कौर दीपा निर्दलीय तुनाव जीतीं। इसके बाद 2008 के चुनाव में भाजपा ने उन्हें ही उम्मीदवार बनाया। 2013 में जब वो तीसरी बार जीतीं तो सीएम वसुंधरा राजे ने उन्हें मंत्री बनाया। रतनगढ़ में 2003 के चुनाव में राजकुमार रिणवा निर्दलीय जीते। उन्होंने भाजपा के दिग्गज नेता हरिशंकर भाभड़ा को हराया। इसके बाद 2008 में भाजपा ने उन्हें बुलाकर टिकट दिया। 2013 के चुनावों में भी रिणवा भाजपा के टिकट पर जीते और वसुंधरा सरकार में बने।

श्रीमाधोपुर सीट पर हरलाल सिंह खर्रा 1985 से 1998 तक भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़े लेकिन 1993 और 1998 में लगातार दो चुनाव हारने के बाद 2003 में कांग्रेस ने उनका टिकट काट दिया। बावजूद इसके खर्रा निर्दलीय लड़े और जीत दर्ज की। उन्होंने भाजपा उम्मीदवार को हराया था। इसके बाद 2008 में भाजपा ने उन्हें टिकट दिया लेकिन वे हार गए। पिछले चुनाव यानी 2013 में इस सीट पर उनके पुत्र झाबर सिंह खर्रा ने बाजपा के टिकट पर जीत दर्ज की थी।

नौ बार कांग्रेस की विधायक रहने वाली सुमित्रा सिंह को 1998 में पार्टी ने टिकट नहीं दिया। नाराज सुमित्रा सिंह ने फिर से झूंझुनू सीट ताल ठोका और वो निर्दलीय जीतीं। उन्होंने भाजपा उम्मीदवार को हराया। इसके बाद 2003 और 2008 में उन्हें दो बार भाजपा ने टिकट दिया। 2013 में फिर उन्हें कांग्रेस ने टिकट दिया। इसी तरह प्रतिभा सिंह 2003 में निर्दलीय चुनाव जीतीं। इसके बाद 2008 और 2013 में कांग्रेस ने टिकट दिया लेकिन वे चुनाव हार गईं।

इसी तरह पिलानी से निर्दलीय विधायक रहे श्रवण कुमार ने 1993 में कांग्रेस उम्मीदवार को हराया था। बाद में 1998 में कांग्रेस ने उन्हें टिकट दिया था। 1980 में लाडनूं से निर्दलीय जीतने वाले रामधन को भी 1985 में कांग्रेस ने टिकट दिया था लेकिन वो हार गए थे। पचपदरा सीट पर 1993 में अमरा राम ने भाजपा के चंपालाल को हराया था, 1998 में भाजपा ने उन्हें ही उम्मीदवार बनाया। मौजूदा सरकार में वो राजस्व मंत्री हैं। 8 बार विधायक और कांग्रेस सरकार में वित्त मंत्री रह चुके प्रद्युम्न सिंह ने 1977 में निर्दलीय चुनाव लड़ा। हालांकि इससे पहले वे कांग्रेस के टिकट पर ही चुनाव जीतते रहे। जहाजपुर सीट से दो बार निर्दलीय जीते रतनलाल तांबी और खंडेला विधानसभा सीट पर महादेव सिंह खंडेला के साथ भी ऐसा ही संयोग रहा है।

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