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राजस्‍थान में बसपा प्रमुख मायावती ने राहुल गांधी को क्‍यों दिया झटका, जानिए

1990 में तो बसपा के सभी 57 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी। हालांकि, 1998 में बसपा ने यहां जीत का स्वाद चखा और उसके दो दो विधायक जीत कर विधानसभा पहुंचे।

Author जयपुर | October 5, 2018 1:40 PM
बसपा सुप्रीमो मायावती और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी।

बसपा सुप्रीमो मायावती ने बुधवार (03 अक्टूबर) को राजस्थान चुनावों में कांग्रेस से गठबंधन नहीं करने का एलान कर राहुल गांधी को जोरदार झटका दिया है। मायावती की इस चाल से विपक्षी एकता न सिर्फ चकनाचूर हुई है बल्कि 2019 के लोकसभा चुनाव में संभावित महागठबंधन पर भी संशय के बादल मंडराने लगे हैं। दरअसल, मायावती को ऐसा लगता है कि उनकी पार्टी साल 2008 के विधानसभा चुनाव जैसी स्थिति राजस्थान में दोहराएगी। बता दें कि उस वक्त 200 सदस्यीय विधान सभा में किसी भी दल को बहुमत हासिल नहीं हुआ था और बसपा को छह सीटें मिली थीं। तब अशोक गहलोत ने निर्दलीय विधायकों के समर्थन से राज्य में सरकार बनाई थी। सरकार बनने के चार महीने के अंदर ही बसपा के सभी विधायक कांग्रेस में शामिल हो गए थे।

राजस्थान के चुनावों में पिछले दो दशकों में ऐसा पहली बार हुआ था जब भाजपा या कांग्रेस, किसी ने भी बहुमत हासिल नहीं किया था। राज्य में बसपा 1990 से चुनाव लड़ रही है। शुरुआत में पार्टी राज्य के पूर्वी हिस्से जहां अनुसूचित जाति समुदाय की अच्छी आबादी है, वहीं जीत दर्ज कर सकी थी। 1990 में तो पार्टी के सभी 57 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी। हालांकि, 1998 में बसपा ने यहां जीत का स्वाद चखा और उसके दो विधायक जीत कर विधानसभा पहुंचे। उस साल बसपा के 50 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हुई थी। साल 2003 के विधान सभा चुनाव में बसपा ने दौसा और करौली जिलों में भी जीत दर्ज की। इससे भी बड़ी बात यह थी कि इस चुनाव में बसपा के वोट प्रतिशत में इजाफा हुआ और इसका असर कांग्रेस और बीजेपी के वोट शेयर पर पड़ा।

साल 2008 में जब मायावती यूपी की सीएम थीं तब उनका प्रभाव राजस्थान के झुंझुनू और सवाई माधोपुर जिलों तक दिखा और पार्टी ने छह सीटें जीतीं। साल 2013 में बसपा ने सदुलपुर, खेतड़ी और धौलपुर सीटें जीतीं। बाद में धौलपुर के विधायक बी एल कुशवाह एक मर्डर केस में दोषी ठहराए गए। इससे उनकी सदस्यता छिन गई। उसी सीट पर साल 2016 में हुए उप चुनाव में उनकी पत्नी शोभारानी कुशवाह ने बीजेपी के टिकट पर चुनाव जीता। 1993 के बाद पहली बार 2013 में बसपा के वोट शेयर में गिरावट दर्ज की गई। पार्टी ने तब मात्र 1.5 फीसदी वोट ही हासिल किए।

राजस्थान के विधान सभा चुनावों में बसपा के लिए यह रोचक रहा है कि उसने कभी भी दोबारा किसी भी सीट पर जीत दर्ज नहीं की। यानी हर विधान सभा चुनाव में पार्टी के नेता अलग-अलग सीटों पर जीतते रहे। बता दें कि राज्य के पूर्वी जिलों के अलावा गंगानगर और हनुमानगढ़ जिलों में भी बसपा का अच्छा आधार है क्योंकि वहां भी अनुसूचित जाति की संख्या अच्छी है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सीताराम मेघवाल के अनुसार बसपा राज्य के सभी 200 सीटों पर उम्मीदवार उतारेगी। अगर ऐसा हुआ तो निश्चित तौर पर कांग्रेस के लिए बड़ा झटका होगा। कांग्रेस पांच साल बाद यहां सत्ता की वापसी की उम्मीद लगाए बैठी है। राज्य में दलितों की आबादी 17 फीसदी है जो सरकार बनाने में बड़ी भूमिका निभाते हैं।

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