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करोड़ों खर्च के बाद भी चिकित्सा बेहाल

राजस्थान में आयुर्वेद और देसी चिकित्सा का चलन बहुत पुराना है। आयुर्वेद चिकित्सा की दुर्दशा के लिए नौकरशाही का रवैया जिम्मेदार है। नौकरशाही आयुर्वेद को दोयम दर्जे का मानती है और उसी तरह का बर्ताव इस चिकित्सा से कर रही है।

प्रदेश में आयुर्वेद के 118 चिकित्सालय और 3577 औषधालय का बड़ा नेटवर्क है।

राजीव जैन

राजस्थान में आयुर्वेद चिकित्सा का सरकारी लापरवाही और अनदेखी के कारण बुरा हाल है। प्रदेश के 75 फीसद से ज्यादा आयुर्वेद अस्पतालों में मरीजों के लिए जरूरी दवाओं का ही नहीं पीने के पानी और शौचालय की भी व्यवस्था नहीं है। साथ ही आयुर्वेद दवाओं को बनाने की सरकारी रसायन शालाओं की हालत भी बदहाल है। यहां बनने वाली दवाओं की गुणवत्ता की जांच होने की कोई व्यवस्था नहीं है और यहां बाजार दर से कई गुना महंगी दवाएं बन रही है। इसके कारण ये दवाएं मरीज की पहुंच से बाहर हैं।

प्रदेश में आयुर्वेद चिकित्सा और शिक्षा पर पिछली सरकार ने वर्ष 2012 से 2017 तक 2655 करोड़ रुपए खर्च किए, लेकिन हालात अभी भी बदतर बने हुए है। आयुर्वेद चिकित्सा और शिक्षा को लेकर भारत के नियंत्रक-महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट के मुताबिक करोड़ों रुपए खर्च होने के बावजूद रकम का सही उपयोग नहीं हो पाया है। रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में आयुर्वेद के 118 चिकित्सालय और 3577 औषधालय का बड़ा नेटवर्क है। कैग की रिपोर्ट के अनुसार आयुर्वेद स्वास्थ केंद्रों में 75 फीसद ऐसे है जहां मरीजों और उनके तीमारदारों के लिए पीने के पानी की सुविधा तक नहीं है। ऐसे ही हालत शौचालय के है। इसके साथ ही 47 फीसद केंद्रों में तो बिजली तक नहीं है।

प्रदेश के शैय्याओं वाले आयुर्वेद अस्पतालों में से 40 अस्पताल तो ऐसे है जहां पांच साल से, 48 अस्पतालों में चार साल से और 49 अस्पतालों में तीन साल से एक भी मरीज भर्ती नहीं हुआ है। इसके बावजूद इन अस्पतालों को बजट का आवंटन हर साल हो रहा है। आयुर्वेद चिकित्सक तो है पर उनके लिए जरूरी नर्स और आयुर्वेद कंपाउंडरों की कमी के कारण हालात बिगड़ रहे हैं। प्रदेश का आयुर्वेद विभाग दवाइयां बनाने और उनकी दरें कम रखने में भी फिसड्डी साबित हुआ है। सरकारी आयुर्वेद रसायन शालाओं में लक्ष्य से केवल 39 प्रतिशत दवाओं का उत्पादन किया गया है। प्रदेश की चार रसायन शालाओं में से दो तो पिछले पांच साल से बंद ही पड़ी है।

राजस्थान में आयुर्वेद और देसी चिकित्सा का चलन बहुत पुराना है। आयुर्वेद चिकित्सा की दुर्दशा के लिए नौकरशाही का रवैया जिम्मेदार है। नौकरशाही आयुर्वेद को दोयम दर्जे का मानती है और उसी तरह का बर्ताव इस चिकित्सा से कर रही है। प्रदेश में मौजूद आयुर्वेद अस्पतालों और औषधालयों में सरकार सुधार के व्यापक प्रयास करें तो लोगों को राहत मिल सकती है।
-रघुनंदन शर्मा, प्रदेश में आयुर्वेद विभाग के सेवानिवृत्त चिकित्सक

आयुर्वेद और भारतीय चिकित्सा पद्वतियों को बढ़ावा देने के लिए सरकार इसके बजट में बढ़ोतरी की है और इनके चिकित्सकों और अन्य स्टाफ के पदों को बढ़ाया है। आयुर्वेद चिकित्सा पर लोगों का अभी भी बड़ा भरोसा है और सरकार राजस्थान में इस चिकित्सा को आगे बढ़ाएगी। विभाग की सामने आई कमियों को लेकर अफसरों के साथ बैठक कर उनमें सुधार के कदम उठाने शुरू कर दिए है। आयुर्वेद डिस्पेंसरियों व वेलनेस सेंटरों के लिए 400 कंपाउंडरों की भर्ती इसी वर्ष की जाएगी। उन्होंने कहा कि राज्य में 19 जगह प्राकृतिक चिकित्सा के सेंटर बनाए जा रहे है।
-रघु शर्मा, आयुर्वेद चिकित्सा मंत्री

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