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लचर कानून से मिलावटखोर कर रहे सेहत से खिलवाड़

प्रदेश में हाल में 11 से 20 फरवरी तक स्वास्थ्य विभाग की तरफ से मिलावटी खाद्य पदार्थ की धरपकड़ के लिए चलाए गए अभियान के दौरान फूड सेफ्टी आफिसर ने 200 सैंपल लिए। इसमें मिलावट का अंदेशा होने पर 1500 किलो दाल, 1500 किलो बेसन, 100 किलो मटर, 250 किलो काजू, 700 किलो बादाम और 500 किलो दूध और दूध से बने अन्य उत्पाद नष्ट करवाए गए।

Author March 6, 2019 4:45 AM
जयपुर, अजमेर, कोटा, उदयपुर, अलवर और जोधपुर में फूड लैब स्थापित है

राजस्थान में मिलावटखोरों के खिलाफ चल रहे अभियान में लचर कानून के कारण कारगर कार्रवाई नहीं हो पा रही है। इससे मिलावटोरों का धंधा जोर शोर से चलता है और लोगों की सेहत से खिलवाड़ जारी है। प्रदेश में इन दिनों स्वास्थ विभाग दालों, घी, बेसन, मावा, पनीर जैसी खाने पीने की चीजों में हो रही मिलावट की धरपकड़ में लगा है। ऐसा करने वालों के खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई का प्रावधान ही नहीं है। मिलावट रोकने के लिए 2008 में बना फूड सेफ्टी एक्ट-2011 लागू होने के बाद भी मिलावटियों का धंधा नहीं थम रहा है। इस एक्ट में ज्यादातर में मिलावटखोरों पर सिर्फ जुर्माना होता है।

प्रदेश में आठ साल के आंकड़ों पर गौर करने पर साफ होता है कि खाद्य पदार्थों के 51 हजार 580 नमूने लिए गए। इनमें से 11587 मिलावटी निकले। इनमें से 1 हजार 800 से ज्यादा मानव स्वास्थ्य के लिए खतरनाक पाए गए। इस कानून के मुताबिक मिलावटखोरों को आजीवन कारावास की सजा तक का प्रावधान है, पर इसके लिए साबित करना होगा कि मिलावटी पदार्थ से किसी की मौत हुई है। इसे साबित करना ही सबसे बड़ा मुश्किल है। इसमें मिलावट की जांच का तरीका ही इतना पेचीदा है कि मिलावटखोर आसानी से बच जाता है और मामूली से जुर्माने के बाद फिर से अपना धंधा शुरू कर देता है।

स्वास्थ्य विभाग बाजार या किसी अन्य जगह से खाद्य पदार्थ के नमूने लेता है और उसे जांच के लिए लैब में भेज देता है। प्रदेश में खाद्य पदार्थो की जांच के लिए पहले तो समुचित लैब ही नहीं है और उनके उपकरण भी अवधिपार हो गए हैं। जांच रिपोर्ट आने तक तो मामला ही दब जाता है। प्रदेश में हाल में 11 से 20 फरवरी तक स्वास्थ्य विभाग की तरफ से मिलावटी खाद्य पदार्थ की धरपकड़ के लिए चलाए गए अभियान के दौरान फूड सेफ्टी आफिसर ने 200 सैंपल लिए। इसमें मिलावट का अंदेशा होने पर 1500 किलो दाल, 1500 किलो बेसन, 100 किलो मटर, 250 किलो काजू, 700 किलो बादाम और 500 किलो दूध और दूध से बने अन्य उत्पाद नष्ट करवाए गये। इन चीजों के लिए गये सैंपल की जांच रिपोर्ट कब तक आएगी, इसे बताने में विभाग के पास कोई जवाब नहीं है।

प्रदेश में जयपुर, अजमेर, कोटा, उदयपुर, अलवर और जोधपुर में फूड लैब स्थापित है और इनमें भेजे गए नमूनों की जांच रिपोर्ट 14 दिन में आने का प्रावधान है पर ज्यादातर मामलों में रिपोर्ट छह महीने से पहले आती ही नहीं है। मिलावटखोरों के खिलाफ फूड सेफ्टी स्टैंडर्ड एक्ट-2006 के तहत कार्रवाई की जा रही है। फूड सेफ्टी कानून के जानकार एडवोकेट दीपक पांडे का कहना है कि मिलावटखोरों के खिलाफ बना नया कानून बेहद लचर है। इसके कारण ही ज्यादातर मामलों में कड़ी कार्रवाई नहीं हो पाती है।

पांडे का कहना है कि पहले जहां हर मामला दांडिक अदालत में दर्ज कराया जाता था, जिसमें जुर्माना और सजा दोनों का प्रावधान था। नए कानून में सामान्य मिलावट में जुर्माने का कहीं प्रावधान है। इसका मुकदमा भी एडीएम की अदालत में ही चलता है। इसमें छह महीने तक मुकदमा चलता है और मिलावट करने वाले को उसके व्यापार के मुताबिक जुर्माना लगा कर मुक्त कर दिया जाता है। असुरक्षित मामले ही दांडिक न्यायालय तक पहुंचते है, जिसमें कारावास की सजा का प्रावधान है। ऐसे मामले अदालतों में लंबे चलते है और मिलावटखोर उसका फायदा उठा लेते है।

फूड सेफ्टी कमिश्नर डॉक्टर वीके माथुर का कहना है कि ऐसा नहीं है कि मिलावटी मामलों में सजा नहीं हुई हो। मिलावट साबित होने पर कुछ मामलों में मिलावटखोरों को सजा भी हुई है पर ऐसे मामले बहुत कम हैं। खाद्य पदार्थों की जांच में सब स्टेंडर्ड और मिस ब्रांड के मामले एडीएम के पास जाते हैं और इनमें जुर्माने और सजा का प्रावधान है। मानव स्वास्थ्य के लिए खतरनाक मामले सीजेएम कोर्ट में जाते है और साबित होने पर मिलावटियों को कारावास तक की सजा होती है। स्वास्थ्य विभाग लगातार मिलावट के खिलाफ अभियान चला रहा है। इसके नतीजे भी सामने आ रहे हैं और लोग भी जागरूक हो रहे हैं।

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