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विशेषः सरकारी लापरवाही के कारण सिलिकोसिस बीमारी खतरनाक बनी

राजस्थान में सरकार की लापरवाही और उसके विभागों में तालमेल की कमी की कमी के कारण सिलिकोसिस बीमारी खतरनाक तरीके से अपने पैर पसार रही है।
Author जयपुर | April 11, 2018 06:45 am
असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के बीच काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता सुभाष बाफना ने इस मामले को सरकार के सामने उठाया है।

राजस्थान में सरकार की लापरवाही और उसके विभागों में तालमेल की कमी की कमी के कारण सिलिकोसिस बीमारी खतरनाक तरीके से अपने पैर पसार रही है। यह बीमारी पत्थर खनन, ब्लास्टिंग, रत्न काटने और चमकाने, कांच उत्पाद आदि कामों से जुड़े मजदूरों को चपेट में ले रही है। स्वास्थ विभाग इसे चिंताजनक स्थिति कह रहा है। उसका कहना है कि लगाम लगाने के लिए प्रदूषण नियंत्रण विभाग और खान व भू-विज्ञान विभागों को पहल करनी चाहिए। इन दोनों विभागों में कोई तालमेल नहीं होने से ही हालत गंभीर होती जा रही है। मानवाधिकार आयोग और सीएजी की रिपोर्ट में भी इस पर चिंता जताई गई है।

चिकित्सा और स्वास्थ विभाग के आंकड़ों के अनुसार सिलिकोसिस किस तेजी से पैर पसार रहा है उसका अंदाजा इससे ही लगता है कि जहां 2013-14 में इससे ग्रस्त 304 मरीज थे, वे चार साल में बढकर 4931 हो गए। इस कारण इन सालों में 449 मरीजों की मौत भी हो गई। प्रदेश में बड़े पैमाने पर पत्थर खनन, बजरी के साथ क्रेशर, सैंड, ढुलाई, रत्न कारोबार, स्लेट-पेंसिल आदि से लाखों मजदूर जुड़े हुए हैं। ऐसे कामों में लगे मजदूरों की हर पल की सांस के साथ सिलिका शरीर के अंदर चली जाती है। इससे ही उनमें सिलिकोसिस बीमारी पनपने का खतरा बना रहता है।

सीएजी ने तो अपनी रिपोर्ट में चिकित्सा विभाग की रिपोर्ट का हवाला देते हुए प्रदेश में इसकी भयावह स्थिति बताई है। प्रदेश के लाखों मजदूरों की जिंदगी दांव पर लगी होने के बावजूद इस पर काबू पाने के लिए सरकार ने कोई भी मजबूत योजना शुरू तक नहीं की है। 2013-14 में इस बीमारी के कारण जहां एक मजदूर की मौत हुई थी वहीं 2016-17 में यह संख्या 235 हो गई। इस बीमारी से 2014-15 में 905 मरीज थे इनमें से 60 की मौत हो गई। 2015-16 में 2186 मरीज थे और मौतों का आंकड़ा 153 पहुंच गया। इसी तरह से 2016-17 में मरीजों की संख्या 1536 हो गई और मरने वालों की संख्या 235 तक पहुंच गई।

इस बीमारी को लेकर मानवाधिकार आयोग ने 2014 में ही चेता दिया था। आयोग ने केंद्रीय श्रम व रोजगार मंत्रालय को सिलिकोसिस के फैलाव को रोकने के लिए कई सिफारिशें भेजी थीं। मंत्रालय ने प्रदेश के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और खान व भू-विज्ञान विभाग को इसे आवश्यक कार्यवाही के लिए भेज दिया है। इन सिफारिशों में दोनों विभागों के उड़न दस्ते गठित कर ऐसे उद्योगों की पड़ताल कर उन्हें प्रदूषण से मुक्त करने के लिए भी कहा गया।
तीन साल बीतने के बाद भी दोनों विभाग लापरवाह बने हुए हैं और श्रमिकों को बचाने के लिए किसी तरह के कारगर कदम नहीं उठाए गए हैं। डॉक्टर आरसी गुप्ता का कहना है कि धूल कण सांस लेने के साथ शरीर में पहुंच जाते है। इससे सीने में दर्द, खांसी और सांस लेने में तकलीफ होती है। इससे मरीज का वजन भी कम होने लगता है। इस तरह के मरीज ज्यादातर ऐसे उद्योगों के श्रमिक हैं जो खनन और धूल मिट्टी जैसे कामों से जुड़े हुए हैं। इसके लिए ऐसे उद्योगों में काम करने वाले मजदूरों को मास्क पहन कर काम करना चाहिए।

असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के बीच काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता सुभाष बाफना ने इस मामले को सरकार के सामने उठाया है। बाफना का कहना है कि श्रम विभाग के साथ ही प्रदूषण नियंत्रण विभाग की लापरवाही के कारण ही सिलिकोसिस की समस्या दिन प्रति दिन गंभीर होती जा रही है। मजदूरों की कार्यदशा सुधारने की तरफ सरकार कोई ध्यान ही नहीं दे रही है। अशिक्षित मजदूर वर्ग के लोगों को इस दिशा में जागरूक किया जाना जरूरी है। उन्हें काम के दौरान मास्क की सुविधा मालिकों को उपलब्ध करानी चाहिए। इसके लिए श्रम विभाग को कठोरता से मानवाधिकार आयोग की सिफारिशों और अन्य मजदूर संगठनों की मांग पर ध्यान देना चाहिए। बाफना का कहना है कि अगर समय रहते इस तरफ कदम नहीं उठाया गया तो प्रदेश के मजदूरों में यह बीमारी आम हो जाएगी।

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