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निगरानी की कमी के कारण मौत के मुंह में समा रहे एचआइवी मरीज

वर्ष 2013-14 में जहां संक्रमित मरीजों में से करीब 17 फीसद की मौत हुई थी। वहीं 2016-17 में मौत का यह आंकड़ा 25 फीसद पर पहुंच गया। ऐसे ही हालत 14 साल तक के बच्चों को लेकर है जहां मरीज घट रहे हैं पर उनकी मौत बढ़ रही है।

Author जयपुर | January 2, 2019 10:49 AM
प्रतीकात्मक फोटो (फाइल)

राजस्थान में चिकित्सा विभाग की लापरवाही और निगरानी की कमी के कारण जानलेवा वायरस एचआइवी के साथ जी रहे मरीजों की आफत पर बन आई है। प्रदेश में 30 हजार 579 एचआइवी मरीजों में से चार साल में 6 हजार 301 मौत के मुंह में समा गए हैं। इनकी मौत के लिए सबसे ज्यादा लापरवाही चिकित्सा महकमे की सामने आई है। मरने वालों में पुरुष और महिलाएं ही नहीं चार साल में 331 बच्चे भी हैं, जिन्हें बचाया जा सकता था। विशेषज्ञों का कहना है कि प्रदेश में एचआइवी मरीजों के लिए सही तरीके से काउंसिलिंग की कोई व्यवस्था ही नहीं है। प्रदेश के चिकित्सा और स्वास्थ महकमे में एड्स रोगियों के लिए अलग से एक प्रकोष्ठ बना हुआ है। इसमें निदेशक स्तर का चिकित्सा अधिकारी भी तैनात है। इसके बावजूद प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में एड्स पीड़ितों की सही ढंग से देखभाल नहीं हो रही है। एचआइवी पीड़ितों की मौत के आंकड़ों से साफ होता है कि चिकित्सा विभाग घोर लापरवाही बरत रहा है।

विभाग पूरी तरह से पीड़ितों की देखभाल और समय पर निगरानी करें तो ज्यादातर को बचाया जा सकता है। हैरानी की बात है कि प्रदेश में एचआइवी पाजिटिव पीड़ितों की संख्या घट रही है। इसके बावजूद मरने वाले का फीसद लगातार बढ़ रहा है। वर्ष 2013-14 में जहां संक्रमित मरीजों में से करीब 17 फीसद की मौत हुई थी। वहीं 2016-17 में मौत का यह आंकड़ा 25 फीसद पर पहुंच गया। ऐसे ही हालत 14 साल तक के बच्चों को लेकर है जहां मरीज घट रहे हैं पर उनकी मौत बढ़ रही है। इस कारण एड्स नियंत्रण कार्यक्रम की पोल खुल गई है। इस कार्यक्रम के लिए केंद्र से हर साल 20 से 25 करोड़ रुपए का बजट राज्य के चिकित्सा विभाग को मिलता है।

एड्स पीड़ित बच्चों की मौत पर तो राज्य बाल संरक्षण आयोग ने भी चिकित्सा विभाग से गहरी चिंता भी जताई थी। बाल संरक्षण आयोग की निवर्तमान अध्यक्ष मनन चतुर्वेदी का कहना है कि उन्होंने इस बारे में प्रदेश के स्वास्थ महकमे के एड्स निदेशक को भी पत्र लिख कर बच्चों के बारे में प्रभावी कार्रवाई का निर्देश दिया था। उनका कहना है कि राजस्थान के समस्त एचआइवी संक्रमित व प्रभावित बच्चों को पालनहार योजना से जोड़ा जाना चाहिए। इस योजना के तहत बच्चों को सरकार से एक हजार रुपए हर महीने की राशि मिलती। इसके जरिये बच्चों की सही चिकित्सा में सहायता मिल सकती है। इस बारे में अब नई सरकार को नए सिरे से विचार करना चाहिए और बच्चों को बचाने और उनमें आत्मबल जाग्रत करने का अभियान भी चलाना चाहिए।

प्रदेश के एड्स नियंत्रण महकमे के मुताबिक वर्ष 2013-14 में 4271 पुरुष, 3098 महिला और 541 बच्चे पाजिटिव थे। इनमें से 871 पुरुष, 397 महिला और 57 बच्चों की मौत हो गई। इसी तरह से वर्ष 2014-15 में 4415 पुरुष, 3143 महिला और 576 बच्चे पाजिटिव थे। इनमें से 1073 पुरुष, 478 महिला और 77 बच्चों की मौत हो गई। 2015-16 में 4087 पुरुष, 2898 महिला और 502 बच्चे पाजिटिव थे। इनमें से 1041 पुरुष, 494 महिला और 85 बच्चों की मौत हो गई। वर्ष 2016-17 में 3904 पुरुष, 2678 महिला और 466 बच्चे पाजिटिव थे। इनमें से 1093 पुरुष, 523 महिला और 92 बच्चों की मौत हो गई।

राजस्थान एड्स कंट्रोल सोसायटी से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता सुभाष बाफना का कहना है कि एचआइवी संक्रमित मरीजों को सही समय पर दवा, इलाज और प्रापर क ाउंसलिंग मिलने पर मौत के मुंह से बचाया जा सकता है। केंद्र सरकार से बड़ी रकम इस काम के लिए मिलने के बावजूद हर साल मौत का आंकड़ा बढ़ना चिंताजनक है। इसके साथ ही प्रदेश में रजिस्टर्ड मरीजों का सही फालोअप नहीं हो रहा है। जागरूकता की भी कमी होना बड़ा कारण है। सरकार को मरीजों के बीच जागरूकता और उनकी सही चिकित्सा पर पूरा ध्यान देना चाहिए। इसके साथ ही संक्रमित मरीजों के लिए प्रशिक्षित डॉक्टर और नर्सिंग स्टाफ का भी होना जरूरी है जो प्रदेश में नहीं है।

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