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राजस्थान: दलित महिलाओं से बलात्कार व हत्या के मामले बढ़े

राजस्थान में दलित महिलाओं से बलात्कार के साथ ही इस तबके के लोगों की हत्याओं के मामलों में पिछले चार साल में काफी बढ़ोतरी हुई है। राज्य अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के हिसाब से दलितों पर अत्याचार के मामले लगातार बढ़ रहे हैं।

Author जयपुर। | June 13, 2018 9:12 AM
तस्वीर का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है। (फोटोः Freepik)

राजस्थान में दलित महिलाओं से बलात्कार के साथ ही इस तबके के लोगों की हत्याओं के मामलों में पिछले चार साल में काफी बढ़ोतरी हुई है। राज्य अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के हिसाब से दलितों पर अत्याचार के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। इन आंकड़ों की पड़ताल में सामने आया कि गंभीर क्षति व चोट पहुंचाने के मामलों का ग्राफ तो घटा है पर हत्या और बलात्कार के मामलों में बढ़ोतरी ने दलित तबके में चिंता पनपा दी है। पुलिस का मानना है कि हत्या जैसे मामले तो आपसी रंजिश के तहत ज्यादा हुए है। इनके अलावा दलितों के छुआछूत और घोड़ी पर न चढ़ने जैसे मामले पहले की ही तरह सामने आ रहे हैं। इस वर्ष दलितों की तरफ से हुए भारत बंद के दौरान हुई हिंसा और उसके बाद के बंद में भी कई इलाकों में दलितों के घर फूंकने और मारपीट व तोड़फोड़ के मामले दर्ज हुए हैं। सरकार दो अप्रैल के बंद और बाद के मामलों की समीक्षा कर इन्हें खत्म करने की तैयारी में भी है।

महिला मुख्यमंत्री के शासन में दलित महिलाओं के असुरक्षित होने को लेकर कई मानवाधिकार और महिला संगठनों ने भी आवाज उठाई है। इन मामलों में सबसे चिंताजनक तो है इनके निपटारे की गति का धीमा रहना। हत्या के आधे मामलों का पुलिस अभी तक खुलासा ही नहीं कर पाई है। ब्यूरो के मुताबिक इस वर्ष के मामले तो अभी अनुसंधान में ही चल रहे है। दलित अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले चिंतक सीताराम मेघवाल के मुताबिक एससी-एसटी एक्ट के तहत तो दलितों को अपना मुकदमा दर्ज करवाने के लिए पुलिस के चक्कर ही काटने पड़ते हैं।

इस तरह के अपराध पहले तो पुलिस दर्ज करने में ही आनाकानी करती है और दर्ज भी कर लेती है तो ज्यादातर में अंतिम रिपोर्ट लगा कर उन्हें दाखिल दफ्तर कर देती है। मेघवाल का कहना है कि पिछले चार साल में तो दलितों को सबसे ज्यादा परेशानी का सामना करना पड़ा है और उनकी कहीं सुनवाई भी नहीं हो रही है।

“प्रदेश में सरकार चाहे कांग्रेस की रही हो या भाजपा की दलितों पर अत्याचार के मामले रुके नहीं। प्रदेश में अभी भी सामंती सोच के कारण दलित दूल्हे को घोड़ी पर चढ़ने के लिए पुलिस की मदद लेनी पड़ती है। दलितों के हत्या, बलात्कार और अन्य अपराधों के मामलों में सामाजिक भेदभाव एक बड़ा कारण भी है।”

– सीताराम मेघवाल, दलित अधिकार चिंतक

“वर्ष 2013 के बाद दलितों की हत्या और बलात्कार के मामले बढ़े हुए दिखने की वजह अदालतों की सख्ती के साथ ही जागरूकता भी है जिसके कारण मुकदमे थानों में फौरन दर्ज होने लगे हैं। पहले ऐसा नहीं होता था।इसके अलावा कई संगठन भी इस क्षेत्र में काम कर रहे हैं जिससे दलितों को उनके अधिकारों के साथ कानूनी पहलुओं की भी जानकारी होने लगी है। ”
-पंकज चौधरी, पुलिस अधीक्षक, राजस्थान राज्य अपराध रिकार्ड ब्यूरो

कितने मामले

चार साल में अनुसूचित जाति की 1275 व अनुसूचित जनजाति की 298 महिलाओं से बलात्कार की घटनाएं हुर्इं। इससे पहले 2010 से 2013 में अनुसूचित जाति की महिलाओं से बलात्कार के 912 मामले दर्ज हुए थे। इसी तरह से जनजाति की महिलाओं से दुष्कर्म के 234 मामले दर्ज हुए थे। दुष्कर्म के साथ ही हत्या जैसे गंभीर मामलों में भी बढोतरी हुई है। ब्यूरो के अनुसार 2010 से 2013 के बीच अनुसूचित जाति के 249 लोगों की हत्या के मामले सामने आए तो 2014 से 2017 में इनकी संख्या 281 हो गई। 2010 से 2013 के बीच जनजाति के लोगों की 76 लोगों की हत्या हुई तो 2014 से 2017 के बीच 82 लोगों की हत्या के मामले दर्ज हुए।

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