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राजस्थान: करोड़ों खर्च के बाद भी आयुर्वेद अस्पताल जरूरी सुविधाओं को तरसे

राजस्थान में आयुर्वेद चिकित्सा का बड़ा चिकित्सा नेटवर्क होने के बावजूद सरकारी लापरवाही और अनदेखी के कारण इसका बुरा हाल हो रहा है।

Author जयपुर। | September 12, 2018 5:04 AM
चित्र का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है

राजस्थान में आयुर्वेद चिकित्सा का बड़ा चिकित्सा नेटवर्क होने के बावजूद सरकारी लापरवाही और अनदेखी के कारण इसका बुरा हाल हो रहा है। प्रदेश के 75 फीसद से ज्यादा आयुर्वेद अस्पतालों में मरीजों के लिए न तो पीने के पानी का इंतजाम है और न ही उनमें शौचालय की व्यवस्था है। इसके साथ ही आयुर्वेद दवाओं को बनाने की सरकारी रसायनशालाओं के हालात भी खराब है। इनमें बन रही दवाओं की गुणवत्ता की सही तरीके से जांच होने की कोई व्यवस्था नहीं है और बाजार दर से कई गुना महंगी दवाएं इनमें बन रही हैं। इसके कारण सरकारी रसायन शालाओं की दवाएं मरीज की पहुंच से बाहर ही है।

प्रदेश में आयुर्वेद चिकित्सा और शिक्षा पर सरकार ने वर्ष 2012 से 2017 तक 2655 करोड़ रुपए खर्च किए, लेकिन हालात अभी भी बदतर बने हुए हैं। आयुर्वेद चिकित्सा और शिक्षा को लेकर हाल में भारत के नियंत्रक-महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट में कई चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। इस रिपोर्ट से साफ होता है कि करोड़ों रुपए खर्च होने के बावजूद रकम का सही उपयोग नहीं हो पाया है। रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में आयुर्वेद के 118 चिकित्सालय और 3577 औषधालय का बड़ा नेटवर्क है। ग्रामीण इलाकों में पंचायत स्तर तक औषधालय मौजूद है। इस चिकित्सा व्यवस्था का सरकार सही तरीके से उपयोग करने में पूरी तरह से नाकाम साबित हो रही है।

कैग की रिपोर्ट के अनुसार आयुर्वेद स्वास्थ केंद्रों में 75 फीसद ऐसे हैं जहां मरीजों और उनके तीमारदारों के लिए पीने के पानी की सुविधा तक नहीं है। ऐसे ही हालत शौचालय नहीं होने के हैं। इसके साथ ही 47 फीसद केंद्रों में तो बिजली तक नहीं है। प्रदेश के शैय्याओं वाले आयुर्वेद अस्पतालों में से 40 अस्पताल तो ऐसे हैं जहां पांच साल से, 48 अस्पतालों में चार साल से और 49 अस्पतालों में तीन साल से एक भी मरीज भर्ती नहीं हुआ है। इसके बावजूद इन अस्पतालों को बजट का आबंटन हर साल हो रहा है। इन अस्पतालों में कर्मचारी भी तैनात हैं जो ठाले बैठे ही वेतन भत्ते ले रहे हैं।

प्रदेश का आयुर्वेद विभाग दवाइयां बनाने और उनकी दरें कम रखने में भी फिसड्डी साबित हुआ है। सरकारी आयुर्वेद रसायन शालाओं में लक्ष्य से केवल 39 फीसद दवाओं का उत्पादन किया गया है। प्रदेश की चार रसायन शालाओं में से दो तो पांच साल से बंद ही पड़ी हैं। इन्हें चलाने में अब विभाग की दिलचस्पी खत्म ही हो गई है। आयुर्वेद विभाग ने दवाओं का जितना भी उत्पादन किया वह भी इंडियन मेडिसिन्स फार्मास्यूटिकल कारपोरेशन की दर से कई गुना महंगा किया गया। आयुर्वेद अस्पतालों की मांग का आकलन किए बिना ही दवाओं की सप्लाई करने से भी यह बेकार ही गई। आयुर्वेद की दवाएं जब अवधिपार होने लगती है तब उनकी सप्लाई की जाती है।

आयुर्वेद विभाग के सेवानिवृत चिकित्सक रामेश्वर शर्मा का कहना है कि राजस्थान में आयुर्वेद और देसी चिकित्सा का चलन बहुत पुराना है। ग्रामीण और शहरी लोग इस चिकित्सा की तरफ हमेशा ही आकर्षित रहे हैं। राजस्थान ही एकमात्र ऐसा प्रदेश है जहां आयुर्वेद और भारतीय चिकित्सा का अलग विभाग है। आयुर्वेद चिकित्सा की दुर्दशा के लिए नौकरशाही का रवैया जिम्मेदार है। नौकरशाही आयुर्वेद को दोयम दर्जे का मानती है और उसी तरह का बर्ताव इस चिकित्सा से कर रही है। प्रदेश में मौजूद आयुर्वेद अस्पतालों और औषधालयों में सरकार सुधार के व्यापक प्रयास करे तो लोगों को राहत मिल सकती है।

नियंत्रक महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट चौंकाने वाली है। इसमें उजागर हुई खामियों को दूर करने के लिए सरकार वरिष्ठ आयुर्वेद चिकित्सकों की मदद लेगी। सर्राफ का कहना है कि आयुर्वेद और भारतीय चिकित्सा पद्धतियों को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने इसके बजट में बढ़ोतरी की है और इनके चिकित्सकों और अन्य स्टाफ के पदों को बढ़ाया है। आयुर्वेद चिकित्सा पनपे, इसके लिए नए सिरे से काम किया जाएगा। कैग की रिपोर्ट में सामने आई कमियों को लेकर अफसरों के साथ बैठक कर उनमें सुधार के कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। -कालीचरण सर्राफ, आयुर्वेद चिकित्सा मंत्री

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