ताज़ा खबर
 

राजस्थान: महिलाओं के खिलाफ अपराध बढ़े

राजस्थान में सरकार ने भले ही महिला अपराधों पर अंकुश के लिए कठोर कानून बनाए हों पर इसके बावजूद अलग-अलग धाराओं में 70 से ज्यादा मामले रोजाना दर्ज हो रहे हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के हिसाब से महिला अपराधों के मामले में राजस्थान देश में चौथे स्थान पर पहुंच गया है।

Author जयपुर। | September 5, 2018 4:24 AM
राज्य में महिला के खिलाफ अपराधों के मामले में सबसे खराब स्थिति अलवर जिले की सामने आई है।

राजस्थान में सरकार ने भले ही महिला अपराधों पर अंकुश के लिए कठोर कानून बनाए हों पर इसके बावजूद अलग-अलग धाराओं में 70 से ज्यादा मामले रोजाना दर्ज हो रहे हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के हिसाब से महिला अपराधों के मामले में राजस्थान देश में चौथे स्थान पर पहुंच गया है। दूसरी तरफ महिला अपहरण के दर्ज मामलों में तो आंकड़े ही चौंका रहे हैं। पुलिस विभाग की मानें तो महिला अपहरण के अपराध के 40 फीसद तक मामले झूठे निकल रहे है। साल 2017 में तो करीब 65 फीसद मामले झूठे थे और 2018 में जनवरी से जून तक 74 प्रतिशत मामले झूठे निकलें।

राज्य में महिला के खिलाफ अपराधों के मामले में सबसे खराब स्थिति अलवर जिले की सामने आई है। अलवर में 2017 में 1588 मामले दर्ज हुए। इनमें से 878 मामलों में पुलिस ने अंतिम रिपोर्ट लगा कर उन्हें बंद कर दिया। अजमेर जिला प्रदेश में दूसरे नंबर पर रहा। अजमेर में 1207 मामले दर्ज हुए तो तीसरे नंबर पर उदयपुर जिले में 1163 मुकदमें दर्ज किए गए। नागौर जिले में 881 मामले दर्ज हुए। महिलाओं के खिलाफ अपराधों के मामले में भरतपुर चौथे और श्रीगंगानगर जिला पांचवें स्थान पर रहा। अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार प्रदेश में वर्ष 2017 में 25,560 मामले दर्ज हुए। प्रदेश में सबसे चिंताजनक स्थिति में महिला अपहरण के मुकदमों की है। पुलिस ने इनमें से आधे से ज्यादा मामले झूठे माने और उन्हें अब दाखिल दफ्तर कर दिया। राजस्थान पुलिस के आंकडों के हिसाब से वर्ष 2017 में महिला अपहरण के कुल 3837 मामले दर्ज हुए। इनमें से 2237 मामलों में एफआर यानी अंतिम रिपोर्ट लगा दी गई। वहीं वर्ष 2018 में जून तक 1891 मामले दर्ज हुए और इनमें से 815 मामलों में एफआर लगा कर उन्हें बंद करने की सिफारिश की गई है।

पुलिस का इन मामलों में एफआर लगाना ही उसकी कार्यप्रणाली को सवालों के घेरे में लाता है। पुलिस इन मामलों के झूठे होने के लिए अपने तर्क देती है। उसका कहना है कि कई मामलों में रंजिश और पारिवारिक दबाव के कारण ऐसे मामले दर्ज होते हैं।
अखिल भारतीय महिला फेडरेशन की सुनीता चतुर्वेदी का कहना है कि ज्यादातर घटनाएं झूठी नहीं होती हंै। जाति और समाज के दबाव के कारण उन्हें झूठा करार दिया जाता है। कई मामलों में तो वयस्क लड़के-लड़की अपनी मर्जी से साथ रहने के लिए परिवार छोड़ देते हैं। ऐसे में लड़की के परिवार वाले लड़के के खिलाफ अपहरण का झूठा मुकदमा दर्ज करवा देते हैं। कई मामलों में तो पुलिस की अनदेखी भी सच से झूठ में बदल देती है।

राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष सुमन शर्मा का कहना है कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों के मामले में पुलिस को अनुसंधान के लिए कई दिशा निर्देश जारी किए गए हैं। उनका कहना है कि पुलिस और आयोग में सभी तरह के मामले आते हैं। इसलिए इनका पहले निष्पक्ष ढंग से परीक्षण किया जाना चाहिए। कई मुकदमे तो सिर्फ सामने वाले को डराने के मकसद से ही दर्ज करा दिए जाते हैं। इसके बाद दोनों पक्ष समझौता कर कर लेते हैं और पुलिस पर उस मामले को खत्म करने का दबाव डालते हैं। महिला आयोग अध्यक्ष का कहना है कि वास्तव में ग्रामीण इलाकों में हालत खराब है, जहां महिला के साथ कई तरह की ज्यादती होती है। इनमें से ज्यादातर मामले तो पुलिस तक पहुंच ही नहीं पाते हैं, इसलिए इनमें एफआईआर तक दर्ज नहीं हो पाती है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App