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राजस्‍थान सरकार की खुली पोल: मजदूरी तक मयस्‍सर नहीं, मनरेगा के अमल में हुआ बड़ा गड़बड़झाला

दिव्यांग मजदूरों को मात्र 29 से 36 दिन ही काम मिले जबकि नियम के मुताबिक उन्हें सालभर में कम से कम 100 दिन काम दिया जाना चाहिए।

Author September 20, 2018 4:53 PM
केंद्रीय रोजगार गारंटी काउंसिल (CEGC) का गठन 2005 के अधिनियम के कार्यान्वयन पर नजर रखने के लिए किया गया था।

राजस्थान में मनरेगा में बड़े पैमाने पर धांधली हुई है। महानियंत्रक एवं लेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट में इसका खुलासा हुआ है। वित्तीय वर्ष 2016-17 की रिपोर्ट में सीएजी ने खुलासा किया है कि राज्य में मनरेगा से जुड़े नियमों-कानूनों को दरकिनार कर सरकार ने मजदूरों से काम कराया है। यहां तक कि प्रस्तावित कार्यों को ग्राम सभा से मंजूरी भी नहीं ली गई। यानी पहले काम करा लिए गए बाद में खानापूर्ति के नाम पर पंचायत सदस्यों के हस्ताक्षर करा लिए गए। ग्राम सभा ने कौन-कौन सी विकास योजनाएं स्वीकृत कीं, इसे भी काम पूरा होने से पहले कहीं प्रदर्शित नहीं किया गया। बजट भी समय पर अप्रूव नहीं कराया गया।

सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि नियमानुसार जॉब देने के लिए डोर-टू-डोर सर्वे किया जाना है और बेरोजगारों को जॉब कार्ड बांटा जाना है लेकिन न तो सर्वे हुए और न ही जॉब कार्ड दिए गए। मजदूरों ने कितना काम किया या उन्हें कौन से काम सौंपे गए, इसकी भी रसीद उन्हें नहीं दी गई है। यहां तक कि दिव्यांग मजदूरों को मात्र 29 से 36 दिन ही काम मिले जबकि नियम के मुताबिक उन्हें सालभर में कम से कम 100 दिन काम दिया जाना चाहिए। विभिन्न जिलों से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर सीएजी की रिपोर्ट में लिखा गया है कि राज्यभर में औसतन 37.05 फीसदी काम अधूरे पड़े हैं।

प्रति घर औसतन साल भर में मात्र 52.02 दिन ही मजदूरों को काम दिए गए जबकि रोजगार के लिए निबंधित मस्टर रोल के 15.82 फीसदी लोगों को कोई काम नहीं मिला। मजदूरों की हाजिरी पंजी भी रोजाना आधार पर अंकित नहीं की गई है। सीएजी ने लिखा है कि मनरेगा के नाम पर विभाग पर कुल 704.37 करोड़ की देनदारी है। कार्यस्थल पर मनरेगा मजदूरों को पानी के अलावा कोई श्रमिक सुविधा नहीं दी गई, जबकि योजना में इसकी गारंटी दी गई है। सीएजी रिपोर्ट के मुताबिक 628.89 करोड़ रुपये का लेखा-जोखा नहीं मिलता है जबकि इसकी क्षतिपूर्ति होनी थी।

सीएजी रिपोर्ट के मुताबिक राज्य स्तर पर बनी रोजगार गारंटी परिषद भी नियमित बैठकें करने में फेल रहा है। परिषद ने अपनी जिम्मेदारियों का निर्नहन सही तरीके से नहीं किया है। रिपोर्ट के मुताबिक सोशल ऑडिट रिपोर्ट भी नरेगा की साइट पर अपलोड नहीं की गई। शिकायतकर्ताओं के 76.82 फीसदी मामलों का निस्तारण भी शिकायत समिति ने न तो समय पर किया और न ही समय-समय पर कहीं जाकर रोजगार रजिस्टर का निरीक्षण किया, जबकि मनरेगा अधिनियम के मुताबिक यह जरूरी है। बता दें कि केंद्र सरकार ने सितंबर 2005 में राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना लागू किया था जिसे बाद में महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना कर दिया गया था। राजस्थान ने इसे फरवरी 2006 में लागू किया था। योजना का मकसद ग्रामीण अकुशल मजदूरों को साल में कम से कम 100 दिन रोजगार उपलब्ध कराने की गारंटी देना है।

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