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मुकदमों के ढेर में न्याय का इंतजार

पिछले साल संसद में एक सवाल के जवाब में बताया गया कि देश की अदालतों में न्यायिक अधिकारियों के 5746 पद रिक्त हैं। उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों के स्वीकृत 31 पदों में से सात और उच्च न्यायालयों में 1048 पदों में 406 पद रिक्त हैं।

Author June 26, 2019 2:01 AM
मार्च तक राजस्थान में 14 लाख से ज्यादा मामले विभिन्न अदालतों में लंबित है।

देश भर की अदालतों में ढाई करोड़ से ज्यादा मुकदमे लंबित होने के कारण फरियादी को न्याय मिलने में इतनी देरी हो जाती है कि उसकी चप्पलें ही घिस जाती हैं। ऐसे ही हालात राजस्थान में भी है। प्रदेश की अदालतों में 14 लाख से ज्यादा मुकदमे लंबित चल रहे हंै। इनमें से दस फीसद मुकदमे तो वरिष्ठ नागरिक और महिलाओं की तरफ से दायर किए गए हैं। राजस्थान हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एस रविंद्र भट्ट ने हाल ही में पुराने मुकदमों को तय समय सीमा में निपटाने का निर्देश सभी जिला न्यायाधीशों को दिया है। इसमें 30 साल से ज्यादा पुराने मुकदमों को तीन महीने में, 20 से 30 साल पुराने मुकदमों को चार महीने में और 10 से 20 साल पुराने मुकदमों के लिए छह महीने का समय दिया गया है।

मुकदमे लंबे चलने के पीछे सबसे बड़ा कारण अदालतों और संसाधनों की कमी को माना जाता है। इसकी पीड़ा पक्षकारों को उठानी पड़ रही है। इस पीड़ा को कम करने के लिए ही लोक अदालतों का सहारा लिया जा रहा है पर इसके बावजूद लोगों को राहत मिलती नजर नहीं आ रही है। विधि विशेषज्ञों का कहना है कि न्याय व्यवस्था में अपराधी को भी सुनवाई का पूरा मौका दिया जाता है। इसके कारण भी सुनवाई प्रक्रिया लंबी खिंचती है और मुकदमों के निपटारे में बहुत समय लग जाता है।

10 साल पुराने एक लाख मुकदमे
इस वर्ष मार्च तक राजस्थान में 14 लाख से ज्यादा मामले विभिन्न अदालतों में लंबित है। इनमें से करीब एक लाख मुकदमे तो दस साल से ज्यादा लंबे अरसे से सुनवाई में ही चल रहे है। हाईकोर्ट का जोर है कि पुराने मुकदमों की संख्या कम से कम रहे, इसके लिए नियमित तौर पर पुराने मुकदमों की समीक्षा की जाए। अधीनस्थ अदालतों को ऐसे मुकदमे अब तय समय सीमा में निपटाने पर ध्यान दिया जा रहा है।

कितने मुकदमे

1569243 मुकदमे हैं राजस्थान की अधीनस्थ अदालतों में अभी।

57092 है 10 से 20 साल पुराने मुकदमों की संख्या।

4205 है 20 से 30 साल पुराने मुकदमों की संख्या।

खाली पद और दबाव

पिछले साल संसद में एक सवाल के जवाब में बताया गया कि देश की अदालतों में न्यायिक अधिकारियों के 5746 पद रिक्त हैं। उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों के स्वीकृत 31 पदों में से सात और उच्च न्यायालयों में 1048 पदों में 406 पद रिक्त हैं। वहीं उत्तर प्रदेश में न्यायिक अधिकारियों के 1348 पद, बिहार में 835 और मध्य प्रदेश में न्यायिक अधिकारियों के रिक्त पदों की संख्या 728 है।

कु छ वर्षों में स्पेशल कोर्ट जरूर खोले गए है। लेकिन मुकदमों की प्राथमिकता तय नहीं होने से इन अदालतों में भी मुकदमों की संख्या बढ़ी है। इसी वजह से इन अदालतों में लंबित सभी मामलों को एक समान तरीके से सुनवाई में लगाया जाता है। स्पेशल कोर्ट में सिर्फ जल्द ट्रायल वाले मामले आने चाहिए पर न्यायाधीशों की कमी के कारण दूसरी अदालतों के मामले भी इनमें ट्रांसफर कर दिए जाते है। सुप्रीम कोर्ट ने दुष्कर्म के मामलों का निपटारा छह महीने में करने को कहा है। ऐसे मामलों में भी कई वर्ष तक सुनवाई चलती रहने से फैसला देरी से हो पाता है। इसमें पुलिस की जांच में उदासीनता और गवाहों से होने वाली जिरह के चलते भी मुकदमों के निपटारे में देरी होती है।
– अधिवक्ता आरएन गुप्ता

मुकदमों के समय पर निपटारे के लिए कई कदम उठाने जरूरी है। इन्हें अमल में लाए जाने पर ही लंबित मुकदमों की संख्या में कमी हो सकती है। जल्द न्याय के लिए सरकार को समुचित संख्या में अदालतों की स्थापना करनी चाहिए। साथ ही न्यायाधीशों की कमी को दूर करते हुए मुकदमों की प्राथमिकता तय करते हुए उनकी सुनवाई करनी चाहिए। किसी मामले की एक बार सुनवाई होने के बाद उस केस को दूसरी अदालत में नहीं सौंपा जाए। इस तरह के कदम उठाने से ही जल्द न्याय मिलने की उम्मीद की जा सकती है।
-पीके पांडे, हाईकोर्ट के वकील

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