राजस्थान के वो राजे-रजवाड़े जो महलों से निकलकर राजनीति के मैदान में उतरे, जोधपुर के महाराजा ने की थी शुरुआत

आजादी के बाद जब राजाओं की रियासत चली गई और देश में लोकतंत्र की नींव रखी गई तो बहुत से राजाओं ने राजनीति की राह पकड़ ली। इनमें से कई तब सांसद और मंत्री बने। इन राजघरानों के परिवार आज भी राजनीति में है और कुछ तो मुख्यमंत्री से लेकर मंत्री तक बन चुके हैं।

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आजादी के बाद से ही राजस्थान की राजनीति में है राजपरिवारों का दबदबा (फोटो-एक्सप्रेस आर्काइव, @VasundharaBJP)

देश में राजा-रजवाड़े और रियासत भले ही आजादी के बाद खत्म हो गए , लेकिन राजनीति में उनकी धाक आज भी कई राज्यों में बनी हुई है। इन राजपरिवारों से कोई मुख्यमंत्री बना तो किसी ने केंद्र सरकार में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाली। अकेले राजाओं की धरती,राजस्थान के ही कई राजपरिवार आज भी राजनीति में सक्रिय हैं।

राजस्थान में 18 राजपरिवार हैं। इनमें से आधे राजनीति की दुनिया में माहिर खिलाड़ी बने हुए हैं। द इंडियन प्रिंसेस एंड देयर स्टेट्स किताब में इतिहासकार बारबरा एन. रामुसैक लिखती हैं कि राजनीति में आने की शुरुआत जोधपुर के महाराजा हनवंत सिंह राठौर से हुई थी। इसके बाद जयपुर की राजमाता गायत्री देवी भी राजनीति में अपनी किस्मत आजमाने उतर गईं। बाकी राजाओं में से कुछ कांग्रेस शामिल हो गए, तो कुछ बाद में बीजेपी में चले गए। आज भी राजस्थान में दोनों ही पार्टियों में राजपरिवारों का दबदबा कायम है।

जोधपुर का राजपरिवार- राजस्थान में राजपरिवारों की राजनीति में प्रवेश की कहानी यहीं से शुरू हुई थी। रियासत खत्म होने के बाद महाराजा हनवंत सिंह राठौर खुद तो राजनीति में उतरे ही, अपने और साथियों को भी उन्होंने राजनीति में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित किया। हनवंत सिंह ने 1952 में अखिल भारतीय रामराज्य परिषद का गठन किया और चुनाव में उतरे। रिकॉर्ड के अनुसार महाराजा को यहां से काफी वोट मिलते, लेकिन दुर्भाग्यवश 26 जनवरी, 1952 को चुनाव प्रचार के दौरान एक विमान दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई। उनके पुत्र गजसिंह उसी वर्ष गद्दी पर बैठे। इन्होंने भी राजनीति में कदम रखा और 1990-1992 के बीच राज्यसभा सदस्य रहे। गज सिंह की बड़ी बहन, चंद्रेश कुमारी कटोच भी कांग्रेस पार्टी की नेता हैं और केंद्र में मंत्री भी रह चुकी हैं।

जयपुर राजपरिवार- जयपुर की महारानी गायत्री देवी भी हनवंत सिंह के रास्ते पर चलते हुए राजनीति के मैदान में उतरीं थीं। वो सी. राजगोपालाचारी की स्वतंत्र पार्टी में शामिल हो गईं। 1962 के लोकसभा चुनावों में, उन्होंने जयपुर क्षेत्र से दुनिया की सबसे बड़ी जीत हासिल की। बाद में 1967 में उनकी पार्टी ने जनसंघ से हाथ मिला लिया। महारानी ने 1970 के दशक के मध्य में राजनीति से संन्यास ले लिया था।

गायत्री देवी के सौतेले बेटे भवानी सिंह भी राजीव गांधी के अनुरोध पर, 1989 का लोकसभा चुनाव लड़े, लेकिन भाजपा के गिरधारी लाल भार्गव से हार गए। इसके बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया। भवानी सिंह की बेटी दीया कुमारी ने 2013 में राजनीति में कदम रखा और बीजेपी में शामिल हो गई। कुमारी सवाई माधोपुर निर्वाचन क्षेत्र से राजस्थान विधान सभा की सदस्य हैं।

जैसलमेर राजपरिवार- जैसलमेर के महारावल रघुनाथ सिंह बहादुर ने 1950 में गद्दी संभाली थी। वह 1957 में बाड़मेर से लोकसभा के लिए चुने गए थे। 1980 में इसी राजपरिवार के चंद्रवीर सिंह विधायक बने। इसके बाद परिवार लंबे समय तक सक्रिय राजनीति में शामिल नहीं हुआ था, लेकिन हाल ही में बृजराज सिंह की पत्नी राजेश्वरी राज्य लक्ष्मी ने आगामी चुनाव लड़ने के अपने निर्णय को सार्वजनिक किया है।

धौलपुर राजपरिवार- ग्वालियर राजघराने के जीवाजीराव सिंधिया की बेटी और राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की शादी धौलपुर परिवार के महाराज राणा हेमंत सिंह से हुई थी, लेकिन एक साल बाद ही दोनों अलग हो गए। राजे 1984 में राजनीति में शामिल हुईं, तब उन्हें नवगठित भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी का सदस्य बनाया गया। 1985 में वह धौलपुर से विधान सभा की सदस्य बनीं। वह पांच बार लोकसभा की सदस्य भी रह चुकी हैं। राजे को पहले 2003 में और फिर 2013 में राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में चुना गया था। राजे के बेटे दुष्यंत सिंह पहली बार 2014 में झालावाड़-बारां निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा के लिए चुने गए थे।

भरतपुर राजपरिवार- भरतपुर राज्य के अंतिम राजा बृजेंद्र सिंह 1962 और 71 के बीच सांसद थे। उनके पुत्र विश्वेंद्र सिंह वर्तमान में भरतपुर जिले के डीग-कुम्हेर से विधायक हैं। सिंह ने 1989 में राजनीति में जब प्रवेश किया, तब वे भाजपा के टिकट पर लोकसभा के लिए चुने गए। उसके बाद से वह कई मौकों पर भाजपा और कांग्रेस में आते-जाते रहे। 1995 में, वह कांग्रेस के टिकट पर नदबई से राजस्थान विधानसभा के लिए चुने गए। फिर 1999 और 2004 में उन्होंने भाजपा के टिकट पर लोकसभा के लिए चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। इसके बाद फिर 2008 में वह वापस कांग्रेस में आ गए और 2013 में विधानसभा के लिए चुने गए। उनकी पत्नी दिव्या कुमारी भी पूर्व सांसद हैं, जो 1996 में भरतपुर निर्वाचन क्षेत्र से भाजपा के टिकट पर चुनी गई थीं।

बीकानेर राजपरिवार- बीकानेर के अंतिम राजा, करणी सिंह ने 1952 में एक निर्दलीय के रूप में राजनीति में कदम रखा और 25 वर्षों तक बीकानेर से सांसद रहे। उनकी पोती सिद्धि कुमारी भाजपा से विधायक हैं।

कोटा राजपरिवार- कोटा के वर्तमान महाराव बृजराज सिंह 1962 और 1977 के बीच झालावाड़ से सांसद रहे। उनके पुत्र इजियाराज सिंह अभी भी राजनीति में सक्रिय हैं। उन्होंने 2009 में कांग्रेस के टिकट पर कोटा से लोकसभा का चुनाव जीता था। हालांकि, वह 2014 में हार गए। इसके बाद सिंह और उनकी पत्नी, कल्पना देवी दोनों भाजपा में शामिल हो गए।

अलवर राजपरिवार- अलवर शाही परिवार आजादी से पहले ही राजनीति के मैदान में उतर चुका था। 1937 में अलवर सिंहासन पर अंग्रेजों द्वारा नियुक्त किए गए तेज सिंह एक उग्र हिंदू राष्ट्रवादी थे और उन्होंने अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया। उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) को फंड देने वालों में से एक माना जाता है। सिंह की बहू महेंद्र कुमारी 1991 में अलवर से भाजपा के टिकट पर लोकसभा चुनाव जीतकर संसद पहुंची थीं। महेंन्द्र कुमारी के बेटे जितेंद्र सिंह यूपीए सरकार में मंत्री रह चुके हैं।

डूंगरपुर राजपरिवार- डूंगरपुर के अंतिम राजा लक्ष्मण सिंह ने आजादी के बाद राज्यसभा के लिए चुने गए थे। वह चित्तौड़ के विधायक भी रहे और 1977 से 1989 तक ये विधानसभा अध्यक्ष भी रहे। सिंह के पोते और डूंगरपुर के युवराज हर्षवर्धन सिंह फिलहाल बीजेपी में हैं और राज्यसभा सदस्य हैं।

करौली राजपरिवार- करौली के वर्तमान महाराजा कृष्ण चंद्र पाल और उनकी पत्नी रोहिणी कुमारी दोनों सक्रिय राजनीति में शामिल हैं। कुमारी 2008 में राजस्थान में विधायक चुनी गईं थी।

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