राजस्थान में एंटी करप्शन ब्यूरो ने एसओजी में एडिशनल सुपरिटेंडेंट ऑफ़ पुलिस (ASP) मुकेश कुमार सोनी को गिरफ्तार कर लिया है। इससे पहले शनिवार को उनके एक कथित बिचौलिए सज्जन सिंह जैन उर्फ टटला को उनकी तरफ से दो करोड़ रुपये की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया था।

आरोप है कि राजस्थान की प्रमुख पुलिस एजेंसी ‘स्पेशल ऑपरेशन्स ग्रुप’ (SOG) के एक सीनियर अधिकारी ने उदयपुर नगर निगम जमीन घोटाले में एक व्यक्ति का नाम हटाने के बदले दो करोड़ की रिश्वत मांगे।

एसओजी कहलाती राजस्थान पुलिस की शान

एसओजी को बड़े ड्रग सिंडिकेट का पर्दाफाश करने, डिजिटल धोखाधड़ी की जांच करने और गैंगस्टर नेटवर्क पर कार्रवाई करने के लिए जाना जाता है। इसे ‘राजस्थान पुलिस की शान’ भी कहा जाता है।

अधिकारियों ने बताया कि जब शिकायतकर्ता ने यह पक्का करना चाहा कि पैसे सच में मुकेश कुमार सोनी के लिए ही हैं तो सज्जन सिंह ने कुछ दिन पहले एक कार में दोनों की मुलाकात करवाई। बातचीत के दौरान मुकेश ने कुछ नहीं कहा, लेकिन कथित तौर पर शिकायतकर्ता को सिर्फ एक टेक्स्ट दिखाया, जिसमें दो करोड़ रुपये लिखा था।

एसीबी ने बिछाया जाल

जांच-पड़ताल के बाद एसीबी ने जाल बिछाया और सज्जन सिंह को तब गिरफ्तार किया जब वह शिकायतकर्ता की फैक्ट्री में रिश्वत ले रहा था। सज्जन सिंह की गिरफ्तारी के बाद उसी दिन बालोतरा जिले में मुकेश कुमार सोनी को भी उसके घर से हिरासत में लिया गया और फिर रविवार को गिरफ्तार कर लिया।

एसीबी के डायरेक्टर जनरल गोविंद गुप्ता के मुताबिक, उदयपुर इंटेलिजेंस यूनिट को एक शिकायत मिली कि मुकेश, ब्रोकर सज्जन के जरिए शिकायतकर्ता से दो करोड़ रुपये की रिश्वत मांग रहा। यह रिश्वत पहले गिरफ्तार किए गए शिकायतकर्ता को राहत देने के बदले मांगी जा रही थी।

मुकेश कुमार सोनी पर आरोप है कि वह केस को खत्म करने, दूसरे मामलों में उस व्यक्ति को आरोपी न बनाने और गिरफ्तारी के दौरान आरोपियों के घरों से लिए गए उन दस्तावेजों को लौटाने के बदले रिश्वत मांग रहा था, जिन्हें जब्त नहीं किया गया था।

इसके बाद एसीबी ने शिकायतकर्ता और आरोपी के बीच बातचीत के जरिए रिश्वत की मांग की पुष्टि की।

एसीबी ने कहा कि 4 लाख रुपये बरामद किए गए। साथ ही भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) की संबंधित धाराओं और आपराधिक साजिश के लिए बीएनएस की धारा के तहत मामला दर्ज किया गया है।

क्या है मामला?

यह मामला साल 2004 में उदयपुर इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट (UIT) द्वारा उदयपुर नगर निगम (Udaipur Development Authority) को सौंपी गई 30 भूमि योजनाओं और 16 झुग्गी बस्ती क्षेत्रों के हस्तांतरण में हुई अनियमितताओं से जुड़ा है।

कैसे घोटाले का हुआ खुलासा?

अगस्त 2024 में विधानसभा में इस घोटाले की बात शहरी विकास मंत्री झाबर सिंह खर्रा ने रखी। उन्होंने सदन को बताया कि शहरी विकास ट्रस्ट द्वारा आवंटित कुछ प्लॉट तब अपने आप रद्द हो गए थे जब आवंटियों ने तय रकम जमा नहीं की थी। हालांकि इन प्लॉटों की फाइलें नगर निगम को नहीं सौंपी गई थीं।

इसके अलावा, नगर निगम के पास इन योजनाओं में UIT द्वारा रद्द किए गए आवंटनों से जुड़े खाली प्लॉट, कॉर्नर प्लॉट और फाइलों के बारे में कोई जानकारी नहीं थी।

आरोप है कि इनमें से कई जमीनों पर सरकारी अधिकारियों की मिलीभगत से भू-माफिया ने जाली दस्तावेजों के जरिए कब्जा कर लिया था। इस घोटाले की जांच में कई रुकावटें आईं।

2021 में बनाई गई जांच कमेटी

दिसंबर 2021 में, नगर निगम ने इस मामले की जांच के लिए एक कमेटी बनाई। इस कमेटी में तीन अधिकारी और तीन जन-प्रतिनिधि शामिल थे। कमेटी ने मार्च 2022 में अपनी रिपोर्ट सौंपी, लेकिन उस पर सिर्फ अधिकारियों ने ही हस्ताक्षर किए, जबकि जन-प्रतिनिधियों ने हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया।

रिपोर्ट में कुछ अधिकारियों पर आरोप लगाए गए थे। इसके बाद, उदयपुर के दो पुलिस थानों में मामले दर्ज किए गए, जिन्हें मई 2022 में जोधपुर की SOG यूनिट को सौंप दिया गया।

2023 में एसओजी को सौंप गया मामला

फिर मई 2023 में यह मामला उदयपुर की SOG यूनिट को और अप्रैल 2024 में अजमेर की SOG यूनिट को ट्रांसफर कर दिया गया, जो अभी इस मामले की जांच कर रही है।

झाबर सिंह खर्रा ने अगस्त 2024 में कहा था, “अभी अजमेर की SOG यूनिट के एडिशनल सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस (ASP) जांच कर रहे हैं। जांच पूरी होने के बाद, नगर निगम के तत्कालीन कमिश्नर और मामले में दोषी पाए जाने वाले अन्य कर्मचारियों, अधिकारियों और सरकारी सेवकों के खिलाफ सक्षम अदालत में कानूनी कार्रवाई शुरू की जाएगी। साथ ही, संदिग्ध जमीन के टुकड़ों को वापस सरकारी कब्जे में लेने के लिए भी कार्रवाई की जाएगी।”

दो साल से अधिक समय बीतने के बाद, अब मुख्य जांच अधिकारी को गिरफ्तार कर लिया गया है।

इससे पहले, पंजाब के मौजूदा गवर्नर और राजस्थान के पूर्व गृह मंत्री व विधानसभा में विपक्ष के नेता गुलाब चंद कटारिया ने इसे 500 करोड़ रुपये का घोटाला बताया था।

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