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बच्‍ची के बलात्‍कारी को सजा-ए-मौत देते हुए जज ने लिखी द‍िल प‍िघला देने वाली कव‍िता

जज नीरजा ने अपनी कविता के जरिये उन लोगों को आड़े हाथों लिया जो रेप जैसी घिनौनी वारदात के पीछे महिलाओं के पहनावे को वजह बताते हैं। उन्होंने लिखा, ''कपड़ों के कारण होते रेप जो कहे उन्हें बतलाऊं मैं, आखिर तीन साल की बच्ची को साड़ी कैसे पहनाऊं मैं।''

तस्वीर का प्रयोग प्रतीक के तौर पर किया गया है। (फाइल फोटो)

राजस्थान के झुंझनू में एक जज ने 2 वर्ष की बच्ची से रेप मामले में दोषी को मौत की सजा सुनाते वक्त एक बेहद भावनात्मक कविता लिखी। कविता की पंक्तियां ऐसी हैं कि किसी का भी दिल पिघला दें। दरअसल, पिछले महीने आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम 2018 के तहत 12 साल से कम उम्र की बच्चियों से रेप के मामले में मौत की सजा का प्रावधान शुरू हुआ था। इसी के तहत भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 376 एबी के तहत बीते शुक्रवार (31 अगस्त) को झुंझनू की पोक्सो अदालत ने दोषी को मौत की सजा सुनाई थी। मामले में 13 अगस्त को झुंझनू पुलिस के द्वारा चार्जशीट तैयार करने बाद सुनवाई शुरू हुई। 30 अगस्त को 22 वर्षीय आरोपी विनोद कुमार को अदालत ने दोषी पाया। अपराध किए जाने से 29 दिनों के भीतर आरोपी को मौत की सजा सुना दी गई। इस दौरान जज नीरज दधीच ने बेहद जज्बाती कविता लिखी। नीरजा दधीच ने कविता में लिखा, ”जिस मासूम को देख के मन में प्यार उमड़ के आता है, देख उसी को मन में कुछ के हैवान उतर के आता है।”

जज नीरजा ने अपनी कविता के जरिये उन लोगों को आड़े हाथों लिया जो रेप जैसी घिनौनी वारदात के पीछे महिलाओं के पहनावे को वजह बताते हैं। उन्होंने लिखा, ”कपड़ों के कारण होते रेप जो कहे उन्हें बतलाऊं मैं, आखिर तीन साल की बच्ची को साड़ी कैसे पहनाऊं मैं।” दधीच ने अपनी कविता में लिखा, ”गर अब भी न सुधरे तो एक दिन ऐसा आएगा, इस देश को बेटी देने से भगवान भी घबराएगा।” एक पंक्ति में जज ने लिखा, ”उस बच्ची पर कितना जुल्म हुआ वो कितना रोई होगी, मेरा ही कलेजा फट जाता है तो उसकी मां कैसे सोई होगी।” मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक मौत की सजा पाने वाले विनोद कुमार ने बच्ची के ननिहाल में उसका रेप किया था। जज नीरजा के द्वारा लिखी गई पूरी कविता इस प्रकार है-

वो मासूम नाजुक बच्ची एक आंगन की कली थी
वो मां बाप की आंखों का तारा थी, अरमानों से पली थी
जिसकी मासूम अदाओं से मां-बाप का दिन बन जाता था
जिसकी एक मुस्कान के आगे पत्थर भी मोम बन जाता था
वो मासूम बच्ची ठीक से बोल नहीं पाती थी
दिखा के जिसकी मासूमियत उदासी भी मुस्कान बन जाती थी
जीवन के केवल तीन बसंत ही देखे थे
उस पर ये अन्याय हुआ, ये कैसे विधि के लेखे थे
एक तीन साल की बेटी पर ये कैसा अत्याचार हुआ
एक बच्ची को दरिंदों से बचा न सके ये कैसे मुल्क इतना लाचार हुआ
उस बच्ची पर कितना जुल्म हुआ, वो कितना रोई होगी
मेरा ही कलेजा फट जाता है तो मां कैसे सोई होगी
जिस मासूम को देख के मन में प्यार उमड़ आता है
देख उसी को कुछ के मन में हैवान उतर आता है
कपड़ों के कारण होते रेप जो कहें, उन्हें बतलाऊं मैं
आखिर तीन साल की बच्ची को साड़ी कैसे पहनाऊं मैं
गर अब भी न सुधरे तो एक दिन ऐसा आएगा
इस देश को बेटी देने से भगवान भी घबराएगा

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