ताज़ा खबर
 

पंचायत-निकाय चुनाव में निशक्तों के आरक्षण की मांग ने जोर पकड़ा

विकलांग अधिकार महासंघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हेमंत भाई गोयल का कहना है कि राजस्थान में पंचायत और निकायों के चुनाव में आरक्षण का प्रावधान लागू किया जाता है तो प्रदेश की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी अलग ही पहचान बनेगी।

Author February 6, 2019 6:48 AM
राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत।

राजस्थान में दस साल से निशक्तजन पंचायतराज और स्थानीय निकायों के चुनावों में अपने लिए आरक्षण की लड़ाई लड़ रहे हैं। इस दौरान प्रदेश में दो सरकारें आईं और गर्इं पर दिव्यांगों को निराशा और हताशा ही हाथ लगी। प्रदेश में नई सरकार बनने के बाद निशक्तजनों ने अपने हक की आवाज एक बार फिर उठाई है। उन्हें लगता है कि मौजूदा मुख्यमंत्री अशोक गहलोत विकलांग और उनके परिवारों के प्रति खासी हमदर्दी रखते हैं। उनकी पूर्व सरकार ने विकलांगों को कई तरह की रियायतें मुहैया कराई थीं। इससे उन्हें उम्मीद है कि अब उन्हें पंचायत और निकायों में भी जनप्रतिनिधि होने का मौका मिल सकेगा। राजस्थान में साल 2011 की जनगणना के हिसाब से 16 लाख विकलांग हैं। किसी परिवार में एक दिव्यांग होने से उसके माता-पिता और भाई-बहन भी प्रभावित होते हैं। इसके कारण विकलांग प्रभावित आबादी 80 लाख मानी जाती है। ऐसे ही परिवारों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने और विकलांगों के अधिकारों के सरंक्षण के लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 13 दिसंबर 2006 को प्रस्ताव पारित किया था। उसके अनुसार दिव्यांगजनों को समाज में पूर्ण और प्रभावी भागीदारी मुहैया कराई जानी चाहिए। इस पर हस्ताक्षर करने वाले देशों में भारत भी शामिल है।

विकलांग अधिकार महासंघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हेमंत भाई गोयल का कहना है कि राजस्थान में पंचायत और निकायों के चुनाव में आरक्षण का प्रावधान लागू किया जाता है तो प्रदेश की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी अलग ही पहचान बनेगी। गोयल लंबे अरसे से इस मुहिम में जुटे हुए हैं। गोयल का कहना है कि प्रदेश में पंचायतराज और स्थानीय निकायों में अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग और महिलाओं के आरक्षण का प्रावधान है। उसी में से दिव्यांगों को चार फीसद आरक्षण दिया जा सकता है। इसमें किसी जाति और वर्ग के आरक्षण से छेड़छाड़ भी नहीं होगी। प्रदेश में विकलांगों को पढ़ाई और नौकरी में भी तीन प्रतिशत आरक्षण दिया जा रहा है। गोयल का कहना है कि जिस तरह से महिलाओं को आरक्षण जातिगत आरक्षण के भीतर दिया जा रहा है उसी तर्ज पर भी दिव्यांगों को उसी जाति के दायरे में यह आरक्षण दिया जा सकता है। ऐसा करने में सरकार पर किसी तरह का आर्थिक बोझ भी नहीं पड़ेगा और असहाय तबके को मुख्य धारा में अपनी भागीदारी निभाने का अवसर भी मिल सकेगा।

दरअसल प्रदेश में विकलांगों के पंचायत और निकायों में जनप्रतिनिधि के तौर पर भागीदारी निभाने को लेकर विकलांगों से जुड़े कई संगठन प्रयासरत हैं। विकलांग अधिकार महासंघ इस मामले को लेकर पिछली भाजपा सरकार के समय भी प्रयासरत था। उस दौरान और उससे पहले निशक्तजन आयोग के अध्यक्षों ने भी इस मामले में सरकार के समक्ष पैरवी की थी। पूर्व सामाजिक न्याय अधिकारिता मंत्री अरुण चतुर्वेदी का कहना है कि इस मामले में उनकी पूर्व सरकार ने काफी काम कर लिया था। उस समय विभिन्न संगठनों की तरफ से आई मांग पर विचार कर मामला मुख्यमंत्री स्तर तक गया था। सरकार को नीतिगत निर्णय लेना था, इसके कारण देरी हुई और फिर चुनाव आचार संहिता लग गई।

पंचायतराज और निकाय चुनाव में विकलांगों के आरक्षण के मामले में अब नई सरकार को कारगर फैसला लेना चाहिए। दिव्यांग कर्मचारी नाथूलाल योगी का कहना है कि जब विकलांग व्यक्ति सही ढंग से सरकार के दफ्तर में बैठ कर पूरी निष्ठा से काम कर सकता है तो फिर जनप्रतिनिधि के तौर पर भी अपनी जिम्मेदारी निभा सकता है। सरकार को पंचायतराज और निकाय चुनाव में दिव्यांगों को जिम्मेदारी निभाने का मौका देना चाहिए। बगैर आरक्षण के दिव्यांगों के इन संस्थाओं में जनप्रतिनिधि बनना बहुत ही मुश्किल है। इस जाति और वर्ग में दिव्यांग है और उन्हें अपने ही वर्ग के भीतर आरक्षण दिया जाना चाहिए।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App