14 मई, 2015 को राजस्थान के नागौर जिले के डांगावास गांव में पांच दलितों की हत्या के मामले में सभी 40 आरोपियों को बरी करते हुए विशेष एस/एसटी अदालत ने कहा: “घटना सिद्ध है, कर्ता असिद्ध।”
लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी ने इस घटना पर एक किताब भी लिखी है। उनका कहना है कि ऊपर कही गई एक बात ही डांगावास की पूरी त्रासदी को समझने के लिए काफी है। अदालत ने माना कि हत्या हुई, लोगों को चोटें आईं और बड़ी संख्या में हिंसा भी हुई। लेकिन किसी भी हत्यारे को दोषी नहीं ठहराया गया। ऐसे में सवाल उठता है कि उस दिन उन छह लोगों को आखिर किसने मारा?
37 वर्षीय गोविंद राम के भाई गणेश, पिता पांचा राम और चाचा रत्ना राम, परिवार के अन्य सदस्यों के अलावा, मारे गए लोगों में शामिल थे। वह कहते हैं: “हममें से इतने लोगों ने बयान दिए, कुछ ने तो तीन बार तक बयान दिए। फिर क्या हुआ?”
करीब आधे घंटे तक चली हिंसा ने नर्सिंग डिप्लोमा पूरा करने के बाद एम्स-पटना जाने की गोविंद की तैयारियों और योजनाओं को अचानक खत्म कर दिया।
2011 की जनगणना के मुताबिक, डांगावास में आबादी का करीब छठा हिस्सा दलितों का है, जबकि जाटों की आबादी लगभग तीन-चौथाई है। अजमेर-नागौर रोड पर, मेड़ता सिटी के ठीक बाहर स्थित यह गांव इलाके के किसी भी अन्य गांव जैसा ही है, लेकिन 2015 से यहां चौबीसों घंटे दो पुलिसकर्मियों की तैनाती वाले एक पुलिस टेंट के अलावा। गांव के अनौपचारिक केंद्र में स्थित ‘बाबा रामदेवजी’ मंदिर दलितों के लिए बैठक स्थल का काम करता है।
कुछ मिनट की ड्राइव दूर खेत घने झाड़-झंखाड़ में बदल जाते हैं। यहीं 2015 की हिंसा के एकमात्र अवशेष अब भी मौजूद हैं: कुछ ईंटें, जो कभी दलित पक्ष द्वारा बनाए गए कमरे और झोपड़ी का हिस्सा थीं, जिन्हें उस दिन एक ट्रैक्टर ने गिरा दिया था।
घटना के बाद उठे आक्रोश के बीच तत्कालीन वसुंधरा राजे के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने सीबीआई जांच के आदेश दिए थे।
गोविंद के चाचा खेमा राम, जो अपने भाइयों और अपने बेटे गणेश के विपरीत हमले में बच गए थे, उनके पैरों और एक हाथ में धातु की रॉड लगी हुई है। उस दिन को याद करते हुए वह कहते हैं कि “250-300” लोग करीब 50 मोटरसाइकिलों और तीन ट्रैक्टरों पर आए, उन्होंने 16 लोगों को घेर लिया – जिनमें छह महिलाएं भी थीं – और हथियारों से उन पर हमला करना शुरू कर दिया। खेमा कहते हैं, “फिर, उन्होंने हमारे ऊपर ट्रैक्टर चढ़ा दिया… मैंने एक व्यक्ति को पीटते और उसके कपड़े उतारते हुए देखा… मुझे मरा हुआ समझकर छोड़ दिया गया,” और बताते हैं कि वह ढाई साल तक बिस्तर पर पड़े रहे।
रत्ना और पांचा की पत्नियां, क्रमशः बिदामी देवी और सोनकी देवी, भी हमले का शिकार हुई थीं। बिदामी कहती हैं, “हमारे आदमियों को मार दिया गया और अब फैसला भी हमारे खिलाफ है। यह कैसे संभव है?” इस दौरान सोनकी चोट के अब भी मौजूद निशान दिखाती हैं।
गोविंद बताते हैं कि कानूनी मदद हासिल करना भी एक समस्या थी, क्योंकि पास के मेड़ता सिटी तहसील मुख्यालय में ज्यादातर वकीलों ने उनका केस लेने से इनकार कर दिया।
मामला
विवाद के केंद्र में करीब 23 बीघा जमीन का एक टुकड़ा है, जो 1961 में राजस्थान सरकार ने दलित बस्ता राम को आवंटित किया था। एक संस्करण के मुताबिक, 1964 में उन्होंने 1,500 रुपये के कर्ज के लिए इसे चिमनाराम जाट के पास गिरवी रख दिया था। समझौता यह था कि चिमनाराम को इस रकम पर ब्याज नहीं मिलेगा और बस्ता राम जमीन पर उगाई गई फसल में हिस्सा नहीं मांगेंगे।
1999 में जमीन का स्वामित्व रत्ना को हस्तांतरित कर दिया गया, जो बस्ता के दत्तक पुत्र थे। जाट पक्ष के मुताबिक, जमीन के एक हिस्से पर कमरा बनाने और उसमें रहने के लिए चले जाने का रत्ना का फैसला, ताकि भूखंड पर दोबारा कब्जा लिया जा सके, 2015 के टकराव की वजह बना।
चिमनाराम के परिवार ने विरोध किया और दावा किया कि बस्ता ने कर्ज चुकाने में असमर्थ होने के कारण जमीन उन्हें बेच दी थी। और चूंकि दलित के स्वामित्व वाली जमीन को गैर-दलित को बेचना कानूनी रूप से संभव नहीं था, इसलिए बिक्री घीसाराम नामक एक दलित के नाम पर की गई।
दलित पक्ष ने इस बिक्री विलेख पर सवाल उठाया, जबकि जाट परिवार ने दावा किया कि रत्ना के गोद लिए जाने का प्रमाणपत्र फर्जी था।
दलित पक्ष ने यह भी दावा किया कि 15 मई, 2015 से पहले के दिनों में जाटों ने कई बार उन्हें डराने-धमकाने की कोशिश की, जिसमें बलात्कार का प्रयास भी शामिल था, जिसके बाद FIR दर्ज की गई।
पंचायत की बैठक में भी कुछ नहीं हुआ
जाट पक्ष के मुताबिक, 14 मई, 2015 को मामले को सुलझाने के लिए पंचायत की बैठक बुलाई गई थी और वह अफरा-तफरी तथा “फ्री फॉर ऑल” में बदल गई, “जिसमें यह स्पष्ट नहीं था कि किसने किस पर हमला किया।”
एक अन्य विवरण के मुताबिक, 14 मई को रामपाल गोस्वामी और रामदेव खड़ाव (एक जाट) को पंचायत में संदेशवाहक के तौर पर भेजा गया था और दलित पक्ष ने गोली चला दी, जिसमें रामपाल की मौत हो गई और रामदेव घायल हो गए। गोविंद और अन्य लोगों को इस घटना में बरी कर दिया गया था, जिसे अदालतों में चुनौती दी गई है।
हुई झड़प में जाट पक्ष के 40 आरोपियों का प्रतिनिधित्व करने वाले महिपाल चौधरी कहते हैं कि वे कई मुश्किलों से जूझ रहे थे, जिसमें यह तथ्य भी शामिल था कि उपखंड मजिस्ट्रेट सोहन लाल कायल दलित थे।
हालांकि, जैसा कि मेघवंशी ने अपनी 2018 की किताब में बताया है, परिस्थितियां दूसरे पक्ष के पक्ष में भारी तौर पर झुकी हुई थीं। वह लिखते हैं, “उस समय सचिव, सरपंच, पटवारी, SHO, डिप्टी SP, एडिशनल SP, BDO, प्रधान और जिला प्रमुख सभी जाट थे।” इसके अलावा, राजे मंत्रिमंडल में मंत्री अजय सिंह किलक और तत्कालीन नागौर सांसद सी आर चौधरी भी जाट थे और उनके परिवारों के डांगावास से संबंध थे।
दलीलें
मेड़ता जिला एवं सत्र न्यायालय में अपने चैंबर में अदालत की फाइलों के ढेर के पीछे बैठे चौधरी बताते हैं कि डांगावास मामला नागौर में अब तक की सिर्फ दूसरी CBI जांच थी।
वकील अभियोजन पक्ष के संस्करण में कई “समस्याओं” की ओर इशारा करते हैं, जिनमें “पुलिस, सीबीआई और अदालत के सामने गवाहों के बयानों में विरोधाभास” और यह तथ्य शामिल है कि घायलों का सबसे शुरुआती एक्सरे घटना के पांच दिन बाद किया गया था।
हिंसा के बारे में चौधरी कहते हैं कि कुछ बयानों में हमलावरों की भीड़ 1,500 लोगों की बताई गई, जबकि FIR में संख्या 200-300 बताई गई है। चौधरी सवाल करते हैं, “लेकिन आप 1,500 या यहां तक कि 300 लोगों में से 40 की पहचान कैसे कर सकते हैं?” वह कहते हैं कि जिन कई लोगों के नाम लिए गए, वे उस दिन डांगावास में थे ही नहीं।
वह इस टकराव को दो समुदायों के बीच का संघर्ष बताए जाने पर सवाल उठाते हैं और कहते हैं कि वास्तव में यह दो परिवारों के बीच था। वह इस बात से भी इनकार करते हैं कि पीड़ितों को कुचलने के लिए ट्रैक्टरों का इस्तेमाल किया गया। चौधरी का तर्क है कि किसी व्यक्ति को ट्रैक्टर से कुचलने पर हड्डियां टूटने के बजाय कुचल जातीं।
दलित परिवारों के इस सवाल पर कि उनके आदमियों को किसने मारा, चौधरी कहते हैं: “आरोपियों ने उस काम के लिए चार से नौ साल जेल में बिताए, जो उन्होंने किया ही नहीं। उनके साल कौन लौटाएगा?”
दलित पक्ष के वकील ने अपनी दलील में कहा कि “ग्रामीण माहौल, उनके शैक्षणिक स्तर, घटना की भयावहता, गवाहों की अधिक उम्र और समय बीत जाने को देखते हुए, उनके साक्ष्य में मामूली विरोधाभास पूरे अभियोजन पक्ष की कहानी को संदेहास्पद नहीं बना सकते।”
मेघवंशी कहते हैं: “यह फैसला एक और भयावह सच्चाई उजागर करता है: एक गरीब दलित परिवार के लिए अदालत तक पहुंचना, वर्षों तक मुकदमा लड़ना, गवाहों को सुरक्षित रखना, दस्तावेज जुटाना और जांच की निगरानी करना बेहद मुश्किल है। और जब आरोपी बरी हो जाते हैं, तो परिवार के पास क्या बचता है?”
जहां पूर्व कांग्रेस मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने “जांच और अभियोजन में गंभीर खामियों” की आलोचना की है, वहीं आम तौर पर मुखर रहने वाले कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा, जो जाट हैं, ने अब तक इस मुद्दे पर टिप्पणी नहीं की है, हालांकि उन्होंने फैसले के बाद कांग्रेस एससी सेल की प्रमुख ममता भूपेश को डांगावास भेजा था।
कांग्रेस के एक अन्य वरिष्ठ नेता सचिन पायलट ने 11 अगस्त को ही इस मुद्दे पर बात की, उसी दिन जब नेता प्रतिपक्ष टीका राम जुल्ली ने डांगावास में पीड़ित परिवार से मुलाकात की।
एससी के लिए आरक्षित मेड़ता सिटी विधानसभा सीट का प्रतिनिधित्व भाजपा के लक्ष्मण राम करते हैं। उन्होंने द इंडियन एक्सप्रेस से कहा: “एक बार हमारे पास पूरा अदालती आदेश आ जाए, तभी हमें जांच की कमियों का पता चलेगा। अगर पीड़ित संतुष्ट नहीं हैं, तो उनके लिए अदालतें खुली हैं… जरूरत पड़ी तो मैं मुख्यमंत्री से भी मिलूंगा।”
हालांकि, दलित अब उम्मीद खो रहे हैं: उनका कहना है कि 2015 में भी, राष्ट्रीय स्तर पर आक्रोश के बावजूद, एससी/एसटी एक्ट के प्रावधानों के तहत मिलने वाली सहायता के अलावा कोई वित्तीय मदद नहीं मिली और उनकी 18 मांगों में से केवल एक – सीबीआई जांच – स्वीकार की गई। पीड़ितों में से एक कहता है, “ऐसा लगता है जैसे हमारे परिवार के सदस्यों की एक बार फिर हत्या कर दी गई है।”
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राजस्थान की राजधानी जयपुर से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने हर किसी के सोचने पर मजबूर कर दिया। 38 साल की बबीता धाकड़ जयपुर के टोंक रोड के पास एक रिहायशी कॉलोनी की संकरी गलियों में रहती थी। उसके पड़ोसी उसे एक बेहद शांत स्वभाव की महिला बताते हैं, जिसे वह घर से बाहर बहुत कम ही देखते थे और जब भी देखते थे तो उसके देखकर कुछ असामान्य सा प्रतीत नहीं होता था। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
