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विशेष: चुनावी दंगल में राजे-रजवाड़े भी

लोकतंत्र में भी इन रियासतदारों और सामंतों को राजनीतिक दल अपने स्वार्थों के कारण जनता के नुमाइंदों का दर्जा दिला कर अपना हित साधने में लगे हुए हैं। राजस्थान में पूर्व राजघरानों से जुड़े लोगों का सांसद और विधायक बनने का सिलसिला बहुत पुराना है। राजनीतिक दल भी अपनी जीत को आसान बनाने के लिए इन रुतबेदार लोगों का सहारा लेने में कोई गुरेज महसूस नहीं करते हैं।

Author November 28, 2018 6:17 AM
बाएं से मानवेंद्र सिंह, राजकुमारी सिद्धि कुमारी और सीएम वसुंधरा राजे। Image Source: Facebook/@ManvendraSingh.Official, @siddhikumaribjp और @VasundharaRajeOfficial)

राजस्थान के विधानसभा चुनाव में पूर्व राजघरानों से जुड़े कई लोग चुनावी मैदान में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। भाजपा और कांग्रेस ने कई सीटों पर पूर्व राजघरानों के सदस्यों को मैदान में उतार कर अपनी जीत की रणनीति बनाई है। पूर्व राजघरानों के अलावा कई सामंत और ठिकानेदार भी लोकतंत्र के मंदिर में बैठने के लिए चुनावी जंग में उतरे हुए हैं। लोकतंत्र में भी इन रियासतदारों और सामंतों को राजनीतिक दल अपने स्वार्थों के कारण जनता के नुमाइंदों का दर्जा दिला कर अपना हित साधने में लगे हुए हैं। राजस्थान में पूर्व राजघरानों से जुड़े लोगों का सांसद और विधायक बनने का सिलसिला बहुत पुराना है। राजनीतिक दल भी अपनी जीत को आसान बनाने के लिए इन रुतबेदार लोगों का सहारा लेने में कोई गुरेज महसूस नहीं करते हैं। भाजपा में तो आधा दर्जन से ज्यादा पूर्व राजघराने खुल कर मैदान में उतरते हैं। कांग्रेस भी राजपरिवारों से दूरी रखने के बजाय उन्हें सक्रिय कर अपने पक्ष में मैदान में उतारने की रणनीति बनाने में देर नहीं करती है। प्रदेश में सामंती संस्कृति हमेशा हावी रही है और उसके कारण कई पूर्व राजघरानों का आम जनता पर अब भी असर दिखाई देता है। इस बार के विधानसभा चुनावों में कई राजघरानों की मौजूदगी के कारण कुछ सीटों पर रोचक मुकाबला होने के आसार हैं।

प्रदेश की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे खुद धौलपुर के पूर्व राजघराने से हैं और मध्य प्रदेश के ग्वालियर घराने की बेटी हैं। राजे वैसे तो 30 साल से सक्रिय राजनीति में हैं और पांच बार सांसद रहने के बाद तीन बार से झालरापाटन सीट से विधायक हैं। इस बार भाजपा ने फिर से उन्हें मुख्यमंत्री के चेहरे के तौर पर पेश किया है और झालरापाटन सीट से किस्मत आजमा रही हैं। उनका मुकाबला इस बार मारवाड इलाके के जसोल ठिकाने से जुड़े कांग्रेस के मानवेंद्र सिंह से है। सिंह भी पहले से ही सियासत में है और भाजपा के दिग्गज नेता जसवंत सिंह के बेटे हैं। कोटा के पूर्व राजघराने की कल्पना देवी इस बार भाजपा के टिकट पर लाडपुरा सीट से मैदान में है। कल्पना देवी के पति इज्यराज सिंह पूर्व में कांग्रेस के कोटा से सांसद रहे हैं और हाल में ही भाजपा में शामिल हुए हैं। इनके अलावा भरतपुर राजघराने के विश्वेंद्र सिंह कांगेस की तरफ से तो इसी पूर्व रियासत की कृष्णेंद्र कौर दीपा भाजपा से चुनावी मैदान में हैं। बीकानेर की पूर्व राजकुमारी सिद्धि कुमारी एक बार फिर भाजपा से विधायक बनने के लिए मैदान में उतरी हुई हैं। खींवसर के पूर्व राजघराने से गजेंद्र सिंह खींवसर लोहावट सीट से भाजपा के उम्मीदवार हैं। हरियाणा की मुसलिम रियासत लोहारू के पूर्व नवाब एए खान उर्फ दुर्रू मियां अलवर जिले की तिजारा सीट से कांग्रेस के उम्मीदवार हैं।

जयपुर के पूर्व राजपरिवार की विधायक दीया कुमारी का इस बार भाजपा ने टिकट काट दिया है। हालांकि दीया कुमारी का कहना है कि उन्होंने ही इस बार निजी कारणों से चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया था। दीया कुमारी का मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से जयपुर की राजमहल पैलेस की भूमि को लेकर तगड़ा विवाद हो गया था। इस बार उन्हें टिकट नहीं दिए जाने के पीछे इसे भी एक बड़ा कारण माना जा रहा है। दीया कुमारी का कहना है कि उन्होंने विधायक के तौर सवाई माधोपुर क्षेत्र की जनता की सेवा की है। उनका परिवार पहले से ही जनता के बीच रहा है। उनके पिता भवानी सिंह ने जयपुर से कांग्रेस की तरफ से लोकसभा का चुनाव भी लड़ा है। दीया कुमारी पूर्व राजघरानों के राजनीति में सक्रिय होने को गलत नहीं मानती हैं। उनका कहना है कि चुनाव के जरिये जनप्रतिनिधि कोई भी नागरिक बन सकता है। उन्हें सिर्फ राजघरानों से होने के कारण चुनाव लड़ने से नहीं रोका जा सकता है।
प्रदेश में कांग्रेस की तरफ से अलवर के पूर्व राजघराने के जितेंद्र सिंह खासे सक्रिय हैं और पिछली यूपीए की केंद्र सरकार में मंत्री भी थे। इस बार अलवर जिले में कांग्रेस के टिकटों के वितरण में उनकी मर्जी से ही उम्मीदवार तय किए गए हैं।

प्रदेश भाजपा अध्यक्ष मदनलाल सैनी का कहना है कि पूर्व राजघरानों के लोगों को पार्टी की तरफ से मैदान में उतारना कोई गलत नहीं है। लोकतंत्र में सबकी भागीदारी होनी ही चाहिए। भाजपा में तो कई राजघरानों से जुड़े लोग बरसों से कार्यकर्ता की हैसियत से काम कर रहे हैं। पार्टी टिकट देने में स्थानीय कार्यकर्ताओं की राय लेकर और उनके जीतने की क्षमता को देख कर चुनाव में उतारती है। इस बार भी इसी नीति के आधार पर टिकट दिए गए हैं।

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