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गवर्नर से छिनकर अपने पास ये अधिकार रखना चाहते हैं अशोक गहलोत, लाने जा रहे असेंबली में नया बिल

शिक्षाविदों और विपक्षी नेताओं ने सरकार के इस योजना की कड़ी आलोचना करते हुए इसे विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता पर हमला करार दिया है।

राजस्थान के मुख्यमत्री अशोक गहलोत। फोटो सोर्स – ANI

राजस्थान सरकार एक विधेयक लाने की योजना बना रही है जिससे विश्वविद्यालयों के कुलपतियों के ट्रांसफर और उन्हें हटाने का अधिकार राज्य सरकार को प्राप्त होगा। फिलहाल इसका अधिकार गवर्नर के पास है। शिक्षाविदों और विपक्षी नेताओं ने सरकार के इस योजना की कड़ी आलोचना करते हुए इसे विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता पर हमला करार दिया है।

शिक्षा विभाग के एक सीनियर अधिकारी के मुताबिक कांग्रेस सरकार विधानसभा में एक विधेयक लेकर आएगी जिसमें विश्वविद्यालयों के कुलपतियों के ट्रांसफर और उन्हें हटाने का अधिकार राज्य सरकार को देने का प्रस्ताव रखा गया है। किसी भी तरह की गड़बड़ी के मामले में कुलपति को स्थानांतरित करने या हटाने की शक्ति राज्य सरकार को हासिल होगी।’

अगर यह विधेयक 27 जून से शुरू हो रहे विधानसभा के बजट सत्र में पास हो गया तो राजस्थान देश का पहला ऐसा राज्य होगा जिसके पास इस तरह का अधिकार होगा। बता दें कि बीते दिनों गहलोत सरकार किताबों में स्वतंत्रता सेनानी विनायक दामोदर सावरकर के नाम के आगे से ‘वीर’ हटाने और महाराणा प्रताप को हल्दीघाटी युद्ध में हारा हुआ बताने के लिए विवादों में रह चुकी है। भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ सरकार के इस कदम की कड़ी आलोचना कर चुका है। ऐसे में सरकार के इस विधेयक पर विपक्ष जमकर आलोचना कर रहा है।

भाजपा नेता और राज्य के पूर्व शिक्षा मंत्री वासुदेव देवनानी ने कहा कि अगर सरकार इस बिल को लाने जा रही है तो ऐसा करना अलोकतांत्रिक और विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता पर हमला होगा। सरकार को कोई भी कदम उठाने से पहले शिक्षाविदों और अन्य राजनीतिक दलों से परामर्श करा चाहिए।’

अखिल भारतीय राष्ट्रीय शिक्षा महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व वीसी जेपी सिंघल ने कहा ‘सरकार का कदम विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता पर हमला है। यह राजनीतिक रूप से प्रेरित है क्योंकि वे भाजपा द्वारा नियुक्त कुलपतियों को हटाना चाहते हैं।’

बता दें कि महासंघ आरएसएस की एक शाखा है। बता दें कि राजस्थान में कुलपतियों को राज्यपाल द्वारा सरकार के परामर्श से तीन साल या 7 साल के लिए नियुक्त किया जाता है लेकिन उन्हें उनके पद से हटाने का राज्य सरकार के पास कोई अधिकार नहीं है।

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