Rahul Gandhi Court Case: कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा पिछले साल अमेरिका की एक यूनिवर्सिटी में भगवान राम को लेकर दिए गए कथित बयान के मामले में एक नया राजनीतिक और कानूनी मोड़ आया। उत्तर प्रदेश के वाराणसी स्थित एक जिला एवं सत्र न्यायालय ने बुधवार को मजिस्ट्रेट के उस पुराने फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर (FIR) दर्ज करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया गया था।
अतिरिक्त जिला एवं सत्र जज यजुवेंद्र विक्रम सिंह ने अब मजिस्ट्रेट को निर्देश दिया है कि वे अधिवक्ता हरिशंकर पांडे द्वारा दायर की गई इस पुनर्विचार याचिका पर नए सिरे से विचार करें।
केंद्र सरकार की अनुमति पर कोर्ट ने क्या कहा
मजिस्ट्रेट अदालत द्वारा याचिका खारिज किए जाने के तकनीकी आधार को स्पष्ट करते हुए सत्र न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण कानूनी टिप्पणी की। कोर्ट ने फैसला सुनाया कि शिकायत पर विचार करने के शुरुआती चरण में भारत से बाहर किए गए किसी कथित अपराध के लिए राहुल गांधी पर मुकदमा चलाने हेतु ‘भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता’ (BNSS) की धारा 208 के तहत केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं है।
अदालत ने साफ किया कि केंद्र की अनुमति की जरूरत तब हो,गी जब मामला संज्ञान (Cognizance) के अंतिम चरण में पहुंचेगा। निजी शिकायत का संज्ञान तभी माना जाता है, जब शिकायतकर्ता द्वारा साक्ष्य प्रस्तुत कर दिए जाते हैं और आरोपी को अपनी बात रखने का अवसर मिलता है।
क्या है राहुल गांधी से जुड़ा पूरा मामला
यह पूरा विवाद राहुल गांधी द्वारा विदेश में दिए गए एक भाषण से जुड़ा है। 12 मई, 2025 को वाराणसी के अधिवक्ता हरिशंकर पांडे ने अदालत में एक शिकायत दर्ज कराई थी। इस शिकायत में आरोप लगाया गया था कि राहुल गांधी ने अमेरिका के ब्राउन विश्वविद्यालय में अपने संबोधन के दौरान भगवान राम को पौराणिक और काल्पनिक व्यक्ति कहा था।
शिकायतकर्ता अधिवक्ता हरिशंकर पांडे ने राहुल गांधी की इस कथित टिप्पणी को बेहद घृणित और विवादास्पद बताते हुए दावा किया कि इससे करोड़ों लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं। उन्होंने तत्कालीन दंड संहिता की संबंधित धाराओं के तहत नेता विपक्ष राहुल गांधी परर मामला दर्ज करने की मांग की थी।
मजिस्ट्रेट के फैसले को दी चुनौती
इससे पहले वाराणसी के मजिस्ट्रेट ने वकील हरिशंकर पांडे की इस याचिका को तकनीकी आधारों का हवाला देते हुए खारिज कर दिया था। इसके बाद हरिशंकर पांडे ने इस फैसले को जिला एवं सत्र न्यायालय में चुनौती दी।
हरिशंकर पांडे का तर्क था कि मजिस्ट्रेट ने उनके द्वारा पेश किए गए तथ्यों की गहराई में जाने के बजाय केवल तकनीकी आधार पर उनकी शिकायत को खारिज कर दिया, जो कि न्यायसंगत नहीं है। सत्र न्यायालय ने पांडे की इस दलील से सहमति जताते हुए अब मजिस्ट्रेट को इस मामले पर आगे की कानूनी कार्यवाही करने की अनुमति दे दी है।
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