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गमजदा राष्ट्रीय और मॉरीशस के लिए कतारबद्ध विचारक

’साहित्यकार व राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीयीय प्रवक्ता व पूर्व राज्यसभा सांसद देवीप्रसाद त्रिपाठी कहते हैं, इसमें एक ही अच्छा काम हुआ है कि हिंदी का वैश्विक चेहरा रहे अभिमन्यु अनत जो मॉरीशस के ही रहने वाले हैं के नाम पर एक मंडप बनाया गया है। इसके अलावा मुझे इस कार्यक्रम में ऐसा कुछ भी अच्छा नहीं महसूस हो रहा जिसका जिक्र किया जाए’।

राष्ट्रीयीय प्रवक्ता व पूर्व राज्यसभा सांसद देवीप्रसाद त्रिपाठी कहते हैं ‘पहली बार ऐसा विश्व हिंदी सम्मेलन हो रहा जिसमें हिंदी के कोई बड़े विद्वान या बड़े लेखक शामिल नहीं।

देश की नजरें एम्स से होने वाले अपने नेता को लेकर अंतिम सत्य के एलान पर टिकी थीं, सोशल मीडिया अटल बिहारी वाजपेयी की कविताओं से भरा था, उसी वक्त हिंदी से जुड़े कुछ चेहरे इस चिंता में थे कि मॉरीशस जाने वाले विमान के लिए सुरक्षा जांच की खिड़की कहां है। सोशल मीडिया पर मॉरीशस की खूबसूरत जगहों और स्थानीय खान-पान के विवरण मांगे जा रहे थे और हवाई अड्डे पर से ली गई सेल्फी पोस्ट की जा रही थी। दिल्ली में सरकारी और निजी स्कूल बंद थे, दिहाड़ी पर काम करने वाले मजदूर तक अपने औजार को आराम दे पूर्व प्रधानमंत्री की अंतिम यात्रा पर श्रद्धांजलि देने को निकल पड़े थे। लेकिन इस राष्ट्रीयीय शोक की छाया मॉरीशस जा रहे हिंदी विद्वानों तक नहीं पहुंची। सत्ता पक्ष और बुद्धिजीवियों के तमाम संगठनों में से किसी ने भी अपनी यात्रा रद्द करने की नहीं सोची। आलम यह रहा कि आखिरी समय तक लोगों के नाम जुड़ते चले गए। इस बार विश्व हिंदी सम्मेलन मॉरीशस में शनिवार से शुरू होगा और खास आमंत्रित सूची के कारण बीच बहस में भी। यह सच है कि ऐसे आयोजन सत्ता पक्ष ही करता है, लेकिन सत्ता की ओर से एक सामंजस्य बनाने की कोशिश की जाती रही है। इस बार इस सामंजस्य को परे झटक हिंदी विद्वानों की भागीदारी तय करने में पूरा मामला एकतरफा है।

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ऐसे महंगे उत्सव हिंदी का कितना भला करेंगे? साहित्यकार व राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीयीय प्रवक्ता व पूर्व राज्यसभा सांसद देवीप्रसाद त्रिपाठी कहते हैं ‘पहली बार ऐसा विश्व हिंदी सम्मेलन हो रहा जिसमें हिंदी के कोई बड़े विद्वान या बड़े लेखक शामिल नहीं। हां, इसमें एक ही अच्छा काम हुआ है कि हिंदी का वैश्विक चेहरा रहे अभिमन्यु अनत जो मॉरीशस के ही रहने वाले हैं के नाम पर एक मंडप बनाया गया है। इसके अलावा मुझे इस कार्यक्रम में ऐसा कुछ भी अच्छा नहीं महसूस हो रहा जिसका जिक्र किया जाए’।
कोलकाता स्थित लेखक व विचारक अरुण माहेश्वरी कहते हैं, ‘यह पूरी तरह से सरकारी रुपयों की बर्बादी है। इससे साहित्य की भलाई कतई नहीं होती है। लंबे समय से एक ऐसी खास प्रजाति विकसित हुई है जो हिंदी के नाम पर दुकानदारी कर रही है’। माहेश्वरी अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहते हैं, ‘यह भद्दा खेल है, इसकी वजह से हिंदी को नुकसान पहुंचता है। खासकर भारत जैसे संघीय राज्य में ऐसे आयोजनों से दूसरी भाषाओं में हिंदी के प्रति द्वेष का भाव पैदा होता है। यह भाषा के नाम पर खिलवाड़ ही नहीं व्यापार है। सरकार इस पर काफी पैसे खर्च करती है। और अब विदेश में खर्च कर रही है’।
साहित्यकार सविता सिंह ने ऐसे आयोजनों की जरूरत पर पूछे गए सवाल पर कहा कि अव्वल तो मैं इसमें कभी शरीक नहीं हुई। सत्ता पक्ष ही इस तरह के उत्सव को आयोजित करता है और उसके द्वारा बुलाए लोग ही वहां जाते हैं। जाहिर है वहां हिंदी की परंपरा में आलोचनात्मक और तार्किक तरीके से बात नहीं ही रखी जाती होगी। इस आयोजन में वैसे लोग शामिल होते हैं जिन्हें सरकार का समर्थन होता है। हिंदी में एक दूसरी परंपरा है जिसमें सत्ता पक्ष की लोकतांत्रिक समझ होती है, जिन्हें न तो इसमें बुलाया जाता है और न वे इसमें जाते हैं।
साहित्य अकादेमी से पुरस्कृत साहित्यकार नासिरा शर्मा का कहना है कि मुझे कभी भी विश्व हिंदी सम्मेलन में बुलाया नहीं गया। मुझे आज तक इसका कोई अनुभव नहीं हुआ। इस मुकाम पर पहुंच कर मैं तो यह टिप्पणी भी नहीं कर सकती कि यह कैसा होता है। नासिरा शर्मा ने कहा कि सबसे दुखद यह है कि आज हर जगह प्रॉपगैंडा का जोड़ और पैसों की फिजूलखर्ची है। इन सम्मेलनों में जितने पैसे खर्च किए जाते हैं और उसका जो हासिल है उसे देख कर यही लगता है कि इन पैसों का सदुपयोग हिंदी साहित्य और उसके लेखकों की बुनियादी जरूरतों पर किया जा सकता है। इतने पैसे खर्च करने का कोई तुक नहीं है। वही पैसे अलग-अलग शहरों, कस्बों में वहां के लेखकों तक पहुंचे, उनकी किताबें छपें, उनकी पहुंच पाठकों तक बनाई जाए। दूर-दराज के इलाकों में जो लिख रहे हैं उन्हें छपने और पाठकों तक पहुंचने के रास्ते पर लाया जाए। लेकिन इन जरूरी चीजों को करने के बजाए महोत्सव जैसी चीजों का फैशन बढ़ता जा रहा है। ये सब देख कर तो यही लगता है कि अच्छा हुआ मैं इसका हिस्सा नहीं बनी। नासिरा शर्मा ने कहा कि एक बार पाकिस्तान में उन्हें अटल बिहारी वाजपेयी से बात करने का मौका मिला था। उनके जैसे जमीन से जुड़े और गंगा-जमुनी तहजीब के प्रतीक नेता के नाम पर विश्व हिंदी सम्मेलन को समर्पित किया जाए तो बहुत सी सकारात्मक चीजें सामने आ सकती हैं।

 

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