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अध्यापक शिक्षा में सुधार की कोशिशें सवालों के घेरे में

अध्यापक शिक्षा में सुधार के उद्देश्य से राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) ने नियमों में बदलाव कर सभी टीचर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन (टीईआइ) के लिए अप्रैल 2018 तक मूल्यांकन कराना अनिवार्य कर दिया है।
Author नई दिल्ली | September 7, 2017 00:44 am
एनसीटीई के इस फैसले पर न केवल टीईआइ बल्कि अंदरूनी अधिकारियों ने भी आपत्ति जताई है और इसे एनसीटीई के अधिनियम (एक्ट) की भावना के खिलाफ बताया है।

अध्यापक शिक्षा में सुधार के उद्देश्य से राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) ने नियमों में बदलाव कर सभी टीचर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन (टीईआइ) के लिए अप्रैल 2018 तक मूल्यांकन कराना अनिवार्य कर दिया है। ‘टीचआर’ नाम से तैयार मॉड्यूल के तहत क्वालिटी काउंसिल आॅफ इंडिया (क्यूसीआइ) संस्थानों की जांच करेगी। लेकिन टीचआर और इसमें क्यूसीआइ की भूमिका सवालों के घेरे में है। संस्थान पूछ रहे हैं कि कौशल विकास मंत्रालय ने आइटीआइ (औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान) के मूल्यांकन के लिए जिस क्यूसीआइ के साथ अपना अनुबंध खराब प्रदर्शन के कारण रद्द कर दिया उसके साथ एनसीटीई का समझौता क्यों? बकौल एनसीटीई, ‘अतीत की विफलता उसकी इस नई जिम्मेदारी पर असर नहीं डालेगी’। हालात यह है कि ज्यादातर राज्यों के संस्थान अदालत से इस प्रक्रिया पर स्थगन ले चुके हैं, जिसके बाद एनसीटीई ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। सूत्रों के मुताबिक, जुलाई के अंत तक केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय के पास 409 टीईआइ से शिकायतें आर्इं। गुराजादा एजुकेशन सोसायटी (आंध्र प्रदेश) ने 12 जुलाई को मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर को लिखे पत्र में कहा, ‘आइटीआइ के मूल्यांकन के लिए एनसीवीटी (नेशनल काउंसिल आॅफ वोकेशनल ट्रेनिंग) का क्यूसीआइ के साथ पांच साल का अनुबंध था जो 2017 में खत्म हो रहा था, लेकिन अभी तक क्यूसीआइ केवल नाममात्र के संस्थानों का मूल्यांकन कर पाई है। यह क्यूसीआइ की विफलता का सबसे बड़ा उदाहरण है। अब एनसीवीटी ने यह अनुबंध रद्द कर दिया है। क्यूसीआइ के साथ एनसीटीई का समझौता समय और धन की बर्बादी है’।

मंत्रालय ने एनसीटीई से जुलाई के अंत में जवाब-तलब किया जिसमें क्यूसीआइ के साथ-साथ टीचआर पर मंत्रालय से मंजूरी का भी सवाल था। एनसीटीई अध्यक्ष डॉ. ए संतोष मैथ्यू ने 2 अगस्त को मंत्रालय को भेजे जवाब में कहा, ‘विगत में जो भी विफलताएं रही हों, यह भावी मूल्यांकन और रैंकिंग के काम को प्रभावित नहीं करेंगी। क्यूसीआइ की पृष्ठभूमि की पूरी जांच कर ली गई है और यह एनसीटीई की ओर से दी गई जिम्मेदारी को पूरा करने में पूरी तरह से सक्षम है’। एनसीटीई के मूल्यांकन और रैंकिंग के लिए तैयार रोडमैप पर एमएचआरडी की मंजूरी पर परिषद का कहना था कि उसकी जनरल बॉडी निर्णय लेने की सर्वोच्च निकाय है। मंत्रालय से इस पर टिप्पणी और दिशानिर्देश मई में मांगा जा चुका है और जनवरी में मंत्रालय के साथ हुई बैठक में इस पर चर्चा भी हो चुकी है। एनसीटीई के टीचआर मॉड्यूल के मुताबिक, सभी मान्यता प्राप्त टीईआइ (जिनकी संख्या लगभग 18000 है) को हर पांच साल पर एक बार मूल्यांकन लेना होगा। पहली बार 100 शीर्ष संस्थानों की रैंकिंग भी मार्च 2018 तक की जा रही है जो दो साल के लिए होगी। इसके लिए एनसीटीई ने इस साल मार्च में 2002 से मूल्यांकन का काम कर रही यूजीसी की स्वायत्त संस्था राष्ट्रीय मूल्यांकन व मूल्यांकन परिषद (नैक) के साथ अपना अनुबंध खत्म कर क्यूसीआइ के साथ समझौता किया। एनसीटीई की दलील है कि साल 2002 से अब तक नैक ने केवल 1522 संस्थानों का मूल्यांकन किया है और यह 2013 में एनसीटीई के लिए मूल्यांकन का काम करने में अपनी असमर्थता जता चुका है।

परिषद ने क्यूसीआइ के पिछले कामों का उल्लेख भी अपने नए एमओयू के पक्ष में रखा है, जिसमें विभिन्न मंत्रालयों और विभागों के साथ के क्यूसीआइ का काम शामिल है। हालांकि, इसमें किसी निविदा प्रक्रिया के अपनाए जाने का जिक्र नहीं है। एनसीटीई द्वारा क्यूसीआई को सौंपे डिमांड-सप्लाई के काम का उल्लेख है जिसके तहत देश में जिला और राज्यवार शिक्षकों की कमी का आंकड़ा इकट्ठा करना है। डिप्लोमा देने वाले टीईआइ के मूल्यांकन के काम का भी जिक्र है जो पिछले साल सौंपा गया था। क्यूसीआइ की सक्षमता के सवाल पर बिहार बीएड कॉलेज एसोसिएशन के अध्यक्ष अभय कुमार सिंह ने कहा, ‘क्यूसीआइ द्वारा हमारी वेबसाइट की मॉनिटरिंग के लिए पिछले साल नवंबर में हर संस्थान को 3250 रुपए जमा करने का निर्देश दिया गया था। लगभग सभी संस्थानों ने रकम जमा की है, लेकिन आज तक काम शुरू नहीं हो पाया। वहीं सूत्रों के मुताबिक, डिमांड व सप्लाई काम भी अधूरा है इसलिए क्यूसीआइ को साढ़े आठ लाख का भुगतान रोक रखा है। डिप्लोमा टीईआइ संस्थानों के मूल्यांकन का काम भी पूरा नहीं हुआ है और अब रकम टीचआर में समायोजित किए जाने की बात चल रही है।

एनसीटीई की यह भी दलील है कि नैक द्वारा मूल्यांकन में ढाई से 3 लाख रुपए लगते हैं, वहीं क्यूसीआइ को केवल 1.0 लाख रुपए देने होंगे। अभय कुमार सिंह का कहना है, ‘बात पैसे की नहीं है। जो संस्थान सही है हम उसी से मूल्यांकन कराएंगे, नैक पर आज तक उंगली नहीं उठी, जबकि बिहार में हाल में जांच के लिए भेजी गई क्यूसीआइ की टीम में क्लर्क व स्टेनो थे, कोई विशेषज्ञ नहीं था, अराजकता की स्थिति है, हमारा अभिभावक (एनसीटीई) ही खिलाफ है। कोर्ट ने यहां तक बोला है कि एनसीटीई को एक एनजीओ (क्यूसीआई- सोसाइटीज एक्ट के तहत पंजीकृत एक गैर लाभकारी स्वायत्त संस्था जो केंद्र सरकार और निजी क्षेत्र के सहयोग से गठित है) पर भरोसा है, अपने नैक पर भरोसा नहीं है’। बकौल अभय सिंह सुधार और नई पद्धति में ढलने के लिए समय चाहिए, जबकि एनसीटीई की तरफ से आवेदन के लिए तीन दिन और रकम जमा के लिए 10 दिन का समय दिया गया।
सूत्रोंं के मुताबिक, देश के लगभग 26 राज्यों के हाई कोर्ट ने स्थगन आदेश जारी किया है जिसके बाद एनसीटीई कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट जाकर सभी मामलों को दिल्ली हाई कोर्ट में स्थानांतरित करने की अपील की, जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया है।

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