महाराष्ट्र सरकार की एक शोपीस परियोजना, जिसका उद्देश्य मुंबई के सबसे बड़े और सबसे पुराने लैंडफिल के स्थल देओनार में धारावी के कुछ निवासियों को स्थानांतरित करना है, लालफीताशाही के जाल में फंस गई है। 99 साल पुराने लैंडफिल के एक हिस्से की सफाई का काम अब तक शुरू नहीं हुआ है – यह मूल समयसीमा से छह महीने से अधिक की देरी है। सूचना का अधिकार (आरटीआई) के तहत प्राप्त और द इंडियन एक्सप्रेस द्वारा की गई पड़ताल से यह सामने आया है।

रिकॉर्ड से पता चलता है कि जहां बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) ने लैंडफिल की सफाई के लिए हैदराबाद स्थित नवयुग इंजीनियरिंग कंपनी लिमिटेड (एनईसीएल) को 2,537 करोड़ रुपये का ठेका दिया था और सभी मंजूरियां हासिल करने तथा काम शुरू करने की समयसीमा जनवरी 2026 तय की थी, वहीं सात में से पांच वैधानिक मंजूरियां अभी लंबित हैं।

इस देरी से धारावी स्थल पर हजारों परिवारों को आवास उपलब्ध कराने की समयसीमा को लेकर नए सवाल खड़े हो गए हैं। मई 2025 में मास्टरप्लान को मंजूरी मिलने के सात साल के भीतर सभी निवासियों को मकान सौंपे जाने हैं।

आरटीआई रिकॉर्ड से पता चलता है कि पांचों मंजूरियों के लिए एनईसीएल ने बीएमसी के माध्यम से आवेदन जनवरी 2026 के बाद ही किए। देरी को देखते हुए बीएमसी ने काम शुरू करने की समयसीमा बढ़ाकर 31 मार्च कर दी। लेकिन लंबित पांच आवेदनों में से केवल एक संशोधित समयसीमा के भीतर दाखिल होने के बाद, एनईसीएल ने और समय मांगते हुए इसे 30 अक्टूबर तक बढ़ाने का अनुरोध किया। इसके बाद बीएमसी ने समयसीमा फिर बढ़ाकर 30 सितंबर कर दी, जबकि काम पूरा करने की तीन साल की समयसीमा बरकरार रखी।

2029 तक परियोजना पूरी हो पाना मुश्किल

बीएमसी के रिकॉर्ड के अनुसार, अब बायो-रिमेडिएशन का काम नवंबर तक ही शुरू होने की संभावना है – जिससे 2029 तक परियोजना पूरी होने की समयसीमा पर बड़ा सवालिया निशान लग गया है।

महाराष्ट्र ने अक्टूबर 2024 में धारावी पुनर्वास परियोजना (डीआरपी) के तहत पुनर्वास आवास के लिए देओनार में 124 एकड़ जमीन चिन्हित की थी। डीआरपी राज्य सरकार और अडानी समूह के बीच एक संयुक्त उपक्रम है। यह उन चार वैकल्पिक भूमि खंडों में से एक था, जिनकी पहचान उन निवासियों को स्थानांतरित करने के लिए की गई थी जो धारावी में ही मुफ्त आवास पाने के पात्र नहीं हैं। उन्हें 12 वर्षों के लिए किराये पर मकान दिए जाएंगे, जिसके बाद उनका स्वामित्व उन्हें हस्तांतरित कर दिया जाएगा।

आवेदनों को दाखिल करने में हुई देरी के बारे में पूछे जाने पर एनईसीएल ने कहा कि इसकी वजह पर्यावरण कानूनों से जुड़े कानूनी प्रभाव थे। एनईसीएल के प्रवक्ता ने कहा, “इस परियोजना में मौजूदा कचरे के ढेर से भूमि खंड को मुक्त करना शामिल है। शुरुआत में हमें लगा था कि परियोजना के लिए पर्यावरण मंजूरी (ईसी) की जरूरत नहीं होगी, क्योंकि लैंडफिल का पुनर्ग्रहण पर्यावरण के अनुकूल प्रक्रिया है।”

देरी को इससे बेहतर तरीके से समझने के लिए यह क्रम काफी है: मैंग्रोव और वन्यजीव मंजूरियों के लिए आवेदन अप्रैल में ही दाखिल किए गए; केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय से मंजूरी के लिए मई में ही संपर्क किया गया; और बॉम्बे हाई कोर्ट से मंजूरी मांगने वाली याचिका अभी तैयार की जा रही है। इसके लिए भी बीएमसी ने अपने वकील की नियुक्ति जून में ही की।

देओनार की इस जमीन को अपार्टमेंट बनाने के लिए तभी सौंपा जा सकता है जब उसका पूरी तरह बायो-माइनिंग किया जा चुका हो, चरणबद्ध तरीके से मंजूरियां हासिल कर ली गई हों और प्रत्येक विकास क्लस्टर का अलग-अलग आकलन किया गया हो। द इंडियन एक्सप्रेस की 11 अप्रैल, 2025 को प्रकाशित एक पड़ताल में पहली बार सामने आया था कि इस तरह की परियोजना केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के दिशानिर्देशों के विपरीत है, जो बंद हो चुके लैंडफिल पर भी आवास, अस्पताल और स्कूल बनाने पर रोक लगाते हैं।

देओनार स्थल पर निर्माण शुरू करने के बारे में पूछे जाने पर धारावी पुनर्विकास परियोजना को क्रियान्वित करने वाली अडानी नवभारत डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड के प्रवक्ता ने कहा, “सभी वैधानिक पर्यावरणीय मंजूरियां हासिल होने और विशेषज्ञों द्वारा स्थल को सुरक्षित तथा आवास के लिए उपयुक्त प्रमाणित किए जाने के बाद ही कोई निर्माण कार्य शुरू होगा।”

वहीं, बीएमसी ने कहा कि जमीन का स्वामित्व उसके पास नहीं है, क्योंकि इसे 2024 में राज्य सरकार को सौंप दिया गया था और उसकी भूमिका केवल रेमेडिएशन को क्रियान्वित करने तथा उसकी निगरानी तक सीमित है। बीएमसी के उप नगर आयुक्त (ठोस अपशिष्ट प्रबंधन) किरण दिघावकर ने द इंडियन एक्सप्रेस से कहा, “टेंडर की समयसीमा इसलिए बढ़ाई गई क्योंकि एकमात्र विकल्प इसे रद्द करना, नया टेंडर जारी करना और नए ठेकेदार की नियुक्ति करना था। इसमें और भी अधिक समय लगता और हमें फिर से नई मंजूरी लेनी पड़ती। यह इस स्तर की पहली परियोजना है और काम शुरू होने से पहले सभी अनुमतियां मौजूद होना जरूरी है।”

देओनार का यह डंपसाइट मुंबई और नवी मुंबई को अलग करने वाली ठाणे क्रीक के किनारे स्थित है। यह मैंग्रोव और ज्वारीय जल निकायों से सटा हुआ फ्लेमिंगो का आवास क्षेत्र है। सफाई की प्रक्रिया में मुख्य रूप से बायो-रिमेडिएशन शामिल है—एक ऐसी प्रक्रिया जिसमें हवा, सूर्य के प्रकाश और सूक्ष्मजीवों जैसे प्राकृतिक तत्वों का इस्तेमाल करके कचरे का उपचार किया जाता है। और ऐसे पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्र में काम करने के लिए सात मंजूरियों की जरूरत होती है—जिनमें से पांच अब अधर में हैं:

प्रदूषण (1 मंजूर, 1 लंबित): कंसेंट टू एस्टैब्लिश (सीटीई), जो स्थल पर मशीनरी और कर्मचारियों की मौजूदगी की अनुमति देता है, के लिए 2 दिसंबर, 2025 को आवेदन किया गया था और महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एमपीसीबी) ने इसे 25 जनवरी, 2026 को मंजूर कर दिया। कंसेंट टू ऑपरेट (सीटीओ), जो सफाई कार्य शुरू करने की अनुमति देता है, के लिए 28 जनवरी, 2026 को आवेदन किया गया था और यह अभी एमपीसीबी के पास लंबित है।

तटीय (1 मंजूर): साइट तटीय क्षेत्र में आती है, इसलिए जरूरी अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) के लिए 26 फरवरी, 2026 को आवेदन किया गया था और महाराष्ट्र तटीय क्षेत्र प्रबंधन प्राधिकरण (एमसीजेडएमए) ने इसे 7 अप्रैल, 2026 को मंजूर कर दिया।

वन (2 लंबित): राज्य के वन एवं राजस्व विभाग के मैंग्रोव सेल से एनओसी जरूरी है, क्योंकि साइट के कुछ हिस्से मैंग्रोव से 50 मीटर के भीतर स्थित हैं। इसके लिए 21 अप्रैल, 2026 को आवेदन किया गया था और यह मंजूरी देने वाले प्राधिकरण नागपुर स्थित मुख्य वन संरक्षक के पास लंबित है। दूसरी एनओसी, जो राज्य के वन्यजीव बोर्ड के माध्यम से भेजी जाती है और संरक्षित आवास के पास काम के लिए जरूरी है, के लिए भी 21 अप्रैल, 2026 को आवेदन किया गया था और यह भी नागपुर के मुख्य वन संरक्षक के पास लंबित है।

केंद्र (1 लंबित): केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से मंजूरी जरूरी है, क्योंकि परियोजना एक पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्र में आती है। इसके लिए 21 मई, 2026 को आवेदन किया गया था और यह मंत्रालय के पास लंबित है। रिकॉर्ड से पता चलता है कि मंत्रालय ने मौजूदा स्थल की परिस्थितियों, वनस्पतियों और जल निकायों तथा जमा कचरे के आधारभूत अध्ययनों से संबंधित जानकारी मांगी थी, जिसे एनईसीएल ने 2 जून को दाखिल किए गए जवाब में उपलब्ध कराया।

कानूनी (1 लंबित): बॉम्बे हाई कोर्ट से मंजूरी जरूरी है। अदालत ने 2018 में मैंग्रोव से 50 मीटर के भीतर काम पर रोक लगाई थी, हालांकि उन सार्वजनिक परियोजनाओं के लिए अपवाद की अनुमति दी थी जिन्हें अदालत से विशेष मंजूरी प्राप्त हो। इसके लिए बीएमसी ने 28 जनवरी, 2026 को आवेदन किया था और यह अभी लंबित है।