उत्तराखंड में बीजेपी के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और उनसे पहले कांग्रेस के सीएम हरीश रावत ने एड-हॉक नियुक्तियों को मंजूरी देने के लिए नियमों और अपने अधिकारियों के सलाह की अनदेखी की। यह मामला 2016 से 2022 के बीच विधानसभा सचिवालय में 227 एड-हॉक नियुक्तियों को मंजूरी देने का है। यह खुलासा Indian Express द्वारा फाइल नोटिंग्स के रिव्यू से हुआ है।
सितंबर 2022 में उत्तराखंड विधानसभा अध्यक्ष रितु कुमारी भूषण के आदेश पर हुई जांच के बाद इन एड-हॉक नियुक्तियों को रद्द कर दिया गया था। लेकिन अब तक भर्तियों के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई है।
रितु कुमारी भूषण ने साल 2022 में कार्यभार संभाला था। इंडियन एक्सप्रेस ने जब उनसे संपर्क किया और जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि उनके द्वारा गठित जांच समिति ने ”इन अवैध नियुक्तियों को खत्म करने की सिफारिश की थी। स्पीकर के रूप में मेरे अधिकार क्षेत्र में जो था, मैंने वह किया।”
धामी और रावत द्वारा अपने विवेकाधीन अधिकारों का इस्तेमाल कर की गई ये भर्तियां उत्तराखंड विधानसभा सचिवालय सेवा नियम, 2011 का उल्लंघन थीं। न कोई विज्ञापन जारी किया गया, न रोजगार कार्यालय से नाम मांगे गए, ना कोई परीक्षा या टेस्ट हुआ, ना चयन समिति गठित की गई और ना ही आरक्षण से जुड़े अनिवार्य प्रावधानों का पालन किया गया।
फाइलों के अनुसार, पिछले एक दशक में की गई 227 एड-हॉक नियुक्तियां तीन चरणों में हुईं। पहली बार- 2016 में तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल और मुख्यमंत्री हरीश रावत के कार्यकाल में 149 नियुक्तियां; 2020 में 6 और 2021 में 72 नियुक्तियां तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष प्रेम चंद अग्रवाल और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के दौरान की गईं। रावत 2014 से 2017 तक मुख्यमंत्री रहे जबकि धामी 2022 में भाजपा की सत्ता में वापसी के बाद अपने दूसरे कार्यकाल में हैं।
रिकॉर्ड बताते हैं कि ये नियुक्तियां मध्यम और निचले स्तर के अलग-अलग पदों पर की गई थीं। इनमें अतिरिक्त निजी सचिव, हाउस रिपोर्टर और संपादक, इंडेक्सर, रिसर्च ऑफिसर, असिस्टेंट रिसर्च ऑफिसर्स, असिस्टेंट प्रोटोकॉल ऑफिसर्स, रिसेप्शनिस्ट, कंप्यूटर ऑपरेटर, कंप्यूटर असिस्टेंट्स, टेक्निशियन, असिस्टेंट हाउसकीपर, सहायक शौचालय निरीक्षक (assistant toilet inspectors), ड्राइवर, गार्ड, अटेंडेंट आदि शामिल थे।
इस साल 11 फरवरी को सामाजिक कार्यकर्ता अभिनव थापर द्वारा दायर जनहित याचिका (PIL) पर उत्तराखंड हाईकोर्ट ने सुनवाई की। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि ये नियुक्तियां तत्कालीन माननीय विधानसभा अध्यक्षों के निर्देश पर और तत्कालीन माननीय मुख्यमंत्रियों की सहमति से की गईं जबकि विधानसभा सचिवालय और सरकार के विभागों की सलाह को स्वीकार नहीं किया गया।
हालांकि, विधानसभा सचिवालय द्वारा लिए गए रुख का हवाला देते हुए उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कहा कि वह ‘इस मुद्दे की आगे जांच करना उचित नहीं समझता’। और इस पहलू को यहीं समाप्त करना ही उपयुक्त माना।
इसके बाद अखबार को दिए गए लिखित जवाब में विधानसभा अध्यक्ष रितु कुमारी भूषण ने कहा, ”1 सितंबर 2022 को मुख्यमंत्री ने मुझे विधानसभा में अवैध भर्तियों के आरोपों की जांच करने के लिए लिखा था। मैंने वरिष्ठ सेवानिवृत्त अधिकारियों की एक समिति गठित की जिसने पाया कि 228 उम्मीदवारों की भर्ती नियमों के खिलाफ की गई थी और संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन हुआ। समिति ने इन अवैध नियुक्तियों को समाप्त करने की सिफारिश की।”
उन्होंने लिखा: ”चूंकि ये नियुक्तियां मुख्यमंत्री की सहमति से की गई थीं। इसलिए इन्हें खत्म करने से पहले उसी प्राधिकरण से मंजूरी लेना जरूरी था। संबंधित प्राधिकरण ने सिफारिश को मंजूरी दी, जिसके बाद इन नियुक्तियों को समाप्त किया गया।” स्पीकर द्वारा बताए गए 228 नियुक्तियों के आंकड़े में 2016 से पहले की गई एक एड-हॉक नियुक्ति भी शामिल है।
रावत, धामी और पूर्व स्पीकर्स कुंजवाल व अग्रवाल ने इंडियन एक्सप्रेस द्वारा पूछे गए सवालों पर कोई जवाब नहीं दिया।
इन एड-हॉक नियुक्तियों को मंजूरी देने वाले स्पीकर्स में सिर्फ अग्रवाल और कुंजवाल ही नहीं थे। 2011 से पहले भी भर्ती नियमों की धज्जियां उड़ाईं गईं। और 2001 से 2007 के बीच नए राज्य विधानसभा सचिवालय में 161 एड-हॉक नियुक्तियां हुईं। 2013-14 के बीच आठ एड-हॉक नियुक्तियां हुईं। इन सभी 169 भर्तियों को 2013-2016 के बीच रेगुलराइज़ कर दिया गया।
आंकड़ों से पता चलता है कि सितंबर 2022 में स्पीकर भूषण के इन्क्वायरी कमीशन ने यह भी सिफारिश की थी कि इन 168 नियमित भर्तियों की भी जांच की जाएगी और कार्रवाई होगी। यह जांच अभी भी लंबित है।
मुख्यमंत्री दो लेकिन पैटर्न एक
नोटिंग्स से पता चलता है कि बीजेपी और कांग्रेस की सरकारों द्वारा की गई नियुक्तियों में एक ही कॉमन पैटर्न फॉलो किया गया:
-विधानसभा सचिवालय को बिना तारीख के और लगभग एक जैसे व्यक्तिगत आवेदन प्राप्त हुए जिनमें उपयुक्त नौकरी देने का अनुरोध किया गया था।
-इन आवेदनों के आधार पर सचिवालय ने नोट तैयार किए, जिनमें जिक्र किया गया कि आवेदक पहले से ही देहरादून स्थित विधानसभा में ‘आउटसोर्स
-कर्मियों’ के तौर पर काम कर रहे हैं और स्पीकर के निर्देश पर उन्हें एड-हॉक नियुक्ति देने के लिए यह प्रस्ताव रखा जा रहा है।
-ना ही किसी भी नोट में न तो देहरादून और न ही गैरसैंण (जहां विधानसभा के ग्रीष्मकालीन सत्र आयोजित होते हैं) में काम को लेकर किसी आपात स्थिति, तात्कालिकता या विशेष आवश्यकता का उल्लेख किया गया था।
-ये नोट फाइलों पर विधानसभा सचिव के कार्यालय द्वारा स्पीकर को आदेश के लिए भेजे गए थे। इनमें स्पष्ट रूप से जिक्र किया गया था कि 2011 के सेवा नियमों के तहत ऐसी एड-हॉक नियुक्तियों की अनुमति नहीं है और 6 फरवरी 2003 के एक सरकारी आदेश (जीओ) के जरिए इस तरह की भर्तियों पर प्रतिबंध लगाया गया था।
-इसके बावजूद स्पीकरों ने फाइलों पर आदेश पारित कर दिए जिसके बाद नियुक्तियों के कार्यालयी आदेश जारी किए गए। और फाइलें राज्य सरकार की एक्स-पोस्ट फैक्टो के लिए भेज दी गईं।
-हालांकि, कार्मिक और वित्त विभागों ने आपत्ति जताई। उन्होंने नियमों का हवाला देते हुए कहा कि नियुक्तियां केवल प्रत्यक्ष भर्ती, प्रमोशन, सेवा हस्तांतरण, प्रतिनियुक्ति या समायोजन के जरिए की जा सकती हैं और इनमें एसटी, एससी, ओबीसी तथा अन्य संबंधित कैटेगिरीज के लिए आरक्षण प्रावधानों का पालन अनिवार्य है।
-विभागों ने यह भी चेतावनी दी कि 2003 के सरकारी आदेश के अनुसार अस्थायी/ एड-हॉक/ संविदा नियुक्तियां केवल ‘अनिवार्य’ परिस्थितियों में, अल्पकालिक आधार पर और कार्मिक विभाग तथा मंत्रिपरिषद की मंजूरी से ही की जा सकती हैं।
-हालांकि, रावत और बाद में धामी ने व्यवसाय नियमावली (Rules of Business) के तहत अपने विवेकाधीन अधिकार (‘विचलन’) का इस्तेमाल करते हुए इन नियुक्तियों को मंजूरी दे दी।
2003 के सरकारी आदेश के अनुसार, किसी भी उल्लंघन को ‘गंभीर कदाचार (disciplinary action)’ माना जाएगा और इसमें शामिल अधिकारियों के खिलाफ ‘अनुशासनात्मक कार्रवाई’ की जाएगी। इसके साथ ही अनियमित रूप से नियुक्त व्यक्तियों के वेतन पर हुए खर्च की वसूली भी की जाएगी।
एड-हॉक नियुक्ति गड़बड़ी मामला: कब-कब क्या हुआ?
2016 से 2022 के बीच जांच के दायरे में आई एड-हॉक नियुक्तियों की टाइमलाइन यह दिखाती है कि कांग्रेस और भाजपा-दोनों ने सेवा नियमों की अनदेखी की:
दिसंबर 2016: स्पीकर कुंजवाल ने 149 एड-हॉक नियुक्तियों को मंजूरी दी।
जनवरी 2017: कार्मिक विभाग ने एड-हॉक नियुक्तियों पर आपत्ति जताई और वित्त विभाग ने भी इस पर सहमति व्यक्त की। इसके बावजूद, उसी दिन तत्कालीन मुख्यमंत्री रावत ने Rules of Business के तहत अपने विवेकाधीन अधिकार- ‘विचलन’ का इस्तेमाल करते हुए भर्ती नियमों में राहत देते हुए फाइल को मंजूरी दे दी।
जून 2020: स्पीकर अग्रवाल ने 6 एड-हॉक नियुक्तियों के आदेश दिए जिन्हें विधान सभा सचिवालय ने जारी किया था। अप्रैल 2021 में फाइल को मंत्रिपरिषद की मंजूरी के लिए आगे बढ़ाया गया।
जून 2021: वित्त विभाग ने एड-हॉक नियुक्तियों पर आपत्ति जताई। इस पर मुख्यमंत्री धामी ने विभाग से ‘स्पष्ट मत’ देने को कहा।
अगस्त 2021: मुख्यमंत्री धामी ने फाइल पर लिखा: ‘विचलन के तहत स्वीकृत। सैलरी ड्रॉन की जा सकती है।’ इसके बाद वित्त विभाग ने भी सहमति जताते हुए लिखा: ‘चूंकि प्रस्ताव को मुख्यमंत्री की मंजूरी मिली है, इसलिए वित्त विभाग को कोई आपत्ति नहीं है।’
दिसंबर 2021: 27 और 28 दिसंबर को स्पीकर अग्रवाल की मंजूरी से 72 लोगों को एड-हॉक नियुक्ति आदेश जारी किए गए। इसके बाद 3 जनवरी को उन्होंने फाइल को सरकार की स्वीकृति के लिए आगे बढ़ाया।
जनवरी 2022: 7 जनवरी को राज्य चुनावों के लिए आदर्श आचार संहिता लागू होने से एक दिन पहले वित्त विभाग ने फाइल लौटाने की इच्छा जताई। विभाग ने नोट किया कि नियमों के तहत ऐसी नियुक्तियां और वेतन भुगतान की अनुमति नहीं है।
फाइल के अगले पन्ने पर मुख्यमंत्री धामी का बिना तारीख का हैंडरिटन नोट दर्ज है। इसमें चुनावों के बाद नई विधानसभा के गठन से पहले गैरसैंण में विधानसभा के काम के संचालन की तात्कालिकता का हवाला देते हुए मुख्यमंत्री ने ‘विचलन’ के तहत एड-हॉक नियुक्तियों को मंजूरी दी। और कार्मिक विभाग को वेतन जारी करने का आदेश दिया। नोट के अंत में लिखा था, ‘इसे मिसाल के रूप में न माना जाए।’
एक वरिष्ठ विधानसभा अधिकारी ने नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर बात की। उन्होंने कहा, ”सभी नए नियुक्त कर्मियों की तैनाती देहरादून में की गई थी, गैरसैंण में नहीं।”
