पंजाब के लुधियाना जिले का नाथोवाल गांव कभी “फौजियों का गांव” कहलाता था। यहां के ज्यादातर घरों से कोई न कोई व्यक्ति सेना में जरूर होता था। गांव के लोग सेना में भर्ती होना गर्व और सम्मान की बात मानते थे। शहीदों की याद में गांव में एक स्मारक भी बना हुआ है, लेकिन अब समय बदल रहा है। ‘द हिंदू’ की रिपोर्ट के मुताबिक गांव के युवाओं की सोच और उनके सपने पहले जैसे नहीं रहे। जहां पहले लड़के सेना में जाने का सपना देखते थे, अब वे पढ़ाई करके अच्छी नौकरी करने या विदेश जाकर बसने की इच्छा रखते हैं।
गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि पहले लगभग 70–75 प्रतिशत घरों से कोई न कोई सेना में था। फौज की वर्दी पहनना गर्व की बात मानी जाती थी। परिवार खुद बच्चों को सेना में जाने के लिए प्रेरित करते थे। देश सेवा को सबसे बड़ा कर्तव्य समझा जाता था।
अब क्यों बदल रही है सोच?
आज के माता-पिता अपने बच्चों के लिए ज्यादा सुरक्षित और स्थिर भविष्य चाहते हैं। उन्हें लगता है कि सेना की नौकरी कठिन और जोखिम भरी होती है। इसलिए वे चाहते हैं कि उनके बच्चे अच्छी पढ़ाई करें और किसी अच्छे पेशे में जाएं। युवाओं को भी लगता है कि शिक्षा के जरिए वे ज्यादा कमाई और आरामदायक जीवन पा सकते हैं। इसी वजह से अब सेना उनकी पहली पसंद नहीं रही।
अग्निपथ योजना का असर
कुछ लोगों का कहना है कि अग्निपथ योजना के आने के बाद सेना में भर्ती को लेकर अनिश्चितता बढ़ी है। इस योजना के तहत चार साल के लिए भर्ती होती है और बाद में केवल कुछ लोगों को ही स्थायी नौकरी मिलती है। परिवारों को डर है कि चार साल बाद अगर नौकरी खत्म हो गई तो आगे क्या होगा? इस चिंता ने भी युवाओं को सेना से दूर किया है।
अब गांव के कई युवक कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका जैसे देशों में जाना चाहते हैं। उनका मानना है कि विदेश में कमाई ज्यादा है और जीवन स्तर बेहतर है। कई परिवार अपने बच्चों को पढ़ाई या नौकरी के लिए विदेश भेज भी रहे हैं। उन्हें लगता है कि वहां भविष्य ज्यादा सुरक्षित है।
अब गांव में पढ़ाई पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है। माता-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चे डॉक्टर, इंजीनियर या किसी बड़ी कंपनी में नौकरी करें। पहले जहां सेना में जाना सबसे बड़ा लक्ष्य था, अब अच्छी शिक्षा और अच्छी सैलरी ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है।
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