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आंख की रोशनी छीनने वाली पेलेट गनों का कश्मीर में सेना फिर करेगी इस्तेमाल, पावा शेल्स से नहीं डर रहे प्रदर्शनकारी

पिछले साल जुलाई में हिजबुल कमांडर बुरहान वानी के मारे जाने के बाद घाटी में हिंसा भड़क उठी थी और प्रदर्शनकारियों पर नियंत्रण पाने के लिए सुरक्षाबलों ने पेलेट गनों का इस्तेमाल किया था।

पिछले साल घाटी में हिंसक प्रदर्शनों के दौरान पेलेट गनों के कारण सैकड़ों लोग घायल हो गए थे। ज्यादातर लोगों की आंख में छर्रे लगे थे, जिसके कारण कई लोगों की रोशनी भी चली गई थी।

पिछले साल कश्मीर में हुए हिंसक प्रदर्शनों के दौरान इस्तेमाल की गई पेलेट बंदूकों का सेना फिर से इस्तेमाल करेगी। पैरामिलिटरी बलों ने पाया है कि पावा शेल्स भी प्रदर्शनकारियों को डराने में सक्षम नहीं हैं। सीआरपीएफ के डायरेक्टर जनरल के दुर्गा प्रसाद ने सोमवार को बताया कि किसी भी प्रदर्शन और सेना विरोधी अभियानों को तोड़ने के लिए पेलेट गन के एक मॉडिफाइड वर्जन का इस्तेमाल किया जाएगा। उन्होंने कहा कि बीएसएफ की मदद से बल ने पेलेट गनों को मॉडिफाई करने का फैसला किया है, ताकि कम चोट लगे। पिछले साल जुलाई में हिजबुल कमांडर बुरहान वानी के मारे जाने के बाद घाटी में हिंसा भड़क उठी थी और प्रदर्शनकारियों पर नियंत्रण पाने के लिए सुरक्षाबलों ने पेलेट गनों का इस्तेमाल किया था। इसके कारण सैकड़ों लोग घायल हुए थे और कई लोगों को आंख में गंभीर चोटें आई थीं। जब इसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन हुए तो पेलेट गनों की जगह मिर्च वाले पावा शेल्स ने ले ली।

एेसी होगी मॉडिफाइड बंदूक: इस नई बंदूक में एक डिफ्लेक्टर का इस्तेमाल होगा। सीआरपीएफ ने बीएसएफ की एक खास वर्कशॉप से बंदूक की मजल पर मेटल डिफ्लेक्टर लगाने को कहा है, ताकि पेलेट में से निकलने वाले छर्रे किसी शख्स के पेट से ऊपर वार न करें। घाटी में तैनात सीआरपीएफ जवानों को प्रदर्शनकारियों के पैरों पर पेलेट गन चलाने के आदेश दिए गए हैं। एक सीआरपीएफ अधिकारी ने बताया कि हमने सैनिकों से कहा है कि वे डिफ्लेक्टर का इस्तेमाल करें और प्रदर्शनकारियों के पेट से ऊपर वार न करें। डिफ्लेक्टर से सिर्फ दो प्रतिशत चांस ही हैं कि निशाना जगह से कहीं और लग जाए।

मंगलवार को रिटायर हुए प्रसाद ने कहा कि पावा शेल्स की उम्र काफी लंबी होती है और वह कई स्थितियों में कारगर साबित हुए हैं। हमने यह साफ कर दिया है कि जवान इसका प्रयोग तभी करेंगे, जब स्थिति इसकी इजाजत देगी। फिलहाल स्थिति पिछले साल जैसी नाजुक नहीं है। सुरक्षाबलों पर पत्थर फेंकने जैसी स्थिति अब वहां नहीं होती। सीआरपीएफ के मुताबिक पिछले साल हिंसा में 2,580 जवान घायल हुए थे, जिनमें से 122 की हालत बेहद गंभीर थी। सेना के शिविरों में 142 हादसे पत्थरबाजी के, 43 मामले पेट्रोल अटैक, एसिड और कैरोसीन बम के थे।

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