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एम्स: जांच व इलाज महंगा करने का प्रस्ताव ठंडे बस्ते में डाला

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में जांच व इलाज महंगा करने की कोशिश के तहत शुल्क संशोधित करने वाले प्रस्ताव का संकाय सदस्यों की ओर से कड़े विरोध व मीडिया में खबरें छपने के बाद इस मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है।

Author नई दिल्ली | February 25, 2017 00:47 am
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) दिल्ली

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में जांच व इलाज महंगा करने की कोशिश के तहत शुल्क संशोधित करने वाले प्रस्ताव का संकाय सदस्यों की ओर से कड़े विरोध व मीडिया में खबरें छपने के बाद इस मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है। हाल में हुई शुल्क समीक्षा समिति की बैठक में उपयोग शुल्क पर चर्चा की गई। जिसमें इस प्रस्ताव को शुल्क बढ़ाने की कवायद के तौर पर लाया गया था। लेकिन पहले दिन ही ज्यादातर संकाय सदस्यों ने इसका यह कहते हुए विरोध किया कि इससे स्वास्थ्य सुविधाओं को समान रूप से सबको मुहैया होने की अवधारणा से समझौता होगा। इसके अलावा इससे एम्स के मूल मकसद पर भी असर पड़ेगा क्योंकि ज्यादातर गरीब मरीज ही इलाज के लिए एम्स आते हैं। इसमें एक संकाय सदस्य व गैस्ट्रो के विभागाध्यक्ष डॉक्टर अनूप सराया ने देश ही नहीं तमाम विदेशी संस्थानों व अंतरराष्ट्रीय एजंसियों के हवाले से जिसमें विश्व स्वास्थ्य संगठन तक के पदाधिकारी शामिल हैं कहा था कि इसका सभी ने विरोध किया है। दलील यह भी दी गई थी कि किसी तरह की शुल्क बढ़ोतरी व इलाज महंगा होने से बीमारी को यथासंभव नजरअंदाज करने की प्रवृत्ति बढ़ेगी।

एम्स के एक अधिकारी ने बताया कि संकाय सदस्यों के विरोध के बाद, उपयोग शुल्क में संशोधन करने के प्रस्ताव को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है। वित्त मंत्रालय ने संस्थान से अपने जांच व इलाज शुल्क की समीक्षा करने और संशोधित करने के लिए कहा था जिसमें पिछले 20 सालों से कोई बदलाव नहीं हुआ है। एम्स के उपनिदेशक वी श्रीनिवास ने कहा कि गैर योजना खर्च में संस्थान ने अतिरिक्त 300 करोड़ रुपए की मांग की है। संस्थान फिलहाल 101 करोड़ रुपए मरीजों से शुल्क के तौर पर जमा करता है। इसमें ओपीडी शुल्क, विभिन्न विभागों में होनी वाली जांच, रेडियोलॉजी शुल्क, रोगी देखभाल और कमरों या बिस्तर के किराए शामिल हैंं।

सदस्यों में वितरित किए गए बैठक के मिनट्स के मुताबिक, गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग के मुखिया डॉक्टर अनूप सराया ने कहा कि संसदीय पैनल और विश्व स्वास्थ्य संगठन की विशेषज्ञ समिति ने संस्थान में उपयोग शुल्क लगाने के खिलाफ चिंता जाहिर की है क्योंकि यह समाज के बड़े तबके तक सेवाओं की पहुंच को रोकता है। इससे जब तक मरीज का मर्ज या तकलीफ बर्दाश्त के बाहर नहीं हो जाता तब तक वह बीमारी का इलाज करने आगे नहीं आता। और मर्ज बढ़ा लेता है। इलाज महंगा होने से यह मानसिकता व बीमारी का बोझ दोनों बढ़ने का खतरा है।

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