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अरुणाचल के दिवंगत सीएम की पत्नी ने उपराष्ट्रपति से की मांग- मेरे पति के खुदकुशी केस में सीजेआई के खिलाफ हो जांच

पिछले साल अगस्त में कलिखो पुल ने एक 60 पन्ने का स्सूसाइड नोट लिखा था, जिसमें उन्होंने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से लेकर कई नेताओं और जजों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे

अरुणाचल प्रदेश के पूर्व सीएम कलिखो पुल की पत्नी डांगविमसाई पुल।

अरुणाचल प्रदेश के पूर्व दिवंगत मुख्यमंत्री कलिखो पुल स्यूसाइड केस में एक नया मोड़ आ गया है। उनकी पत्नी डांगविमसई पुल ने उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी से मंगलवार को मुलाकात की और कहा कि चीफ जस्टिस जेएस खेहर और सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान जज दीपक मिश्रा के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों के लिए एफआईआर दर्ज कर जांच होनी चाहिए। एक ज्ञापन में डांगविमसई ने कहा कि चूंकि इस मामले में सीजेआई और बाकी सुप्रीम कोर्ट के जज शामिल हैं, इसलिए आरोपों की गंभीरता से किसी विश्वसनीय एसआईटी टीम से जांच होनी चाहिए। बता दें कि पिछले साल अगस्त में कलिखो पुल ने एक 60 पन्ने का स्सूसाइड नोट लिखा था, जिसमें उन्होंने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से लेकर कई नेताओं और जजों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे।

बता दें कि पुल की एक डायरी ”मेरे विचार” बरामद हुई थी, जिसमें उन्होंने अपनी खुदकुशी की वजह अरुणाचल के कांग्रेस नेताओं और न्यायापालिका में भ्रष्टाचार को बताया था, जिन्होंने उन्हें पद से हटाया था। डांगविमसई ने कहा कि पद से हटाए जाने के बाद उनके पति डिप्रेशन में थे और मेरे विचार असल में उनका स्यूसाइड नोट है। उनके साथ वकील और एक्टिविस्ट प्रशांत भूषण, स्वराज अभियान में उनके साथी योगेंद्र यादव, ब्यूरोक्रेट से एक्टिविस्ट बने हर्ष मंदर और आईटीआई एक्टिविस्ट अंजलि भारद्वाज भी मौजूद थीं।

आपको बता दें कि कलिखो पुल के नाम का मतलब है 47 साल के कलिखो पुल के नाम का मतलब है ‘बेहतर कल’। इस नाम को उन्‍होंने जिंदगी में सार्थक भी किया था। वह बढ़ई से चौकीदार और फिर राज्‍य के मुख्‍यमंत्री बने थे। कलिखो पुल का अंजाव जिले में हवाई के वल्‍ला गांव में हुआ था। वह केवल 13 महीने के थे, जब उनकी मां कोरानलु दुनिया छोड़ गईं। इसके पांच साल बाद पिता का भी साया उठ गया था। चाची ने पालन-पोषण किया, लेकिन जिंदगी दुश्‍वार हो गई। स्‍कूल जाने के बजाय उन्‍हें जंगल जाना पड़ता था। वहां से लकड़‍ियां चुन कर लाते थे। एक इंटरव्‍यू में यह कहानी बयां करते हुए पुल ने बताया था, ‘मैं स्‍कूल नहीं जा पाया। जब दस साल का था तब हवाई क्राफ्ट सेंटर में बढ़ईगीरी का कोर्स किया। यह कोर्स दो साल का था। वहां स्‍टाइपेंड भी मिलता था।

कोर्स खत्‍म करने के बाद वहीं ट्यूटर के तौर पर काम करने का मौका मिल गया। यह काम 96 दिन तक चला। असल में ट्यूटर छु्ट्टी पर चले गए थे, तो मुझे उनकी जगह लगा दिया गया था। उन दिनों सेना और सरकार के बड़े अफसर ऑर्डर देने के लिए सेंटर पर आया करते थे। मैं उन्‍हें रोज आते देखता था। उन्‍हें देख कर मेरे मन में पढ़ने की ललक जगी। तो मैंने एक वयस्‍क शिक्षा केंद्र में दाखिला लिया। रात को मैं वहां जाता था। उस केंद्र में एक दिन कोई कार्यक्रम था। उस कार्यक्रम में शिक्षा मंत्री और डिस्ट्रिक्‍ट कलक्‍टर सहित कई बड़े लोग आए थे। मैंने हिंदी में स्‍वागत भाषण दिया और एक देशभक्ति गाना भी गाया। डिस्ट्रिक्‍ट कलक्‍टर इतने प्रभावित हुए कि उन्‍होंने तुरंत मुझे डे बोर्डिंग स्‍कूल में दाखिल करवाने का आदेश दे दिया। कुछ ही दिन में छठी क्‍लास में मेरा दाखिला हो गया। वहां पढ़ाई के दौरान ही मैंने सर्किल ऑफिस में चौकीदार की नौकरी कर ली। मेरा काम तिरंगा लहराना और झुकाना था।’

कलिखो पुल को गरीबी के साथ बीमारी ने भी परेशान कर रखा था। 1980 से छह साल तक वह क्रोनिक गैस्ट्रिक से परेशान रहे थे। उनके पास मात्र 1600 रुपए थे। इलाज के लिए उन्‍होंने अपने रिश्‍तेदारों के आगे हाथ भी फैलाया। पर एक ने दो, तो दूसरे ने पांच रुपए दिए। तब उन्‍हें गहरा सदमा लगा था। इंटरव्‍यू में इसे जाहिर करते हुए उन्‍होंने कहा था, ‘मुझे उस वक्‍त लगा था कि मैं वाकई अनाथ हूं। एक दिन तो मैंने खुदकुशी का मन बना लिया था। लोहित नदी के पुल पर चला गया। वहां 36 मिनट तक खड़ा रहा, लेकिन लोगों की भीड़ के चलते नदी में छलांग नहीं लगा सका।’यह एक तरह से पुल के लिए नए जीवन की शुरुआत थी।

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