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उपचुनाव नतीजे: झारखंड में हारी भाजपा, पीएम नरेंद्र मोदी के जाने का भी नहीं पड़ा कोई असर

9 तारीख को हुए विधानसभा उपचुनाव और फिर 13 अप्रैल को आए इसके नतीजे को भले ही राष्ट्रीय मीडिया ने वैसा महत्व नहीं दिया।

विश्व के 100 सर्वाधिक प्रभावशाली लोगों की लिस्ट में पीएम नरेंद्र मोदी को नहीं मिला एक भी वोट।

9 तारीख को हुए विधानसभा उपचुनाव और फिर 13 अप्रैल को आए इसके नतीजे को भले ही राष्ट्रीय मीडिया ने वैसा महत्व नहीं दिया। पर कई मायने में यह सीट खास है। दिल्ली में भाजपा की जीत का तो ढिंढोरा पीटा जा रहा है। मगर लिट्टीपाड़ा में भाजपा की हार का और झारखंड मुक्ति मोर्चा की जीत का वैसा जिक्र नहीं है। मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री का यहां आना भी असरदार साबित नहीं हुआ। झारखंड के देसम गुरु शिबू सोरेन को आज भी इन इलाकों में कम करके आंकना बेबकूफी साबित हुई। संथाली इन्हें इसी नाम से पुकारते है।

लेकिन लिट्टीपाड़ा में इस बात की चर्चा जाहिर करती है कि भाजपा को छोटानागपुर और संथालपरगना टेनेंसी एक्ट्स में संशोधन और आपसी फूट ले डूबी। यह पराजय झारखंड में विरोधी दलों की ताकत बढ़ाने में ऊर्जा का काम करेगा।

यों बीते चुनाव पर नजर डालने पर पता चलता है कि लिट्टीपाड़ा सीट झामुमो के कब्जे में रही है। 2005 में झामुमो की सुशील हांसदा 29661 वोट पाकर जीत हासिल की थी। भाजपा के सोम मरांडी 22464 मत लाकर पराजित हुए थे। 2009 में झामुमो के साइमन मरांडी को 29875 मत मिले। तो कांग्रेस के अनिल मुर्मू को 24478 वोट मिले और हारे। 2014 में साइमन मरांडी ने भाजपा का दामन थाम चुनाव लड़े और हारे। इन्हें 42111 वोट मिले। अनिल मुर्मू ने भी कांग्रेस का पंजा छोड़ झामुमो का तीर धनुष पकड़ा और 67194 मत हासिल कर विजय हुए। अबकी उपचुनाव में साइमन मरांडी ने झामुमो की टिकट पर चुनाव लड़ करीब 65 हजार वोट हासिल कर जीते। इनके प्रतिद्वंदी भाजपा के हेमलाल मुर्मू को 52 हजार से ज्यादा वोट मिले। मसलन 13 हजार वोटों से हारे।

झामुमो के साइमन मरांडी की जीत कई मायने में खास है। अव्वल तो झारखंड में रघुवर दास के नेतृत्व में भाजपा की सरकार है। लुईस मरांडी समेत आधा दर्जन मंत्री यहां कई रोज से जमे थे। और तो और खुद मुख्यमंत्री रघुवर दास एक हफ्ता तक लगातार यहां डेरा डाले थे। इतना ही नहीं चुनाव से ठीक तीन रोज पहले 6 अप्रैल को साहेबगंज में खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जनसभा कर 2000 करोड़ की लागत से बनने वाले साहेबगंज– मनिहारी गंगा नदी पुल का शिलान्यास किया। इस मौके पर केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी भी मौजूद थे।

यहां यह बताना जरूरी है कि लिट्टीपाड़ा साहेबगज जिले और राजमहल लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है। जाहिर है 9 अप्रैल के उपचुनाव के मद्देनजर प्रधानमंत्री का कार्यक्रम 6 अप्रैल को आने का तय हुआ। मगर लोकलुभावन भाषण का जादू भी यहां चल नहीं पाया। रामलाल सोरेन, रामजी मुर्मू सरीखों से बातचीत करने पर पता चला कि लिट्टीपाड़ा समेत संथालपरगना इलाके की एक लाख महिलाओ को स्मार्ट फोन और नवगठित पहाड़िया बटालियन के एक हजार युवकों को बहाली पत्र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिया। चुनाव अभियान की बागडोर खुद मुख्यमंत्री रघुबर दास अपने हाथों में रखे थे। उनके तमाम तरकश के तीर भोथरे साबित हुए।

लिट्टीपाड़ा विधानसभा क्षेत आदिवासी बहुल और बहुत ही पिछड़ा और गरीबी वाला है। साहेबगज तो झारखंड का मरता हुआ शहर है।यहां से रेलवे का लोको मालदा शिफ्ट कर दिया था। इसके बाद से तो यहां से लोगों का पलायन तेजी से हुआ। इस ओर किसी का भी ध्यान नहीं है। सभी ने यहां के मतदाताओं का राजनैतिक दोहन किया है। अपने राजनैतिक अनुभव के कारण शिबू सोरेन ने आदिवासियों को अपनी जमीन की अहमियत का एहसास कराया और कहा कि भाजपा एक दफा फिर महाजनी प्रथा लाना चाहती है। जिसे हम हरगिज नहीं होने देंगे। उनका यह नारा आदिवासियों के बीच काम कर गया।असल में संथाल आवादी की नजर में जमीन और माटी से बढ़कर किसी चीज की अहमियत नहीं है। नरेंद्र मोदी का फोकस पहाड़िया जनजाति पर था। शिबू सोरेन बगैर किसी शगूफे और कोई आश्वासन के अपना इलाका बचा लिया और गढ़ जीत लिया।

भाजपा की आपसी फूट भी हार की वजह बताई जा रही है। बगल का गोड्डा संसदीय क्षेत्र पर भाजपा का कब्जा है। निशिकांत दुबे यहां से लोकप्रिय सांसद है। इलाके पर इनकी खासी पकड़ है। फिर भी इनको प्रचार से दूर रखा गया। यह सलाह चुनाव अभियान के कमांडर मुख्यमंत्री को किसने दी यह समझ से परे है। इनको इस काम में लगाया जाता तो भाजपा को फायदा हो सकता था।

एक बात साफ है कि झामुमो का गढ़ ध्वस्त करने के लिए झारखंड सरकार को साहेबगज इलाके में रोजगारन्मुख कार्यक्रम चलाने होंगे। वह भी तरीके और तेजी से। ऐसा साहेबगंज के पत्रकार अभिजीत बोलते है। इसके अलावे छोटानागपुर और संथालपरगना टेनेंसी कानून का संशोधन भी रघुबर दास सरकार की गले की हड्डी बन सकता है। और इस अहम मुद्दे को लेकर इस उपचुनाव में हुई भाजपा की हार कहीं विरोधी दलों को मजबूत आंदोलन खड़ा करने का मौका दे सकता है। यह खतरा भी पैदा हो गया है।

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