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राजनीतिक स्थिरता की राह पर चला झारखंड

झारखंड ने 2000 में गठन के चौदह सालों बाद इस साल पहली बार राजनीतिक स्थिरता देखी क्योंकि भाजपा के रघुवर दास के नेतृत्व में यहां एक पूर्ण बहुमत की स्थिर सरकार का गठन हुआ..

Author रांची | Published on: January 1, 2016 12:38 AM
झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास।(फाइल फोटो)

झारखंड ने 2000 में गठन के चौदह सालों बाद इस साल पहली बार राजनीतिक स्थिरता देखी क्योंकि भाजपा के रघुवर दास के नेतृत्व में यहां एक पूर्ण बहुमत की स्थिर सरकार का गठन हुआ। इसका परिणाम यह हुआ कि यहां सभी विभागों में आवश्यक नीतियों के निर्माण और नियमावलियों के निर्माण का कार्य तेजी से शुरू हुआ और पहली बार वामपंथी उग्रवाद समाप्ति की ओर बढ़ता नजर आया।

पिछले साल नवंबर-दिसंबर में हुए विधानसभा चुनावों के बाद झारखंड में 28 दिसंबर को भाजपा नेता रघुवर दास ने पूर्ण बहुमत की सरकार का गठन किया जो इस राज्य के लिए अपने-आप में अजूबा था क्योंकि रघुवर दास से पहले राज्य में कुल नौ मुख्यमंत्री बन चुके थे और यहां तीन बार राष्ट्रपति शासन भी लगाया जा चुका था जिसके बाद जनता के लिए स्थिर सरकार की कल्पना भी मुश्किल था।

राजनीतिक स्थिरता का यह परिणाम था कि झारखंड में पहली बार इस साल किसी भी तरह की राजनीतिक उठापटक नहीं हुई। सरकार की पिछले साल यह भी एक उपलब्धि रही कि राज्य के इतिहास में पहली बार अब एक पार्टी की बहुमत की सरकार स्थापित है। यहां कुल 82 सदस्यीय विधानसभा में अब भाजपा के खाते में अपने 43 विधायक हैं।

राजनीतिक स्थिरता के कारण पहली बार राज्य में वामपंथी उग्रवाद का ग्राफ तेजी से गिरा। नक्सल रोधी अभियान के दौरान एरिया कमांडर स्तर के करीब 37 दुर्दांत नक्सलियों को गिरफ्तार किया गया। इतना ही नहीं झारखंड ईज आॅफ डूइंग बिजनेस के मामले में देश के सभी राज्यों में तीसरे स्थान पर आ गया जबकि इससे पहले वह इस मामले में 29वें स्थान पर था।

पिछले साल झारखंड में वामपंथी उग्रवाद में भारी कमी आई है और नक्सली घटनाओं में राज्य में जहां बीस फीसद की कमी दर्ज की गई है वहीं ऐसी घटनाओं में मारे जाने वाले आम लोगों और सुरक्षाकर्मियों की संख्या में भी लगभग पचास फीसद की कमी आई। पिछले साल झारखंड में कुल 186 नक्सली वारदातें हुई जबकि इसी अवधि में 2014 में 231 और 2013 में 349 नक्सली घटनाएं हुई थीं। इस तरह 2014 की तुलना में इस साल नक्सली घटनाओं में लगभग बीस फीसद की कमी दर्ज की गई है।

नक्सली घटनाओं में जहां 2013 में 68 मुठभेड़ों में 26 पुलिसकर्मी शहीद हुए थे वहीं 2014 में 59 मुठभेड़ों में आठ पुलिसकर्मियों की मौत हुई। इसके विपरीत इस साल कुल 45 नक्सली मुठभेड़ों में चार ही पुलिसकर्मी शहीद हुए हैं जो पिछले साल का महज पचास फीसद है। वामपंथी उग्रवाद की घटनाओं में इस साल मारे गए आम लोगों की संख्या में भी पिछले साल की तुलना में लगभग पचास फीसद की कमी दर्ज की गई। जहां ऐसी घटनाओं में 2013 में 126 आम लोगों की मौत हुई थी वहीं पिछले साल 86 और वर्तमान वर्ष में 44 लोगों की मौत हुई है।

पिछले साल लगातार दूसरी बार पूरे वर्ष नक्सली कोई जन अदालत लगाने में पूरी तरफ विफल रहे और राज्य सरकार के सुरक्षा इंतजाम से ऐसा कोई कार्य करने की उनकी हिम्मत नहीं हुई। जहां 2011 में नक्सलियों ने 31 जन अदालतें लगाकर मासूम लोगों की हत्या की थी वहीं 2012 में उन्होंने 20 और 2013 में दस जन अदालतें लगाई थीं।

इस साल नक्सली बारूदी सुरंग में विस्फोट करने की किसी घटना को भी अंजाम नहीं दे सके। नक्सलियों के राज्य से होकर चलने वाली रेलगाड़ियों को भी बेपटरी करने और नुकसान पहुंचाने की घटनाओं में कमी दर्ज की गई और पूरे साल में ऐसी सिर्फ तीन घटनाएं दर्ज की गर्इं। खुद मुख्यमंत्री ने दावा किया कि वामपंथी उग्रवाद में शामिल शीर्ष नक्सली कठोर शासन के भय से राज्य की सीमा छोड़कर दूसरे सुरक्षित स्थानों पर भाग गए जिससे झारखंड में अमन चैन का वातावरण स्थापित करने में मदद मिली।

इस साल एरिया कमांडर और उससे ऊपर के कुल 37 नक्सली कमांडर गिरफ्तार भी किए गए जबकि कुल मिलाकर चार सौ से अधिक नक्सली झारखंड में गिरफ्तार किए गए और उनसे बड़ी संख्या में हथियार और गोलाबारूद भी बरामद किया गया। अहम बात यह रही कि इस साल झारखंड में पुलिस से नक्सली कोई भी हथियार छीनने या लूटने में सफल नहीं हो सके।

इस साल नौ जून को नक्सलियों के खिलाफ सुरक्षा बलों को सबसे बड़ी सफलता मिली जब कोबरा बटालियन ने 12 नक्सलियों को एक मुठभेड़ में मार गिराया। इसी साल 18 अगस्त को रांची के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक प्रभात कुमार और उनके अनेक सहयोगी पड़ोस के खूंटी जिले में नक्सलियों के साथ हुई मुठभेड़ में बालबाल बचे जब उनके कंधे में गोली लगी लेकिन अस्पताल में समय रहते आपरेशन कर उनकी जान बचा ली गई। राज्य सरकार ने इस साल राज्य में भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए एंटी करप्शन ब्यूरो की स्थापना की जिससे अनेक पदाधिकारी ऐसे मामलों में या तो गिरफ्तार हुए या निलंबित किये गये।

भ्रष्टाचार के कलंक से बदनाम हुए झारखंड राज्य की एक और उपलब्धि यह रही कि राज्य सरकार, उसके किसी मंत्री अथवा अधिकारी पर किसी बड़े भ्रष्टाचार के आरोप नहीं लगे। मुख्यमंत्री रघुवर दास ने इस साल अनेक बड़े आइएएस अधिकारियों समेत राज्य के अफसरों पर अनुशासनहीनता अथवा समय पर कार्य करने में विफलता के मामलों में सीधी कार्रवाई की। झारखंड में राजनीतिक स्थिरता के बाद व्यापार का माहौल भी अच्छा बना और अनेक बड़ी कंपनियां यहां निवेश के लिए आगे आ रही हैं। इतना ही नहीं इस साल राज्य में निजी क्षेत्र में विश्वविद्यालय और संस्थान स्थापित करने के लिए भी दर्जन भर से अधिक प्रस्ताव आए हैं। राज्य सरकार के श्रम मंत्रालय ने श्रम कानूनों में तेजी से सुधार किए जिससे प्रेरित होकर प्रधानमंत्री कार्यालय ने अन्य राज्यों को भी राज्य के नए श्रम कानूनों का अनुसरण करने की सलाह दी।

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