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हजरत निजामुद्दीन की दरगाह में मुस्लिम महिलाओं की एंट्री की मांग, हाई कोर्ट पहुंचीं छात्राएं

‘दरगाह’ के बाहर हिंदी और अंग्रेजी में नोटिस लगा हुआ है कि महिलाओं को प्रवेश की अनुमति नहीं है।

Author नई दिल्ली | December 7, 2018 9:58 AM
निजामुद्दीन दरगाह

कानून की कुछ छात्राओं ने दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका डालकर यहां के हजरत निजामुद्दीन औलिया दरगाह में महिलाओं को प्रवेश करने की अनुमति देने के लिए केंद्र और अन्य प्राधिकारों को निर्देश देने की मांग की है। जनहित याचिका में दावा किया गया है कि ‘दरगाह’ के बाहर हिंदी और अंग्रेजी में नोटिस लगा हुआ है कि महिलाओं को प्रवेश की अनुमति नहीं है। याचिका पर अगले हफ्ते सुनवाई हो सकती है। कानून की छात्राओं ने याचिका में कहा है कि दिल्ली पुलिस सहित कई प्राधिकारों से उन्होंने आग्रह किया लेकिन कोई जवाब नहीं मिला और इसलिए उन्होंने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है।

वकील कमलेश कुमार मिश्रा के मार्फत दायर याचिका में केंद्र, दिल्ली सरकार, पुलिस और दरगाह का प्रबंधन करने वाले ट्रस्ट को निर्देश देने की मांग की गई है कि महिलाओं का प्रवेश सुनिश्चित करने के लिए दिशानिर्देश तय करें और महिलाओं के प्रवेश की अनुमति पर रोक को ‘‘असंवैधानिक’’ घोषित करें।


पुणे की कानून की छात्राओं ने कहा है कि जब उच्चतम न्यायालय ने केरल के सबरीमला में हर उम्र वर्ग की महिलाओं को प्रवेश देने की अनुमति दे दी है तो फिर राष्ट्रीय राजधानी की महिलाओं को दरगाह में प्रवेश देने से क्यों रोका जा रहा है। याचिका के मुताबिक कानून की छात्राओं को दरगाह में महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी के बारे में उस समय पता चला जब 27 नवम्बर को वे दरगाह गई थीं।

दक्षिणी दिल्ली में स्थित हजरत निजामुद्दीन औलिया (1236-1325) का मकबरा सूफी काल की एक पवित्र दरगाह है। हजरत निज़ामुद्दीन चिश्ती घराने के चौथे संत थे। उन्हीं के नाम पर इस दरगाह का निर्माण किया गया था। इस सूफी संत ने वैराग्य और सहनशीलता की मिसाल पेश की, कहा जाता है कि 1303 में इनके कहने पर मुगल सेना ने हमला रोक दिया था, इस प्रकार ये सभी धर्मों के लोगों में लोकप्रिय बन गए। हजरत साहब ने 92 वर्ष की आयु में प्राण त्यागे और उसी वर्ष उनके मकबरे का निर्माण आरंभ हो गया, किंतु इसका नवीनीकरण 1562 तक होता रहा।

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