Patients suffering due to government's dispute - Jansatta
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सरकार की तकरार का खमियाजा भुगत रहे मरीज

दिल्ली सरकार की सेंट्रलाइज्ड एक्सीडेंट एंड ट्रॉमा सर्विस (कैट्स) को चलाने और रखरखाव के काम को ठेके (आउटसोर्स) पर दिए जाने के बाद जारी विवाद का असर इनकी सेवाओं पर पड़ रहा है।

Author नई दिल्ली | January 19, 2018 1:22 AM
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल (फाइल फोटो, सोर्स- AP)

दिल्ली सरकार की सेंट्रलाइज्ड एक्सीडेंट एंड ट्रॉमा सर्विस (कैट्स) को चलाने और रखरखाव के काम को ठेके (आउटसोर्स) पर दिए जाने के बाद जारी विवाद का असर इनकी सेवाओं पर पड़ रहा है। नतीजतन, जरूरतमंदों को समय से एंबुलेंस नहीं मिल पा रही है। मरीज निजी और महंगी एंबुलेंस की सेवाएं लेने को विवश हैं। कैट्स सेवा चला रही कंपनी का कहना है कि करीब 25 करोड़ रुपए का भुगतान सरकार की ओर से नहीं किया गया है। तमाम एंबुलेंस जर्जर हालत में हैं। उधर, सरकार की ओर से अभी तक कोई ठोस कदम न उठाए जाने पर उपराज्यपाल ने मामले की गंभीरता को देखते हुए एक न्यायाधिकरण (आॅर्बीट्रेटर) गठित किया है। जिसकी सुनवाई कल होनी है।

सरकारी सेवाओं का निजीकरण किए जाने या ठेकेदारी प्रथा के खिलाफ खड़ी आम आदमी पार्टी जब सत्ता में आई तो वह सारे वादे भूल गई जो घोषणा पत्र में किए थे। उस समय कहा था कि स्वास्थ्य सेवाओं में ठेकेदारी नहीं चलने देंगे, लेकिन सत्ता में आते ही एंबुलेंस सेवा को बेहतर सेवा बनाने के दावे के साथ ठेका निजी कंपनी बीवीजी-यूके एसएएस प्राइवेट लिमिटेड को दे दिया। कंपनी ने सेवाएं सही से चलाने के लिए अपने तरीके अपनाने शुरू किए, लेकिन इसके लिए कर्मचारी तैयार नहीं हुए। कैट्स से जुड़े कर्मचारियों का आरोप है कि कंपनी जुर्माने से बचने के लिए सभी उपकरण ठीक न होने के बावजूद एंबुलेंस सड़क पर उतारने के लिए कर्मचारियों पर दबाव बना रही है।

जिससे मरीजों की जान को खतरा है। वाहनों की वातानुकूलित मशीन या अन्य जरूरी उपकरण बिना शुरू किए सेवाएं नहीं चलाई जा सकती हैं। इसे लेकर कर्मचारियों ने काफी दिनों तक आंदोलन व हड़ताल भी की थी जिसपर सरकार ने एस्मा लगाया था। सेवा को लेकर सरकार के साथ चल रहे विवाद का खमियाजा लोगों को उठाना पड़ रहा है। नई दिल्ली स्टेशन प्रबंधक ने बताया कि स्टेशन पर आने वाले मरीजों को कैट्स सेवा लेने के लिए काफी इंतजार करना पड़ता है। कई बार वे एंबुलेंस के इंतजार में थक कर निजी वाहन, आॅटो वगैरह से जाने को विवश हो जाते हैं।

उधर, कंपनी का आरोप है कि सरकार की ओर से अनुबंध की तमाम शर्तें पूरी नहीं हो रही हैं। कंपनी को सेवाएं चलाने और कर्मचारियों के वेतन के लिए पैसे चाहिए लेकिन सरकार की ओर से जुलाई 2016 से दिसंबर 2016 तक एक भी भुगतान नहीं किया गया है। काफी शोर मचाने व विवाद के बाद पैसे मिलने भी लगे। तय था कि 70 फीसद भुगतान बिल जमा करने के 15 दिन के भीतर होगा व बाकी बिल का पैसा परीक्षण करने के बाद मिलेगा। लेकिन जनवरी 2017 से दिसंबर 2017 तक केवल 70 फीसद भुगतान हुआ है। पूरे साल का 15 फीसद बकाया है।

265 में सिर्फ 240 एंबुलेंस ही चलने लायक
कुल 265 एंबुलेंस है जिसमें से 240 चल रही हैं। कर्मचारियों का आरोप है कि करीब 45 फीसद एंबुलेंस के सायरन खराब हैं। करीब 31 एंबुलेंस के एसी खराब हैं या व दूसरे तरह की खराबी है। जहां पहले 800 से 900 मरीजों का इसका फायदा मिल पाता था वहीं अब कंपनी के आंकड़े के मुताबिक 350 से 400 कॉल प्रतिदिन आती है। परिचालन में लगी कंपनी का आरोप है कि काफी पुरानी व जर्जर हालत एंबुलेंस से सेवाएं देना संभव नहीं है। इनकी हालत के बारे में तब मालूम हुआ जब इसे चलाना शुरू किया। यह गाड़ियां डेढ़ लाख किलोमीटर चल चुकी हैं। इनका यह भी आरोप है कि आठ गाड़ियों का इंजन विरोध प्रदर्शन के दौरान खराब कर दिया गया। सरकार ने लाखों रुपए केंद्रीय नियंत्रण कक्ष और एप को लगाने में खर्च किया उसमें भी कर्मचारी दक्ष नहीं है। लिहाजा कॉल कहीं और से आती है और सेवा कहीं और भेज दी जाती है। सरकार की ओर से मामले में सुनवाई शुक्रवार को होनी है।

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