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एबीवीपी के डर से सेमिनार में भाषण देने के लिए वेश बदलकर पहुंची एक्टिविस्ट, बाहर इंतजार करते रह गए विरोधी

पंजाब यूनिवर्सिटी द्वारा इजाजत नहीं देने और एबीवीपी के विरोध के बावजूद एक्टिविस्ट सीमा आजाद फासीवाद विषय पर आयोजित सेमिनार में भाषण देने पहुंच गई।

एक्टिविस्ट सीमा आजाद (Express Photo/Jasbir Malhi)

पंजाब यूनिवर्सिटी (पीयू) में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) छात्रों ने ‘फासीवाद’ पर आयोजित सेमिनार में मानवाधिकार कार्यकर्ता सीमा आजाद को वक्ता के रूप में बुलाए जाने का विरोध किया था। दूसरी तरफ किसी तरह का नया विवाद न हो जाए इसके चलते यूनिवर्सिटी ने भी सेमिनार आयोजित कराने की इजाजत नहीं दी थी लेकिन बावजूद इसके सेमिनार आयोजित करा लिया गया है। एबीवीपी के छात्र “फासीवाद” विषय पर हुए सेमिनार का विरोध करने के लिए इकट्ठा हुए थे लेकिन एक्टिविस्ट सीमा आजाद भी इस समिनार में भाषण देने पहुंच गई। सीमा आजाद एक सिख वेशभूषा में सेमिनार में हिस्सा लेने पहुंची थीं जिसकी वजह से एबीवीपी के छात्र उनका बाहर ही इंतजार करते रह गए। छात्र संगठन एसएफएस के एक सदस्य ने बताया कि वह कैंपस में पूरे दिन मौजूद थीं लेकिन अपनी लोकेशन वह लगातार बदल रही थीं।

वहीं आजाद ने खुद को हरियाणा के नारी मुक्ति मंच की सदस्य बताया। उन्होंने लोगों से फासीवादी ताकतों के खिलाफ लड़ाई के लिए सड़कों पर आंदोलन करने की अपील की। सीमा आजाद के कैंपस पहुंचे की जानकारी एबीवीपी को नहीं मिली। संगठन के स्टेट प्रेजिडेंट सौरभ कपूर ने आजाद का मजाक उड़ाते हुए कहा कि अगर वह एक सच्ची देशभक्त होती तो प्रशासनिकों का सामना करती न कि चोरों की तरह कैंपस में आती। वहीं इस मामले को लेकर डीएसपी राम गोपाल ने कहा कि हमने आजाद को यूनिवर्सिटी में नहीं देखा। उन्होंने आगे बताया कि अगर वह यूनिवर्सिटी में आई थीं तो उन्हें रोकने की पहली जिम्मेदारी यूनिवर्सिटी प्रशासन की थी। हमारी जिम्मेदारी कानून-व्यवस्था बनाए रखने की है।

सेमिनार की इजाजत नहीं मिलने पर एसएपएस ने वीसी अरुण कुमार ग्रोवर के दफ्तर के बाहर ही नारेबाजी करना शुरू कर दी सेमिनार आयोजित करा लिया। भगत सिंह के भतीजे जगमोहन सिंह भी सेमिनार में मौजूद थे और उन्होंने कहा, “मैं हैरान हूं यह देखकर कि पंजाब यूनिवर्सिटी जो अपनी आजादी के लिए खासा जानी जाती है वह आज छात्रों को अपने विचार रखने से रोक रही है”। गौरतलब है कि सीमा आजाद और उनके पति को माओवादी संगठनों का साथ देने के आरोप में देशद्रोह के केस में इलाहाबाद की एक स्थानीय अदालत की तरफ से उम्रकैद की सजा दी गई है. वह फिलहाल इलाहाबाद हाईकोर्ट से मिली बेल पर बाहर हैं.

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