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पंडित विद्याधर व्यास का गायन

डॉ. नीता माथुर द्वारा स्थापित संगीत कला सम्मान समिति का ‘स्वर सम्मान’ इस वर्ष पं. विद्याधर व्यास को गोस्वामी गोकुलोत्सव महाराज, विदुषी शन्नो खुराना और पं. एलके पंडित के हाथों संगीतप्रेमियों की भरीपूरी उपस्थिति में त्रिवेणी सभागार में प्रदान किया गया।

Author नई दिल्ली | September 23, 2016 3:42 AM
पं. विद्याधर व्यास

डॉ. नीता माथुर द्वारा स्थापित संगीत कला सम्मान समिति का ‘स्वर सम्मान’ इस वर्ष पं. विद्याधर व्यास को गोस्वामी गोकुलोत्सव महाराज, विदुषी शन्नो खुराना और पं. एलके पंडित के हाथों संगीतप्रेमियों की भरीपूरी उपस्थिति में त्रिवेणी सभागार में प्रदान किया गया। सम्मान समारोह के उपरान्त व्यास जी के गायन का कार्यक्रम था। ग्वालियर घराने की पलुस्कर परंपरा में दीक्षित पं. विद्याधर व्यास पं. विष्णु दिगंबर पलुस्कर के शिष्य पं. नारायण राव व्यास के सुपुत्र हैं, अत: जाहिर है इस विशिष्ट गायकी का सत्व उन्होंने प्रामाणिक रूप से आत्मसात किया है, जो कि उनके समयोचित राग के चुनाव से लेकर खयाल की बंदिशों के बर्ताव और भजन गायकी तक में असंदिग्ध रूप से मुखर था।


सायंकाल के धीर-गंभीर राग श्री से अपने गायन की शुरुआत करते हुए उन्होंने पहले परिचयात्मक आलाप के औचार से राग का वातावरण बनाते हुए बड़े खयाल की पारंपरिक बंदिश ‘गजरवा बाजे…’ विलंबित तिलवाड़ा में शुरू की। राग की सुर-दर-सुर बढ़त करते हुए उन्होंने क्रमश: स्थायी और अंतरा भरने के बाद लयात्मक काम सरगम और बोल-बांट के साथ किया और विविध तानों से सजाकर विलंबित खयाल को विराम दिया। इसके बाद तीनताल की मशहूर बंदिश ‘एरी मैका आसन गइली…’ छोटे खयाल के तौर पर गाई। उनकी गाई इन बंदिशों का पुराना रंग सुधी श्रोताओं की जाने कितनी सुरीली यादों को ताजा कर गया।

श्री की संजीदगी के बाद उल्लसित हमीर का चुनाव सूझ भरा था। हमीर जैसा राग आजकल यूं भी सुनने को कम मिलता है अत: इस राग का चुनाव स्वागतयोग्य था। झूमरा ताल की मध्य लय में ‘चमेली फूली चंपा…’ और तीनताल की लोकप्रिय बंदिश ‘सुरझा रही…’ में भी पलुस्कर गायकी की सुगंध थी। इसी राग में उन्होंने द्रुत एकताल में निबद्ध एक तराना भी गाया।

इसके बाद दौर चला पलुस्कर परंपरा की भजन गायकी का। पं. विष्णु दिगंबर पलुस्कर ने तुलसी, मीरा, सूर जैसे संत कवियों के पदों को रागों में बांधा था। इन पदों का भक्तिभाव और रागों के रास ने मिलकर जादुई असर पैदा किया और ये भजन बहुत लोकप्रिय हुए। पं. विद्याधर व्यास ने आमफहम आरती पद ‘जय जगदीश हरे’ और नरसी मेहता के पद ‘वैष्णव जन तो…’ को पहले उनकी पारंपरिक लोकधुन में, और फिर पलुस्कर रचित रागों में गाकर दिखाया। अंत में राग झिंझोटी में तुलसीदास रचित पद ‘कहां के पथिक…’ गाकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर लिया। इस शाम उनका साथ देने के लिए तबले पर अभिजीत ऐच थे और हारमोनियम पर विनीत गोस्वामी। बड़े खयाल में तिलवाड़ा ठेका तो अभिजीत जी ने अच्छा लगाया लेकिन छोटे खयाल में लय बढ़ने की प्रवृत्ति रही।

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