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बिहार के दो दलित जिन्हें मिला पद्म श्री, जानें किस कला में हैं माहिर, 74 साल से नाच रहे हैं मांझी

Yashee , Ashish Kumar Jha: 84 वर्ष रामचंद्र मांझी 'लौंडा नाच' के कलाकार रहे हैं जो महिला ड्रेस पहन विभिन्न गानों और भिखारी ठाकुर नाटकों पर डांस करता है।

मधुबनी, नई दिल्ली | Updated: January 30, 2021 12:20 PM
रामचंद्र मांझी और दुलारी देवी को इस साल पद्म श्री पुरस्कार मिला है। (Photos: Express)

Yashee , Ashish Kumar Jha

इस साल जिन लोगों को पद्म श्री पुरस्कार से नवाजा गया उनमें बिहार के दो दलित कलाकार रामचंद्र मांझी और दुलारी देवी भी शामिल हैं। मांझी जहां ‘नाच’ कलाकार हैं वहीं दुलारी देवी मिथिला चित्रकार हैं। मांझी और दुलारी को राष्ट्रीय पुरस्कार तक पहुंचने के लिए काफी लंबा रास्ता तय करना पड़ा। राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने के बाद दोनों कलाकारों ने कहा कि ये उनकी जीवन की परिस्थितियां ही हैं जो उनकी कला को जीवन शक्ति देती हैं और उज्जवल बनाती हैं।

कौन हैं रामचंद्र मांझी?
84 वर्ष रामचंद्र मांझी ‘लौंडा नाच’ के कलाकार रहे हैं जो महिला ड्रेस पहन विभिन्न गानों और भिखारी ठाकुर नाटकों पर डांस करता है। सारण जिले के तुझारपुर गांव में जन्मे मांझी जब दस वर्ष के तब उन्होंने अदाकारी शुरू की और जल्द ही बिहार का शेक्सपियर कह जाने वाले भिखारी ठाकुर के संपर्क में आ गए। आज भी तुझारपुर गांव में रह रहे मांझी ने तब से मंच नहीं छोड़ा है।

उन्होंने फोन पर द इंडियन एक्सप्रेस को बताया- भोजपुरी ने भिखारी ठाकुर जैसे लेखक दोबारा नहीं देखे। हम अपने प्रदर्शनों के माध्यम से उन्हें जिंदा रखे हुए हैं। अक्सर जब हमारे बारे में लिखा जाता है तब हमारे काम से अधिक ध्यान हमारे महिलाओं के कपड़े पहनने पर होता है। मगर ये हमारा कंटेंट है जो दशकों तक हमें प्रासंगिक और लोकप्रिय बनाए रखता है। मंच पर करीब 74 वर्ष बिता चुके मांझी ने भारत के विभिन्न शहरों का दौरा किया है।

कौन हैं दुलारी देवी?
53 वर्षीय दुलारी देवी मधुबनी जिले में रतनी गांव में रहती हैं। मिथिला चित्रकार के घर एक सहायिका के रूप में काम के दौरान उन्होंने पहली बार पेंट ब्रश हाथ में उठाया। तब से पिछले करीब तीन दशकों से वो अपने और परिवार के जीवन में नए रंग भरने का काम कर रही हैं। दुलारी देवी ने कहा- मैं बहुत गरीबी में पली, कभी स्कूल नहीं गई। हम मल्लाह (मछुआरों) जाति के हैं इसलिए मेरे पिता मछली पकड़ते थे और मेरी मां एक मजदूरी का काम करती थीं। 13 साल की उम्र में मेरी शादी हो गई मगर मेरी छह माह की बेटे के देहांत के बाद मैं घर लौट आई। मैंने महासुंदरी देवी के घर घरेलू सहायिका की नौकरी शुरू कर दी, जो मिथिला पेंटिंग बनाती थीं।

उन्होंने आगे बताया- घर की मालकिन ने कला के प्रति मेरी दिलचस्पी नोटिस की और कुछ सालों बाद जब सरकार ने पेंटिंग के एक छोटे कोर्स की पेशकश की, उन्होंने मेरी मदद की। महासुंदरी देवी के आवास पर मैं महान मिथिला चित्रकार कर्पुरी देवी के संपर्क में आई जो मेरी गुरु और दूसरी मां बन गईं।

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