सबसे बड़े प्रदेश में ओवैसी की दस्तक

उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधनसभा चुनाव के पहले यहां का मुसलिम मतदाता दुविधा में है।

असउद्दीन ओवैसी। फाइल फोटो।

उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधनसभा चुनाव के पहले यहां का मुसलिम मतदाता दुविधा में है। कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन कर समाजवादी पार्टी ने पहले ही मुसलमानों का भरोसा तोड़ा है। वहीं, एआइएमआइएम और उस सरीखे दलों ने भी मुसलमानों के इस असमंजस को और बढ़ाया है। वे अब यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि आखिर करें तो क्या करें? समाजवादी पार्टी के पारम्परिक कहे जाने वाले इस वोट बैंक में फैली सियासी अनिश्चितता ने बहुजन समाज पार्टी की बांछें खिला दी हैं। वर्ष 2007 से बहनजी सपा के पारम्परिक वोट बैंक में सेंधमारी की जुगत में हैं।

उत्तर प्रदेश की 403 विधान सभा सीटों में से 147 ऐसी हैं जहां अल्पसंख्यक मतदाता हार जीत का फैसला करने की सियासी कुव्वत रखते हैं। यह सीटें दरअसल हैं कहां? इनमें रामपुर सर्वप्रथम है, जहां मुसलमान मतदाताओं का प्रतिशत 42 है। इसके बाद मुरादाबाद, बिजनौर, अमरोहा, सहारनपुर, मेरठ, कैराना, बलरामपुर, बरेली, संभल, पडरौना और मुजफ्फरनगर, डुमरियागंज, लखनऊ, बहराइच, कैराना, शाहजहांपुर, खुर्जा, बुलन्दशहर, खलीलाबाद, सीतापुर, अलीगढ़, आंवला, आगरा, गोंडा, अकबरपुर, बागपत और लखीमपुर में मुसलिम मतदाता प्रभावी भूमिका में होते हैं।

उत्तर प्रदेश की सियासत में इतनी निर्णायक भूमिका में होने के बावजूद वर्ष 2014 में हुए सोलहवीं लोकसभा के चुनाव में एक भी मुसलमान सांसद जीत नहीं सका। 2014 लोकसभा चुनाव में प्रदेश की 80 में से 73 सीटें जीत कर, 2017 के विधानसभा में अभूतपूर्व बहुमत की भारतीय जनता पार्टी ने सरकार बना कर और 2019 में 80 में से 65 सीटें जीत कर पूर्ण बहुमत से केन्द्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद राज्य का मुसलिम मतदाता ऊहापोह की स्थिति में है।

मायावती इन मतदाताओं को अपने पाले में करने की पुरजोर कोशिश में जुटी हैं। लेकिन वे मुसलमानों का भरोसा अब तक जीत नहीं सकीं। भारतीय जनता पार्टी के प्रति उनके मन में कहीं न कहीं नजर आने वाले नरम रुख के कारण प्रदेश का मुसलमान बहुजन समाज पार्टी पर भरोसा करने से शुरू से ही कतरा रहा है। वहीं असउद्दीन ओवैसी मुसलमानों के इस भाव को भांप कर उनकी दुखती रग पर हाथ रखने की कोशिश में जुटे है। उन्होंने इलाहाबाद के दबंग अतीक अहमद और मऊ के दबंग मुख्तार अंसारी के सर पर हाथ फेर कर मुसलमानों को अपने पाले में करने की कोशिशें शुरू कर दी है। ओवैसी ने एलान किया है कि वे मुख्तार के खिलाफ प्रत्याशी नहीं उतारेंगे।

उधर, भारतीय जनता पार्टी मुसलमानों की अलम्बरदारी की बात करने वाले सियासी दलों को देख कर इत्मीनान की मुद्रा में है। पार्टी को इत्मीनान है कि प्रदेश की उन 147 विधानसभा सीटों पर जहां मुसलमान हार-जीत का अंतर तय करते हैं वहां वे उसी को वोट देंगे जो भाजपा को पराजित करना हुआ दिखेगा। ऐसे में न ही वे बसपा के साथ जाएंगे और न ही सपा अथवा कांग्रेस के साथ। ऐसे में संगठित होने की जगह मुसलमान मतदाताओं के बंटने का खतरा ज्यादा है। और उनकी यही बेचैनी भाजपा के लिए इत्मीनान का सबब बनी हुर्ई है।

उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधनसभा चुनाव के पहले यहां का मुसलिम मतदाता दुविधा में है। कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन कर समाजवादी पार्टी ने पहले ही मुसलमानों का भरोसा तोड़ा है। वहीं, एआइएमआइएम और उस सरीखे दलों ने भी मुसलमानों के इस असमंजस को और बढ़ाया है। वे अब यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि आखिर करें तो क्या करें? समाजवादी पार्टी के पारम्परिक कहे जाने वाले इस वोट बैंक में फैली सियासी अनिश्चितता ने बहुजन समाज पार्टी की बांछें खिला दी हैं। वर्ष 2007 से बहनजी सपा के पारम्परिक वोट बैंक में सेंधमारी की जुगत में हैं।

उत्तर प्रदेश की 403 विधान सभा सीटों में से 147 ऐसी हैं जहां अल्पसंख्यक मतदाता हार जीत का फैसला करने की सियासी कुव्वत रखते हैं। यह सीटें दरअसल हैं कहां? इनमें रामपुर सर्वप्रथम है, जहां मुसलमान मतदाताओं का प्रतिशत 42 है। इसके बाद मुरादाबाद, बिजनौर, अमरोहा, सहारनपुर, मेरठ, कैराना, बलरामपुर, बरेली, संभल, पडरौना और मुजफ्फरनगर, डुमरियागंज, लखनऊ, बहराइच, कैराना, शाहजहांपुर, खुर्जा, बुलन्दशहर, खलीलाबाद, सीतापुर, अलीगढ़, आंवला, आगरा, गोंडा, अकबरपुर, बागपत और लखीमपुर में मुसलिम मतदाता प्रभावी भूमिका में होते हैं।

उत्तर प्रदेश की सियासत में इतनी निर्णायक भूमिका में होने के बावजूद वर्ष 2014 में हुए सोलहवीं लोकसभा के चुनाव में एक भी मुसलमान सांसद जीत नहीं सका। 2014 लोकसभा चुनाव में प्रदेश की 80 में से 73 सीटें जीत कर, 2017 के विधानसभा में अभूतपूर्व बहुमत की भारतीय जनता पार्टी ने सरकार बना कर और 2019 में 80 में से 65 सीटें जीत कर पूर्ण बहुमत से केन्द्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद राज्य का मुसलिम मतदाता ऊहापोह की स्थिति में है।

मायावती इन मतदाताओं को अपने पाले में करने की पुरजोर कोशिश में जुटी हैं। लेकिन वे मुसलमानों का भरोसा अब तक जीत नहीं सकीं। भारतीय जनता पार्टी के प्रति उनके मन में कहीं न कहीं नजर आने वाले नरम रुख के कारण प्रदेश का मुसलमान बहुजन समाज पार्टी पर भरोसा करने से शुरू से ही कतरा रहा है। वहीं असउद्दीन ओवैसी मुसलमानों के इस भाव को भांप कर उनकी दुखती रग पर हाथ रखने की कोशिश में जुटे है। उन्होंने इलाहाबाद के दबंग अतीक अहमद और मऊ के दबंग मुख्तार अंसारी के सर पर हाथ फेर कर मुसलमानों को अपने पाले में करने की कोशिशें शुरू कर दी है। ओवैसी ने एलान किया है कि वे मुख्तार के खिलाफ प्रत्याशी नहीं उतारेंगे।

उधर, भारतीय जनता पार्टी मुसलमानों की अलम्बरदारी की बात करने वाले सियासी दलों को देख कर इत्मीनान की मुद्रा में है। पार्टी को इत्मीनान है कि प्रदेश की उन 147 विधानसभा सीटों पर जहां मुसलमान हार-जीत का अंतर तय करते हैं वहां वे उसी को वोट देंगे जो भाजपा को पराजित करना हुआ दिखेगा। ऐसे में न ही वे बसपा के साथ जाएंगे और न ही सपा अथवा कांग्रेस के साथ। ऐसे में संगठित होने की जगह मुसलमान मतदाताओं के बंटने का खतरा ज्यादा है। और उनकी यही बेचैनी भाजपा के लिए इत्मीनान का सबब बनी हुर्ई है।

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