24 जून तक बीमार रहेंगे पुरी के भगवान जगन्नाथ - odisha news Will remain ill till June 24 Lord Jagannath of Puri - Jansatta
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24 जून तक बीमार रहेंगे पुरी के भगवान जगन्नाथ

अलबत्ता 3 जुलाई को भगवान की घर वापसी होगी, जिसे बहुणा यात्रा कहते हैं। भगवान रुठी हुई माता लक्ष्मी को मनाते हुए अपने घर वापसी करेंगे।

भगवान की रथयात्रा पूरे देश में खासकर उड़ीसा के पुरी में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। (Express Photo)

आपको यह जानकर हैरानी होगी कि भगवान जगन्नाथ की तबीयत इनदिनों खराब चल रही है। रथयात्रा के ठीक एक रोज पहले यानी 24 तारीख को वे दुरूस्त हो जाएंगे। इसी महीने की 25 तारीख को रथयात्रा है। पूरे देश में खासकर उड़ीसा के पुरी में बड़े धूमधाम से यह पर्व मनाया जाता है। हिंदुओ के चार धाम में एक धाम जगन्नाथ पुरी भी है। भगवान की रथयात्रा में हरेक साल जन सैलाव इस कदर उमड़ता है कि पूरी में तिल रखने की जगह नहीं होती है।

हमारे संवाददाता ने हाल ही में पुरी की यात्रा की है। वहां भगवान जगन्नाथ मंदिर में उनकी पूजा अर्चना और रथयात्रा के नियमों से रु -ब-रु हुए। यहां के पंडे दूसरे तीर्थ स्थानों के मुकाबले सरल-सहज और सस्ते हैं। दर्शन पूजा के बाद आप जो भी मुनासिव दक्षिणा दे दीजिए उनको शिरोधार्य है। वे यजमान से गया के पंडों की तरह बकझक नहीं करते। इसी दौरान मंदिर की कुछ बातों की जानकारी मिली। जिसे पाठकों को भी जानना चाहिए।

पंडा श्यामा चरण बताते हैं कि प्रसाद के लिए बनी रसोई में एक चूल्हे पर एक साथ सात मिट्टी की बड़ी हांडी चढ़ाई जाती है। उसमें डाले चावल दाल की सबसे ऊपर वाली हांड़ी सबसे पहले पकती है। जबकि आंच सबसे नीचे वाली हांडी में ही लगती है। यह एक करिश्मा है और रसोई में दर्जनों चूल्हे है। यहां मुख्य प्रसाद भात-दाल का लगता है। 10 -20 रूपए का भी प्रसाद पत्तल में मिल जाता है, जिसे श्रद्धालु बड़े चाव से खाते हैं।

मुख्य मंदिर के सबसे ऊंचे गुम्बद की ध्वजा रोजाना बदली जाती है। एक मुख्य ध्वजा के साथ दर्जनों ध्वजा चढ़ाई जाती है। चार पंडे इन ध्वजा को लेकर रोजाना उलटे पांव ऊंचे गुम्बद पर चढ़ते हैं और उलटे ही उतरते हैं। इस हैरत अंगेज नजारे को देखने मंदिर प्रांगण में हजारों की भीड़ शाम को जमा रहती है। उतारी ध्वजा श्रद्धालु अपनी संवृद्धि के लिए 100 – 200 का दान कर हासिल करते हैं।

वे बताते हैं कि भगवान जगन्नाथ, बहन सुभद्रा और भाई बलभद्र के साथ विराजमान है। इनकी मूर्ति लकड़ी की बनी है। 13 साल के बाद इन मूर्तियों को मंदिर प्रांगण के पीछे बने स्थान में गाड़ दिया जाता है और नई मूर्ति की स्थापना मंत्रोचारण के साथ की जाती है। यह रश्म सदियों से चली आ रही है।

बीती पूर्णिमा के मौके पर भगवान जगन्नाथ जी को स्नान कराया गया। जिसके बाद भगवान जगन्नाथ बीमार पड़ गए और अब वे 24 तारीख तक आराम करेंगे। ज्येष्ठ महीने की पूर्णिमा को भगवान जगन्नाथ को स्नान कराया जाता है। जिसके बाद वे बीमार पड़ जाते हैं और 15 दिनों के लिए मंदिरों के कपाट बंद कर दिए जाते हैं। यह परंपरा भी सदियों से है। इस दौरान उनकी पूरी सेवा की जाती है। ताकि वे जल्द ठीक हो जाएं। भगवान की तबियत ठीक होने पर उस दिन जगन्नाथ यात्रा निकलती है।

भगवान भक्तों द्वारा करवाए स्नान के बाद अर्द्धरात्रि को बीमार होते हैं। इस दौरान भगवान जगन्नाथ जी को आयुर्वेदिक काढ़े का भोग लगाया जाता है। मानव शरीर पर लागू होने वाले सारे नियम भगवान पर भी लागू होते हैं। जिसके कारण वे बीमार होते हैं। 15 दिनों तक मंदिर में कोई भी घड़ी घंट नहीं बजता है और न ही अन्न का भोग लगाया जाता है। इस दौरान भगवान को केवल आयुर्वेदिक काढ़ा और फलों का रस दिया जाता है।

जगन्नाथ धाम में भगवान की बीमारी की जांच के लिए प्रतिदिन वैद्य आते हैं। दिन में दो बार आरती होती है। इसके अतिरिक्त भगवान को प्रतिदिन शीतल लेप भी लगाया जाता है। भगवान जगन्नाथ को रात में सोने से पूर्व मीठा दूध भी अर्पित किया जाता है। भगवान जगन्नाथ 24 जून को पूरी तरह स्वस्थ हो जाएंगे और मंदिरों के कपाट खोल दिए जाएंगे। इसके साथ ही भगवान के नव यौवन रूप के दर्शन श्रद्घालुओं को होंगे। भगवान को विशेष भोग प्रसाद चढ़ाया जाएगा। भगवान स्वस्थ होने के बाद 25 जून को अपने श्रद्घालुओं को दर्शन देने मंदिर से निकलेंगे। इसके लिए भगवान की गुंडिचा यात्रा निकाली जाएगी। वे अपनी बहन सुभद्रा व भाई बलभद्र के साथ अपने भक्तों को दर्शन देते हुए मौसी मां के घर जाएंगे। वहां वे 9 दिन रहेंगे। मौसी मां के घर उनके मनोरंजन के साथ ही विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम का इंतजाम किया जाता है।

अलबत्ता 3 जुलाई को भगवान की घर वापसी होगी, जिसे बहुणा यात्रा कहते हैं। भगवान रुठी हुई माता लक्ष्मी को मनाते हुए अपने घर वापसी करेंगे। मंदिर में उन्हें विधिपूर्वक स्थापित किया जाएगा। इसके बाद फिर से भगवान का दरबार भक्तों के लिए खुल जाएगा। बता दें कि भगवान मंदिर से साल में सिर्फ एक बार बाहर निकलते हैं। इसलिए श्रद्धालुओं के मन में जगन्नाथ पुरी का विशेष स्थान है।

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