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बृज की होलीः लड्डू संग टोफियां चॉकलेट

मारे साल भर के त्योहारों में होली का मुकाबला नहीं। भाईचारे और आपसी मेलमिलाप का संदेश देती होली के रंग में हर कोई सराबोर होना चाहता है।

Author Published on: February 23, 2018 3:26 AM
लट्ठमार होली

अशोक बंसल
मारे साल भर के त्योहारों में होली का मुकाबला नहीं। भाईचारे और आपसी मेलमिलाप का संदेश देती होली के रंग में हर कोई सराबोर होना चाहता है। ‘हर्र लगे न फिटकरी रंग चौखा आए’ कहावत को चरितार्थ करता यह पर्व संपन्न हो या विपन्न, दुखिया हो या सुखिया सभी को आकर्षित करता है। यही कारण है होली की ठिठोली की गूंज अपने-अपने तरीके से देश के कोने कोने में गूंजती है। ब्रज की होली देश के अन्य स्थानों पर मनाई जाने वाली होली से ज्यादा रंगबिरंगी मानी जाती है। यही कारण है कि ब्रज की होली का आनंद लेने बड़ी संख्या में विदेशी भी आते हैं। ब्रज में होली एक-दो दिन का त्योहार नहीं बल्कि इसकी शुरुआत बसंत पंचमी के दिन ही हो जाती है। मथुरा, वृंदावन, नंदगांव, बरसाना, वलदेव आदि स्थानों के मंदिरों में होली का गायन शुरू हो जाता है और फिर शुरू हो जाती है होली की तैयारियां।

ब्रज में होली की पहचान निराली है। कहीं लट्ठमार होली होती है तो कहीं आग में पंडा निकल कर भक्त प्रह्वाद की भक्ति के दर्शन कराता है। कहीं हुरंगा होते हैं। ब्रज की होली की परंपरा का उल्लेख अंग्रेज कलक्टर एफएस ग्राउस ने अपनी पुस्तक ‘डिस्ट्रिक मेमोयर’ में भी किया है। यह पुस्तक 1876 में प्रकाशित हुई थी। मथुरा से करीब 30 किलोमीटर दूर जगह है फालैन। ग्राउस ने यहां की विचित्र होली का वर्णन विस्तार और रोचकता से किया है। यहां एक व्यक्ति जलती हुई होली के बीच से सकुशल गुजर जाता है। हजारों दर्शक ‘जय होली मैया’ के उद्घोष से वातावरण को गुंजायमान कर देते हैं। इस होली में प्राचीन धार्मिक कथाओं के प्रति अटूट आस्था और रहस्य-रोमांच दिखाई देता है। लपलपाती हुई ज्वाला के मध्य नंगे बदन निकलने वाला पंडा अपने करतब को दिखाने के लिए कई दिनों पहले मंदिर में बैठ तप करता है।

बरसाना की लट्ठमार होली में योगिराज कृष्ण के प्रति अपार श्रद्धा और आनंद की भरमार है। यहां की होली देखने (खेलने) आने वाले दर्शक नहीं श्रद्धालु कहलाते हैं। बरसाने की रंगीली गली में नंदगांव के हुरियारे (कृष्ण के सखा) जब अपने सर पर ढाल रख बरसाने की गोपियों (राधा की सखियां) की लाठियों के वार गाते-बजाते सहते हैं तो दर्शक कृष्ण युग में पहुंच ‘राधे राधे’ का उद्घोष करते हैं। सच मायने में बरसाने की लट्ठमार होली धार्मिक आस्था और ब्रज संस्कृति का अद्भुत मिश्रण है। बरसाने की लट्ठमार होली के साथ लड्डूमार होली का जिक्र होना जरूरी है। दरअसल कथा रोचक है। राधा की साखियां नन्द बाबा के नंदगांव में होली का निमंत्रण देने गई थीं। कृष्ण के सखाओं ने निमंत्रण स्वीकार कर लिया। सखियों की खुशी की सीमा न रही सो बरसाने के बृषभान मंदिर में एक दूसरे को लड्डू बांटे गए। इसी को लड्डूमार होली का नाम दिया गया। हजारों वर्ष पुरानी इस कहानी को आज भी अधिकाधिक उत्साह से दोहराया जा रहा है। लट्ठमार होली से एक दिन पूर्व राधारानी मंदिर में मनाई जाने वाली लड्डूमार होली पर सैकड़ों कुंतल लड्डू बांटे जाते हैं। आज एक परिवर्तन आया है। श्रद्धालु लड्डुओं के साथ टॉफी और चॉकलेट भी बांटते हैं।

बरसाने की होली से लोगों का मन नहीं भरता। तब उसकी भरपाई करने के लिए मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर रंगबिरंगे माहौल में गाजे बाजे के साथ लठ्ठमार होली का आयोजन दोहराया जाता है। इस मौके पर बिखरी छटा देख हर कोई का मन ‘रंग बरसे’ जैसे भाव के गीत गाने को मचलने लगता है।
मजेदार बात यह है ब्रज की होली कृष्ण की कथाओं से जुड़ चुकी है। अत: ब्रज में विभिन्न स्थानों पर होली का आनंद जितना सड़क पर है उतना मंदिरों में भी है। कृष्ण के भाई बलदेव का मंदिर दाऊजी के नाम से प्रसिद्ध है। इस मंदिर में रोजाना भांग का प्रसाद लगता है। दाऊजी के मंदिर में होली वाले दिन यानी 3 मार्च को हुरंगा होगा। मंदिर के प्रांगण में पानी के रंगों के साथ गोपियां सखाओं पर रंग ही नहीं डालेंगी बल्कि उनके कपड़ों को फाड़ कर उनके कोड़े बना कर जबरदस्त मार करेंगी।

पुराने वक्त में होलिका के रूप में गोबर के थपे कंडे (उपले, गूलरी की माला) आदि रखी जाती थी। इस परंपरा ने सत्तर के दशक में स्वरूप परिवर्तित कर लिया। इसी दशक में होलिका की प्रतिमा दहन शुरू हुआ। ब्रजमंडल के होलिकोत्सव में हुड़दंग, रसिक परंपराओं का निर्वाह, हास्य-व्यंग्य, अबीर और गुलाल के साथ संगीत, कला, काव्य आदि के रंगबिरंगे प्रयास किए जाते हैं। आयोजन में ब्रज की लोक कलाएं, रसिया, स्वांग, नौटंकी आदि के साथ ही धमार, होरी गायन से ब्रज की संस्कृति की झलक दिखाई जाती है। ब्रज की होली आनंद , भक्ति का पर्याय ही नहीं है बल्कि ब्रज संस्कृति की लुप्त होती प्राचीन विधाओं को जीवंत रखे हुए है और वह भी इन पंक्तियों के संग-
‘आज ब्रज में होरी है रे रसिया, होरी रे रसिया, बरजोरी रे रसिया’

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