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पुस्तक समीक्षाः शहर और साहित्य की रागदारी

लेकिन आठ-दस कदम चलने के बाद मुड़ा और पूरी शक्ति से दौड़ते हुए अंदर जाने के लिए छलांग मारी तो भड़ाक से दरवाजा खुलने की आवाज के साथ ही मैं बाहर खड़े दोनों कॉमरेड्स को लिए-दिए कमरे के भीतर जा गिरा’।

Author November 24, 2017 1:05 AM
उद्भ्रांत शर्मा

लेकिन आठ-दस कदम चलने के बाद मुड़ा और पूरी शक्ति से दौड़ते हुए अंदर जाने के लिए छलांग मारी तो भड़ाक से दरवाजा खुलने की आवाज के साथ ही मैं बाहर खड़े दोनों कॉमरेड्स को लिए-दिए कमरे के भीतर जा गिरा’। उद्भ्रांत की किताब ‘शहर-दर-शहर उमड़ती है नदी’ में ‘केन-किनारे’ शीर्षक के तहत यह संस्मरण इस किताब और लेखक का निचोड़ है। इसमें उद्भ्रांत ने 1974 की अक्तूबर में आगरा में हुए प्रगतिशील लेखक संघ के सम्मेलन को याद किया है। केदार बाबू ने उद्भ्रांत के सम्मेलन में शामिल होने पर रोक लगा दी थी क्योंकि उन्होंने अपनी पत्रिका ‘युवा’ में धूमिल के उन पत्रों को छापा था जिसमें ऐसे आयोजनों पर तंज था। और अध्यक्ष केदार बाबू की ‘मनमानी’ के खिलाफ युवा कवि की इस छलांग का निंदा प्रस्ताव ‘स्वाधीनता’ और ‘उत्तरार्द्ध’ के अंकों में छपा। लघु पत्रिकाओं में भी यह खबर छपी।

यश पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स से प्रकाशित उद्भ्रांत के संस्करणों की इस किताब के शीर्षक में तो उमड़ती नदी है लेकिन इनके संस्मरण उफनते समुद्र की लहरों की भांति हैं। सागर तीरे बैठे आदमी के पास एक लहर कुछ छोड़ जाती है तो दूसरी लहर वापस ले जाती है। हर खांचे में अपनी छलांग लगा कर हर तरह के खांचे से बाहर उद्भ्रांत का यह संस्मरण हिंदी साहित्य, हिंदी पट्टी के साठ के दशक से लेकर मौजूदा समय तक पर एक डॉक्युमेंटरी फिल्म की तरह है। उनके वर्णन में एक सजीवता है। एक साहित्यकार ने अपने संस्मरण को क्यों और कैसे लिखा। इसका जवाब उद्भ्रांत देते हैं, ‘क्या स्मृतियों के असंख्य बिंबों को गड्डमड्ड कर दिया जाए-आधुनिक चित्रकला के एक कोलाज की तरह…तो सबसे बेहतर तरीका यही है कि बिना ज्यादा सोचे-विचारे, बिना कोई रूपरेखा बनाए, और बिना किसी तैयारी के, इस नदी में छलांग लगाई जाए और यह जिस दिशा में भी ले जाए, उस तरफ बहते चला जाए’। लेकिन यह संस्मरण न तो गड्डमड्ड है और न बस बहना।

कानपुर में रामधारी सिंह दिनकर के सामने मंच पर कविता पढ़ना और दिनकर का युवा लेखक (उद्भ्रांत) के लिए पर्ची पर लिख कर भिजवाना, ‘सुरभि वायु की चूनर है, इस मुहाबिरे के लिए बधाई’। और ब्रज की यादों के साथ ही चीन के बाजारवाद में लु-शून भी आ जाते हैं। बुजुर्ग और ऐतिहासिकता को प्राप्त हो चुके दुर्लभ साहित्यकारों को खोज-खोज कर मिलने और उनसे आशीर्वाद लेने के जुनून में साहित्य का समकालीन इतिहास सा बन गया है। सत्ता के गलियारों को हिलाने वाली पंक्तियां लिखने वाले नागार्जुन के भरवां बैंगन की तुलना उस जिराफ से करना जिसके पेट से बच्चा झांकता दिखाई दे रहा है और उनका यह कहना, ‘आलोक, आज का समय गुलेरी का नहीं है जो तीन कहानियां लिखकर ही अहम हो गए। आज तो जब तक बहुत अच्छा लेखन परिमाण में भी अधिक नहीं होगा तो लोग याद नहीं रखेंगे’।

उद्भ्रांत इलाहाबाद को साहित्य का तीर्थ कहते हैं। गोमती के तट पर युवा लेखक तीन तीर्थस्थलों अमृतलाल नागर, यशपाल और बाबू भगवतीचरण वर्मा की ज्ञान की गंगा में डुबकी लगाता रहा। भगवतीचरण वर्मा जैसी मकबूल शख्यियत से जब एक युवा लेखक मिलने जाता है तो उसका स्वागत कैसे होता है? साहित्यकार क्या पहनता है, कैसी चाय पसंद करता है अपनी रचनाओं के बारे में संगोष्ठियों और मंचों से इतर कैसे बोलता है इन चीजों का वर्णन करते हुए उद्भ्रांत कुछ अलग सा रच गए हैं। ‘रागदरबारी’ के साहित्य अकादेमी से पुरस्कृत होने के बाद पहली विचार गोष्ठी में श्रीलाल शुक्ल ने क्या बोला या युवा कवि की लंबी कविता ‘रुद्रावतार’ की राम की शक्तिपूजा से किस तरह तुलना की गई है। कवि गोष्ठी, कॉफी हाउस, लेखक की बैठकी, लेखक संगठनों का जमावड़ा इन सबका कोलाज है संस्मरणों की यह किताब।

कालजयी रचना लिख चुका लेखक बीमार पड़ने पर, लिखना-पढ़ना छूट जाने पर कैसा महसूस करता है, वैचारिक प्रतिबद्धताओं के कारण मंच पर उसकी प्रशंसा करने के बाद जिससे उसका मन नहीं मिलता उसके बारे में अकेले में क्या सोचता है। सत्तर साल के रचनाकार ने जिस तरह यादों को सहेजा है उनकी स्मरणशक्ति भी अचंभा पैदा करती है। यह एक सत्तर साल के युवा की शहर और साहित्य के साथ पचास साल से चल रही रोमांस कथा है।

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