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नृत्यः दिव्य लोक की दिव्यता संग स्वच्छ विचार का संदेश

वरिष्ठ नृत्यांगना डॉ सोनल मानसिंह ने सिर्फ नृत्य को सीखा या प्रस्तुत नहीं किया है। बल्कि उन्होंने नृत्य को जिंदगी की तरह निभाया है।

वरिष्ठ नृत्यांगना डॉ सोनल मानसिंह

वरिष्ठ नृत्यांगना डॉ सोनल मानसिंह ने सिर्फ नृत्य को सीखा या प्रस्तुत नहीं किया है। बल्कि उन्होंने नृत्य को जिंदगी की तरह निभाया है। वह नृत्य की प्रस्तुति में भाव के सहित उसके मर्म और संकल्पना तक को स्पर्श करती हैं। हाल में इंडिया हैबिटाट सेंटर में प्रस्तुत दिव्य लोक ऐसी ही प्रस्तुति थी। ‘दिव्य लोक’ नृत्य रचना में देवी पुराण, शिव पुराण और भगवत पुराण के कुछ अंशों को नृत्य में पिरोया गया। इसके जरिए स्वच्छ विचार, स्वच्छ वाणी और स्वच्छ व्यवहार का संदेश दिया गया।

श्री कामाख्या कला पीठ सेंटर फॉर इंडियन क्लासिकल डांस के कलाकारों के साथ नृत्यांगना सोनल मानसिंह ने नृत्य रचना ‘दिव्य लोक’ पेश की। इस प्रस्तुति का आरंभ देवी महात्म्य के वर्णन से होता है। इस अंश में नृत्यांगना सोनल मानसिंह देवी की दिव्यता को आंगिक भाव, हस्तकों और मुद्राओं से व्यक्त करती हैं। सृष्टि में तब न कालचक्र था, न चंद्र-सूर्य-नक्षत्र कुछ भी नहीं थे। तब महर्षि वेदव्यास को देवी के चरण तल पर अंकित देवी पुराण के श्लोक व मंत्रों के दर्शन होते हैं। सत्व, राजस व तमस गुणों के जरिए महादेवी का प्रादुर्भाव होता है। वह ब्रम्हा, विष्णु व शिव को सृष्टि के निर्माण, पोषण व संहार का निर्देश देती हैं। फिर वह त्रिदेव की परीक्षा लेती हैं और भगवान शिव के साथ शक्ति के रूप में अपने अवतरण का वरदान देती हैं। माया के बल से योग-वियोग से ही शिव-शक्ति की परमप्रीति बनी रहेगी। इस प्रसंग को आधुनिक समकालीन व छऊ नृत्य शैली में कलाकारों ने इसे पेश किया। रचना ‘महादेवी नमो देवी देवी’ पर आधारित प्रस्तुति में कलाकारों ने एक-एक भाव को मनोयोग से निभाया।

प्रस्तुति के दूसरे अंश में शिव पुराण की भस्मासुर व मोहिनी कथा को चित्रित किया गया। इस पेशकश में सरायकेला छऊ के छंदों पर कलाकारों ने अंग व पद संचालन मोहक अंदाज में प्रयोग किया। साथ ही, भ्रमरी, उत्प्लावन व चारी भेद का समावेश भी सुंदर था। नायिका मोहिनी के रूप में नृत्यांगना ने मोहक अंदाज में ओडिशी नृत्य पेश किया। द्वापर युग के कृष्णावतार के प्रसंग को अगले अंश में पेश किया गया। इसके लिए भगवत पुराण के कालिया मर्दन प्रसंग का चयन किया गया था। यमुना नदी जब प्रदूषित होकर काली हो गई, तब कृष्ण को उसकी स्वच्छता, पवित्रता और शुद्धिकरण के लिए कालिया सर्प का मर्दन करना पड़ा। चेलो व बांसुरी की धुन पर विशेष तौर पर कलाकारों का छऊ नृत्य शैली में प्रसंग को पेश करना एक अभिनव प्रयोग प्रतीत हुआ। नृत्यांगनाओं के सामू